
व्यंग्य लेख: किसी राज्य में एक बड़े ही समझदार राजा का शासन था। राजा इतना समझदार था कि उसकी हर घोषणा में जनता को अपना भला दिखता था और राजा को अपना।

उसी राज्य में एक साहूकार रहता था। वह वर्षों से एक रुपये में रोटी बेचता था। जनता खुश थी, साहूकार भी खुश था। क्योंकि एक रुपये की रोटी बेचकर भी साहूकार इतना कमा लेता था कि हर साल नया मकान बनवा लेता था और हर त्योहार में नया घोड़ा खरीद लेता था।
एक दिन साहूकार ने घोषणा कर दी—
“कल से रोटी एक रुपये नहीं, दस रुपये में मिलेगी।”
पूरा राज्य हिल गया।
लोगों ने कहा, “यह कैसा अन्याय है? कल तक जो रोटी एक रुपये में मिलती थी, वह अचानक दस रुपये की कैसे हो गई?”
बाजार बंद हो गए। चौपालों में चर्चा होने लगी। चाय की दुकानों पर बहस शुरू हो गई। सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी-अपनी विद्वता का प्रदर्शन शुरू कर दिया।
आखिरकार जनता राजा के दरबार पहुंची।
राजा ने बड़ी गंभीर मुद्रा बनाई। माथे पर चिंता की रेखाएं खींचीं। मंत्रीगण को बुलाया। समितियां बनीं। रिपोर्ट तैयार हुई। अध्ययन दल भेजे गए। विशेषज्ञ बुलाए गए।
पूरे राज्य को लगा कि अब तो साहूकार की खैर नहीं।
कुछ दिनों बाद राजा ने साहूकार को दरबार में बुलाया और सबके सामने डांटते हुए कहा—
“तुमने जनता पर अत्याचार किया है। दस रुपये की रोटी नहीं बिकेगी।”
जनता खुशी से झूम उठी।
फिर राजा ने घोषणा की—
“अब से रोटी पांच रुपये में बिकेगी।”
पूरा राज्य तालियों से गूंज उठा।
लोग एक-दूसरे को मिठाई खिलाने लगे।
“देखा, हमारे राजा ने 50 प्रतिशत की छूट दिलवा दी!”
“वाह! क्या जनहितैषी फैसला है!”
“राजा जिंदाबाद!”
साहूकार ने सिर झुकाकर आदेश स्वीकार कर लिया।
जनता घर चली गई।
लेकिन जब रात हुई, तब राजा और साहूकार दोनों अपने-अपने महलों में बैठकर मुस्कुरा रहे थे।
साहूकार सोच रहा था—
“एक रुपये से सीधे पांच रुपये पर पहुंच गया।”
राजा सोच रहा था—
“दस रुपये से पांच रुपये कराया, इसलिए जनता मुझे मसीहा मान रही है।”
और जनता?
जनता सोच रही थी—
“अगर राजा न होते तो रोटी दस रुपये की मिलती।”
किसी ने यह नहीं पूछा कि रोटी आखिर एक रुपये से पांच रुपये तक पहुंची कैसे।
अब आते हैं झारखंड की ओर
झारखंड की जनता भी कई बार खुद को उसी कहानी का पात्र महसूस करती है।
कभी होल्डिंग टैक्स बढ़ता है।
कभी सर्किल रेट बढ़ता है।
कभी बिजली का बिल नया फार्मूला लेकर आता है।
कभी कोई नया शुल्क जन्म ले लेता है।
फिर जनता विरोध करती है।
व्यापारी संगठन प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं।
ज्ञापन दिए जाते हैं।
धरना होता है।
मीडिया में बहस चलती है।
फिर सरकार समीक्षा समिति बनाती है।
अधिकारी बैठक करते हैं।
घोषणा होती है—
“जनहित में राहत दी जाएगी।”
फिर कुछ प्रतिशत कम हो जाता है।
जनता खुश।
सरकार खुश।
और फाइलें भी खुश।
ट्रैफिक व्यवस्था या वसूली व्यवस्था?
