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झारखंड में होल्डिंग टैक्स (Property Tax): 2017 – 2026

On: June 23, 2026 8:14 PM
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Jharkhand Property Tax, 2017 to 2026: झारखंड में होल्डिंग टैक्स (Property Tax) और जमीन/मकान के सर्किल रेट (सरकारी न्यूनतम मूल्य) के निर्धारण और उनके बदलावों का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। जनता के विरोध और आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए सरकारों ने समय-समय पर दरों में वृद्धि की और बाद में उनमें आंशिक राहत या कटौती भी की।

झारखंड होल्डिंग टैक्स और सर्किल रेट का इतिहास

1. वर्ष 2017: बड़ा बदलाव और टैक्स में भारी वृद्धि

  • क्या हुआ: तत्कालीन रघुवर दास सरकार ने वर्ष 2017 में होल्डिंग टैक्स की गणना के लिए नया फॉर्मूला (Arrived Rate/Capital Value आधारित) लागू किया था।
  • असर: इसके कारण शहरी क्षेत्रों में होल्डिंग टैक्स में अप्रत्याशित रूप से कई गुना तक की बढ़ोतरी हो गई। जनता और व्यापारियों द्वारा इस अत्यधिक वृद्धि का पूरे राज्य में (विशेषकर हजारीबाग, रांची और धनबाद में) भारी विरोध और आंदोलन किया गया।

2. वर्ष 2021-2022: सर्किल रेट से टैक्स लिंक करने का फैसला और विरोध

  • क्या हुआ (सितंबर 2021): हेमंत सोरेन सरकार ने कैबिनेट में ‘झारखंड नगरपालिका संपत्ति कर (निर्धारण, संग्रहण और वसूली) नियमावली 2021’ को मंजूरी दी। इसके तहत होल्डिंग टैक्स को सीधे जमीन के सर्किल रेट (Circle Rate) से जोड़ दिया गया।
  • असर (मई 2022): जैसे ही यह नियम धरातल पर उतरा, आवासीय और विशेषकर व्यावसायिक संपत्तियों का होल्डिंग टैक्स अचानक से बहुत ज्यादा बढ़ गया। कोरोना काल के तुरंत बाद आई इस आर्थिक मार का चौतरफा विरोध शुरू हुआ।

3. अक्टूबर 2022: जनता को राहत और टैक्स वृद्धि पर रोक (कटौती)

  • क्या हुआ: चौतरफा राजनीतिक और नागरिक दबाव के बाद, अक्टूबर 2022 में (दीपावली से ठीक पहले) राज्य सरकार ने बड़ा यू-टर्न लिया।
  • राहत/कटौती: नगर विकास विभाग ने मानगो नगर निगम, जुगसलाई, झुमरी तिलैया, डोमचांच समेत कई नगर निकायों में बढ़ाई गई होल्डिंग टैक्स की दरों पर तत्काल प्रभाव से रोक (Hold) लगा दी। इसके साथ ही व्यावसायिक परिसरों (जैसे जमशेदपुर के सैरात बाजार) के बढ़े हुए रेंट को पूरी तरह वापस लेकर 1985 की पुरानी दरों पर ही टैक्स/रेंट लेने का आदेश दिया गया, जो व्यापारियों के लिए बहुत बड़ी कटौती/राहत थी।

झारखंड होल्डिंग टैक्स एवं सर्किल रेट: महत्वपूर्ण पड़ाव (चार्ट)

वर्ष / समयनीति / सरकारी कदमटैक्स/दरों पर प्रभाववर्तमान स्थिति / राहत
2017रघुवर सरकार द्वारा नया होल्डिंग टैक्स फॉर्मूला लागू।टैक्स में अप्रत्याशित वृद्धि (कई गुना बढ़ोतरी)।जनता के भारी विरोध के बावजूद इसे वसूला गया।
सितंबर 2021हेमंत सरकार द्वारा होल्डिंग टैक्स को सर्किल रेट से जोड़ने की नियमावली पास।टैक्स की गणना का आधार जमीन का सरकारी मूल्य बना।भविष्य की बढ़ोतरी का आधार तैयार हुआ।
मई 2022सर्किल रेट आधारित नया टैक्स नियम पूरी तरह लागू।आवासीय और कमर्शियल टैक्स में भारी उछालचौतरफा विरोध और रोलबैक की मांग उठी।
अक्टूबर 2022सरकार द्वारा समीक्षा समिति का गठन और आदेश जारी।बढ़े हुए होल्डिंग टैक्स और रेंट पर तत्काल रोकव्यापारियों और आम जनता को बढ़ी दरों से राहत/कटौती दी गई।
2025 – 2026रियल एस्टेट और शहरीकरण के आधार पर सर्किल रेट का ऑनलाइन युक्तिकरण।प्रमुख शहरों (रांची, जमशेदपुर) के पॉश इलाकों में सर्किल रेट ₹2,000 से ₹8,000/sq.ft तक।आम जनता की सुविधा के लिए अब ‘Know Your Circle Rate’ पोर्टल से टैक्स पारदर्शिता लागू है।

“झारखंड में होल्डिंग टैक्स का सबसे विवादित मोड़ इसे सर्किल रेट से जोड़ना था। हालांकि सरकार ने जब भी इसमें अत्यधिक वृद्धि की, जनता के विरोध के बाद (विशेषकर अक्टूबर 2022 में) दरों पर रोक लगाकर या पुरानी व्यवस्था बहाल कर टैक्स में कटौती रूपी राहत प्रदान की।”

