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झारखंड में Holding tax : सर्किल रेट आधारित व्यवस्था, बढ़ोतरी और राहत की पूरी कहानी

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On: June 23, 2026 7:47 PM
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Holding tax: झारखंड में होल्डिंग टैक्स को लेकर चल रही चर्चा अचानक नहीं शुरू हुई है। राज्य में संपत्ति कर की गणना को सर्किल रेट से जोड़ने का फैसला 2022 में लागू किया गया था, और इसी के बाद कई शहरी निकायों में लोगों की कर देनदारी में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली। बाद में 2023 में समीक्षा समिति ने भी टैक्स निर्धारण के तरीके में बदलाव की अनुशंसा की, जिससे यह साफ हुआ कि सरकार इस व्यवस्था को फिर से परखने की कोशिश कर रही है। इस पूरे मामले ने आम लोगों, व्यापारियों और नगर निकायों के बीच होल्डिंग टैक्स को एक बार फिर बहस का विषय बना दिया।

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सर्किल रेट से जुड़ गया होल्डिंग टैक्स

अप्रैल 2022 से झारखंड के नगर निकाय क्षेत्रों में होल्डिंग टैक्स वसूली का तरीका बदला गया। पहले तक कई जगहों पर टैक्स की गणना अपेक्षाकृत पुराने फार्मूले या स्थानीय आकलन के आधार पर होती थी, लेकिन नए नियम के तहत संपत्ति के सर्किल रेट को आधार बनाकर टैक्स तय किया जाने लगा। इसका सीधा असर यह हुआ कि जिन इलाकों में जमीन और मकानों का सर्किल रेट अधिक था, वहां होल्डिंग टैक्स भी अचानक ऊपर चला गया। यही वजह रही कि रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो और अन्य शहरी क्षेत्रों में लोगों ने बढ़े हुए कर बिलों को लेकर नाराजगी जताई।

सरकारी तर्क यह था कि संपत्ति मूल्य के वास्तविक स्तर के आधार पर टैक्स वसूली अधिक पारदर्शी होगी और नगर निकायों की आय भी मजबूत होगी। लेकिन आम उपभोक्ताओं के लिए यह बदलाव भारी साबित हुआ। खासकर मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए, जो वर्षों से एक तय रकम के हिसाब से टैक्स देते आ रहे थे, अचानक बढ़ा हुआ बिल देना मुश्किल हो गया। कई लोगों ने शिकायत की कि उनकी आवासीय संपत्ति पर टैक्स में अपेक्षाकृत ज्यादा वृद्धि हुई, जबकि व्यावसायिक संपत्तियों पर यह बढ़ोतरी और भी ज्यादा महसूस की गई।

किन लोगों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर

होल्डिंग टैक्स में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा असर शहरी इलाकों के मकान मालिकों और दुकानदारों पर पड़ा। आवासीय भवनों के लिए भी टैक्स में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि व्यावसायिक संपत्तियों में यह बोझ कई गुना बढ़ गया। कुछ रिपोर्टों में आवासीय भवनों के टैक्स में 15 प्रतिशत तक वृद्धि का उल्लेख मिलता है, जबकि व्यावसायिक भवनों के मामले में यह बढ़ोतरी चार गुना तक बताई गई। ऐसे में व्यापारिक प्रतिष्ठानों, छोटे दुकानदारों और किराए पर चलने वाले परिसरों पर अतिरिक्त दबाव बना।

इस बदलाव का असर केवल टैक्स बिल तक सीमित नहीं रहा। जब संपत्ति के सरकारी मूल्यांकन में बढ़ोतरी होती है, तो उसका प्रभाव कई अन्य वित्तीय दायित्वों पर भी पड़ता है। रजिस्ट्री, स्टांप ड्यूटी और संपत्ति लेन-देन की लागत भी ऊपर चली जाती है। इसलिए इस नीति को केवल कर सुधार के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि इसे शहरी संपत्ति बाजार और आम नागरिक की जेब से जुड़ा बड़ा बदलाव माना गया।