झारखंड के आम आदमी की एक और शिकायत रहती है।
वह कहता है कि ट्रैफिक व्यवस्था का उद्देश्य सड़कें सुचारू करना होना चाहिए।
लेकिन कई बार उसे ऐसा लगता है कि सड़क पर ट्रैफिक कम और चालान अधिक दिखाई देते हैं।
किसी चौक पर हेलमेट अभियान।
दूसरे चौक पर सीट बेल्ट अभियान।
तीसरे चौक पर प्रदूषण अभियान।
चौथे चौक पर दस्तावेज अभियान।
जनता कहती है—
“साहब, सड़क तो टूटी हुई है।”
जवाब मिलता है—
“पहले लाइसेंस दिखाइए।”
जनता कहती है—
“सिग्नल ही नहीं है।”
जवाब मिलता है—
“पहले आरसी दिखाइए।”
ऐसे में आम नागरिक कभी-कभी मजाक में कह देता है कि ट्रैफिक प्रबंधन का सबसे विकसित हिस्सा शायद वसूली प्रबंधन है।
हालांकि सरकार का पक्ष यह रहता है कि नियमों का पालन और सड़क सुरक्षा के लिए यह जरूरी है।
लेकिन व्यंग्य का जन्म वहीं होता है जहां जनता और व्यवस्था की अपेक्षाओं में अंतर पैदा हो जाता है।
200 यूनिट बिजली मुफ्त और 2500 रुपये का सम्मान
लोकतंत्र का एक दिलचस्प पक्ष यह भी है कि जनता से कर भी लिया जाता है और फिर विभिन्न योजनाओं के माध्यम से लाभ भी दिया जाता है।
एक तरफ कोई कहता है—
“बिजली बिल बढ़ गया।”
दूसरा कहता है—
“लेकिन 200 यूनिट मुफ्त मिल रही है।”
एक तरफ कोई कहता है—
“टैक्स बढ़ गया।”
दूसरा कहता है—
“लेकिन खाते में योजना का पैसा भी तो आ रहा है।”
तीसरा व्यक्ति मुस्कुराकर कहता है—
“पहले सरकारें चुनाव के समय चुपचाप मदद करती थीं, अब बाकायदा योजना बनाकर देती हैं।”
चौथा जवाब देता है—
“अब सब कुछ डिजिटल हो गया है। पैसा भी ऑनलाइन और वोट भी ऑनलाइन मूड देखकर।”
जनता आखिर चाहती क्या है?
जनता बहुत सरल चीज चाहती है।
उसे यह समझना है कि टैक्स क्यों बढ़ा।
किस आधार पर बढ़ा।
उस पैसे का उपयोग कहां होगा।
और अगर बढ़ोतरी जरूरी थी तो कितनी जरूरी थी।
जब पारदर्शिता बढ़ती है, तब विरोध कम होता है।
जब संवाद बढ़ता है, तब अविश्वास घटता है।
लेकिन जब फैसले अचानक आते हैं और बाद में राहत पैकेज भी अचानक आता है, तब राजा और साहूकार वाली कहानी लोगों को याद आने लगती है।
अंतिम व्यंग्य
आज भी उस पुराने राज्य में पांच रुपये की रोटी बिक रही है।
जनता खुश है कि दस रुपये से बच गई।
राजा खुश है कि जनता खुश है।
साहूकार खुश है कि एक रुपये वाली रोटी अब पांच रुपये में बिक रही है।
और राज्य के बुद्धिजीवी अब भी चौपाल पर बैठकर यही चर्चा कर रहे हैं—
“असल जीत किसकी हुई?”
राजा की?
साहूकार की?
या उस जनता की, जिसने पहले विरोध किया, फिर राहत पर ताली बजाई और आखिर में घर जाकर चैन की नींद सो गई?
शायद लोकतंत्र का सबसे बड़ा रहस्य भी यही है कि हर पक्ष खुद को विजेता समझता है, और कहानी अगले अध्याय की प्रतीक्षा करती रहती है।
Note: यह एक व्यंग्यात्मक (Satirical) लेख है। यह हास्य-व्यंग्य की शैली में लिखा गया है और किसी व्यक्ति, सरकार या संस्था पर तथ्यात्मक आरोप नहीं लगाता, बल्कि नीतियों और जन-मानस की प्रतिक्रियाओं पर कटाक्ष करता है।






