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होल्डिंग टैक्स और सर्किल रेट में बढ़ोतरी को लेकर जनता और सरकार के बीच हमेशा से एक बड़ा वैचारिक टकराव रहा है। आम नागरिक जहां इसे “जेब काटने का जरिया” या “नेताओं और की जेबें भरने का खेल” के रूप में देखते हैं, वहीं प्रशासनिक दृष्टिकोण से इसके पीछे विकास और बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का तर्क दिया जाता है।

इस विषय के दोनों पक्षों का निष्पक्ष विश्लेषण नीचे दिया गया है, जिससे आप खुद तय कर सकते हैं कि यह खेल क्या है:

जनता का दृष्टिकोण: “यह तिजोरी भरने और परेशान करने का खेल है”

आम जनता, व्यापारियों और मध्यम वर्ग का मानना है कि टैक्स में यह बढ़ोतरी पूरी तरह से अनुचित है। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हैं:

  • सुविधाओं के बिना टैक्स का बोझ: नागरिकों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि टैक्स कई गुना बढ़ाया जा रहा है, तो क्या नगर निगम सुविधाएं भी उसी अनुपात में दे रहा है? कई इलाकों में आज भी टूटी सड़कें, जलजमाव, खराब स्ट्रीट लाइट्स और कचरा प्रबंधन की लचर व्यवस्था है। ऐसे में भारी टैक्स वसूलना अन्यायपूर्ण लगता है।
  • सर्किल रेट से जोड़ने की विसंगति: जमीन का सर्किल रेट बाजार के उतार-चढ़ाव और सरकारी राजस्व (रजिस्ट्री) बढ़ाने के लिए तय होता है। इसे सीधे होल्डिंग टैक्स से जोड़ने का मतलब है कि अगर आपके इलाके की जमीन महंगी हो गई, तो भले ही आपकी आमदनी न बढ़ी हो, आपका टैक्स अपने आप बढ़ जाएगा। यह मध्यम वर्ग और पेंशनभोगियों पर सीधा आर्थिक प्रहार है।
  • भ्रष्टाचार की आशंका: जनता का एक बड़ा तबका यह मानता है कि टैक्स से आने वाले भारी-भरकम फंड का एक बड़ा हिस्सा जमीन पर विकास कार्यों में लगने के बजाय नौकरशाही, ठेकेदारों और जनप्रतिनिधियों के गठजोड़ की भेंट चढ़ जाता है।

सरकार और प्रशासन का दृष्टिकोण: “शहरी विकास के लिए वित्तीय मजबूरी”

दूसरी ओर, सरकार और शहरी निकायों (Municipal Corporations) का तर्क है कि शहरों को चलाने और उन्हें आधुनिक बनाने के लिए टैक्स बढ़ाना अनिवार्य है:

  • केंद्र सरकार और 15वें वित्त आयोग की शर्तें: भारत सरकार के वित्त आयोग के नियमों के मुताबिक, नगर निगमों को केंद्र से विकास अनुदान (Grants) तभी मिलता है जब वे अपने आंतरिक स्रोत (जैसे होल्डिंग टैक्स) से राजस्व बढ़ाते हैं। यदि राज्य सरकार टैक्स नहीं बढ़ाएगी, तो केंद्र से मिलने वाला करोड़ों का विकास फंड रुक जाएगा।
  • स्मार्ट सिटी और बुनियादी ढांचा: आधुनिक शहरों में ड्रेनेज सिस्टम, वाटर सप्लाई, पार्क, सीसीटीवी और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट जैसी बड़ी योजनाओं के लिए अरबों रुपये की जरूरत होती है। सरकार का तर्क है कि बिना टैक्स बढ़ाए इन सेवाओं को जारी रखना असंभव है।
  • समानता का तर्क: सर्किल रेट से टैक्स जोड़ने के पीछे सरकार का तर्क था कि पॉश (महंगे) इलाकों में रहने वाले अमीर लोग और पिछड़े इलाकों में रहने वाले गरीब लोग एक जैसा टैक्स न दें। जिसकी संपत्ति की कीमत ज्यादा है, वह ज्यादा टैक्स दे।

कौन सही, कौन गलत?

यदि इस पूरे मामले को निष्पक्षता से देखा जाए, तो टैक्स बढ़ाना गलत नहीं है, लेकिन जिस तरीके और अनुपात में इसे बढ़ाया गया, वह निश्चित रूप से गलत था और है। जब सरकारें बिना नागरिक सुविधाओं में सुधार किए अचानक टैक्स को कई गुना बढ़ा देती हैं, तो जनता का यह सोचना बिल्कुल स्वाभाविक है कि “यह सिर्फ तिजोरी भरने का खेल है।” यही कारण है कि 2022 में भारी विरोध के बाद सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े थे।

एक आदर्श व्यवस्था वह होती जहां टैक्स में बढ़ोतरी धीरे-धीरे (Gradual) होती और टैक्स के पैसे का सीधा असर सड़कों, सफाई और पानी की व्यवस्था में दिखाई देता। जब तक पारदर्शिता नहीं आएगी, जनता और सरकार के बीच का यह अविश्वास बना रहेगा।

“लेकिन सवाल अब भी यही है हर दो वर्षों में भारी बढ़ोत्तरी आखिर क्यों?”

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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