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“अंतरात्मा है तुम्हारी जिसकी दुहाई देते हो? साथ नहीं किसी के तुम, अपना स्वार्थ निभाते हो।।

On: June 24, 2026 9:16 PM
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“अंतरात्मा है तुम्हारी
जिसकी दुहाई देते हो ?
साथ नहीं किसी के तुम
अपना स्वार्थ निभाते हो।।

झारखंड नहीं जेब अपना
लक्ष सदा तुम रखते हो।
कंही निगाहें कंही निशाना
सदा ही तुम साधते हो।।

चिकनी चुपड़ी बातें करके
सबका मन लुभाते हो।
पूर्वजों की कुर्बानी का
छाती पीट के गाते हो।।

युवाओं की जज्बातों से
झारखंडी आग लगाते हो।
निर्णय की जब आती बारी
कैसे फिर बिक जाते हो?

सच में आज कोई पूछे तो
राजनीति क्या परिभाषा है ?
क्या सिद्धांत है लोक तंत्र है
क्या जनता की भरोसा है?

या रखैल है पूंजी पतियों का
जो भी मन परिभाषित करे ?
निरीह जनता को निगल जाएं
आशाओं को निष्पेसित करे?

कवि परिचय

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करुणामय मंडल झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के पोटका क्षेत्र के सामाजिक एवं जनसरोकारों से जुड़े व्यक्तित्व हैं। वे पूर्व जिला पार्षद रह चुके हैं तथा सामाजिक, राजनीतिक और जनहित के मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखने के लिए जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में समाज, राजनीति, लोकतंत्र और आम जनता की पीड़ा का यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है। प्रस्तुत कविता में उन्होंने राजनीतिक स्वार्थ, अवसरवादिता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास पर तीखा प्रहार किया है।

भावार्थ

कवि करुणामय मंडल अपनी कविता में उन नेताओं और राजनीतिक व्यक्तियों पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं जो जनता के सामने नैतिकता, अंतरात्मा और सिद्धांतों की बातें तो करते हैं, लेकिन व्यवहार में केवल अपने स्वार्थ को महत्व देते हैं।

कवि कहते हैं कि ऐसे लोग झारखंड और उसकी जनता के विकास की चिंता करने के बजाय अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और लाभ को प्राथमिकता देते हैं। उनकी कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है। वे मीठी-मीठी बातें करके जनता का विश्वास जीत लेते हैं, लेकिन अवसर आने पर अपने वादों और सिद्धांतों से पीछे हट जाते हैं।

कविता में यह भी कहा गया है कि कुछ राजनेता अपने पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान का बार-बार उल्लेख करते हैं तथा युवाओं की भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। किंतु जब जनता के हित में कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने का समय आता है, तब वे अपने आदर्शों को त्यागकर स्वार्थ के हाथों बिक जाते हैं।

दूसरे भाग में कवि लोकतंत्र और राजनीति की वर्तमान स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठाते हैं। वे पूछते हैं कि आखिर राजनीति की वास्तविक परिभाषा क्या रह गई है? क्या यह वास्तव में लोकतंत्र और जनता के विश्वास पर आधारित व्यवस्था है, या फिर पूंजीपतियों के प्रभाव में संचालित एक ऐसी व्यवस्था बन चुकी है जो आम लोगों की आशाओं और सपनों को कुचल देती है?

कवि का मानना है कि यदि राजनीति जनसेवा और लोककल्याण से भटककर केवल धन और सत्ता का माध्यम बन जाए, तो सबसे अधिक नुकसान आम और कमजोर जनता को ही उठाना पड़ता है। उनकी उम्मीदें टूट जाती हैं और लोकतंत्र का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है।

कविता का संदेश

इस कविता के माध्यम से कवि समाज और राजनीतिक नेतृत्व को आत्ममंथन करने का संदेश देते हैं। वे चाहते हैं कि राजनीति में ईमानदारी, सिद्धांत, जनसेवा और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान बना रहे। साथ ही जनता को भी सजग और जागरूक रहकर ऐसे नेताओं की पहचान करनी चाहिए जो केवल भाषणों से नहीं, बल्कि अपने कार्यों से जनता के हित में काम करते हों।

कविता का मूल संदेश है कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब राजनीति स्वार्थ से ऊपर उठकर जनकल्याण और नैतिक मूल्यों पर आधारित होगी।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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