सरकार को क्यों लेना पड़ा रोक का फैसला

बढ़ते विरोध और शिकायतों के बाद सरकार को इस व्यवस्था पर पुनर्विचार करना पड़ा। अक्टूबर 2022 में कई नगर निकाय क्षेत्रों में बढ़ी हुई होल्डिंग टैक्स दरों पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे कारोबारियों और आम लोगों को तत्काल राहत मिल सके। जिन क्षेत्रों में टैक्स में असामान्य बढ़ोतरी हो रही थी, वहां पुराने स्तर या नियंत्रित दरों पर वसूली का रास्ता अपनाया गया।

सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की कि टैक्स प्रणाली को अधिक न्यायसंगत और संतुलित बनाया जाएगा। हालांकि, रोक के बावजूद यह मुद्दा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। लोगों के मन में यह सवाल बना रहा कि आखिर टैक्स का आधार क्या होना चाहिए—संपत्ति का बाजार मूल्य, सर्किल रेट, निर्माण का आकार या फिर स्थानीय उपयोगिता। यही अस्पष्टता इस पूरे विवाद का मूल कारण बनी रही।

2023 की समीक्षा समिति का सुझाव

2023 में समीक्षा समिति ने सर्किल रेट के औसत के आधार पर 20 प्रतिशत अतिरिक्त जोड़कर अधिकतम दर तय करने की अनुशंसा की। यह सुझाव अपने आप में बताता है कि पहले लागू की गई व्यवस्था को पूरी तरह स्थिर और संतुलित नहीं माना गया था। समिति का उद्देश्य ऐसा ढांचा तैयार करना था, जिसमें बहुत ज्यादा कर बोझ भी न पड़े और नगर निकायों को पर्याप्त राजस्व भी मिलता रहे। इसी कारण इस सुझाव को प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक अहम कदम माना गया।

यह अनुशंसा एक तरह से स्वीकार करती है कि सर्किल रेट आधारित कर व्यवस्था को और अधिक व्यावहारिक बनाने की जरूरत है। अगर टैक्स सीधे और कठोर तरीके से संपत्ति मूल्य से जोड़ दिया जाए, तो कई बार यह स्थानीय आर्थिक वास्तविकता से मेल नहीं खाता। खासकर उन इलाकों में जहां जमीन के दाम कागज पर बहुत बढ़ जाते हैं, लेकिन आम लोगों की आय उतनी तेजी से नहीं बढ़ती, वहां यह असंतुलन ज्यादा उभरकर सामने आता है।

2025 में भी राहत की चर्चा

2025 में भी झारखंड के शहरी क्षेत्रों में होल्डिंग टैक्स भुगतान को लेकर राहत की खबरें सामने आईं। ऑनलाइन टैक्स भुगतान करने पर अधिकतम 15 प्रतिशत छूट की जानकारी चर्चा में रही। इससे यह संकेत मिला कि सरकार टैक्स संग्रह को आसान बनाने के साथ-साथ समय पर भुगतान करने वालों को प्रोत्साहन देने की कोशिश कर रही है। यह नीति थोड़ी राहत जरूर देती है, लेकिन मूल समस्या का समाधान नहीं करती, क्योंकि टैक्स की आधार दर अगर ज्यादा हो तो छूट के बावजूद कुल बोझ बना रहता है।

आम लोगों के लिए सबसे बड़ी जरूरत यह है कि टैक्स व्यवस्था साफ, स्थिर और पूर्वानुमेय हो। हर कुछ समय में नियम बदलने, सर्किल रेट जोड़ने या छूट-रोक लगाने से नागरिकों में भ्रम पैदा होता है। जब तक एक स्पष्ट और संतुलित फार्मूला नहीं बनता, तब तक होल्डिंग टैक्स का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर विवादित बना रहेगा।

झारखंड में होल्डिंग टैक्स की बढ़ोतरी कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि 2022 से शुरू हुई उस प्रक्रिया का हिस्सा थी जिसमें संपत्ति कर को सर्किल रेट से जोड़ा गया। इससे कई इलाकों में टैक्स का बोझ बढ़ा, खासकर शहरी और व्यावसायिक संपत्तियों पर। बाद में सरकार को रोक लगानी पड़ी और समीक्षा समिति को सुझाव देने पड़े, जिससे साफ हुआ कि मौजूदा ढांचे में संतुलन की कमी थी। आने वाले समय में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि क्या सरकार एक ऐसी व्यवस्था बना पाएगी जो राजस्व भी दे और आम नागरिक पर अनावश्यक बोझ भी न डाले।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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