
जमशेदपुर, 24 जून 2026। Tata Motors से जुड़े कंवाई चालकों का धरना लगातार 28वें महीने में प्रवेश कर चुका है। धरने का नेतृत्व कर रहे मजदूर प्रतिनिधि ज्ञान सागर प्रसाद ने प्रेस के नाम जारी बयान में कहा है कि कंवाई चालकों की विभिन्न मांगें वर्षों से लंबित हैं, जिन पर अब तक संतोषजनक समाधान नहीं निकल पाया है।

ज्ञान सागर प्रसाद के अनुसार, कंवाई चालक न्यूनतम मजदूरी, बैंक भुगतान, बोनस अथवा एक्स-ग्रेशिया, पीएफ, बीमा और अन्य श्रमिक सुविधाओं की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। उनका कहना है कि जिन ट्रांसपोर्ट कंपनियों के माध्यम से चालकों से कार्य कराया जाता है, उन्हें श्रम कानूनों के तहत सभी वैधानिक सुविधाएं प्रदान करनी चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में चालकों को मिलने वाली मजदूरी सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से काफी कम है। उनके अनुसार, एक माह पहले तक चालकों को 24 घंटे के कार्य के एवज में लगभग 370 रुपये दिए जाते थे, जिसे बढ़ाकर 476 रुपये किया गया है। जबकि सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी इससे कहीं अधिक है।
धरना दे रहे चालकों ने यह भी सवाल उठाया है कि जब अन्य श्रमिकों को आठ घंटे के कार्य के आधार पर वेतन, पीएफ, बोनस, बैंक भुगतान और बीमा जैसी सुविधाएं मिलती हैं, तो कंवाई चालकों को इन अधिकारों से वंचित क्यों रखा जा रहा है।
ज्ञान सागर प्रसाद ने कहा कि पीएफ से संबंधित मामला वर्तमान में धनबाद स्थित पीएफ न्यायालय में विचाराधीन है। वहीं नई गाड़ियों के थर्ड पार्टी इंश्योरेंस की व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने आपत्ति जताई और दावा किया कि दुर्घटना की स्थिति में न तो ट्रांसपोर्टर और न ही चालक को अपेक्षित लाभ मिल पाता है।
उन्होंने टाटा मोटर्स के कुछ अधिकारियों पर भी गंभीर आरोप लगाए और कहा कि उनकी नीतियों के कारण चालक धरने पर बैठने को मजबूर हुए हैं। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों अथवा टाटा मोटर्स प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त नहीं हुई है।
धरना दे रहे चालकों का कहना है कि यह आंदोलन केवल मजदूरी का नहीं, बल्कि सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों और श्रमिक अधिकारों की लड़ाई है। उनका दावा है कि इस मुद्दे को लेकर उनकी आवाज रांची उच्च न्यायालय तक पहुंच चुकी है और जब तक मांगों का समाधान नहीं होता, आंदोलन जारी रहेगा।
कंवाई चालकों के आंदोलन ने श्रमिक अधिकारों, न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजरें टाटा मोटर्स प्रबंधन, श्रम विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित सरकारी एजेंसियों की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।












































