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नगड़ी में किसानों का जन-आंदोलन: “एक मुट्ठी चावल और 10 रुपये” से अदालत तक लड़ाई तेज

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On: August 22, 2025 4:13 PM
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नगड़ी किसान आंदोलन: “एक मुट्ठी चावल और 10 रुपये” से शुरू हुई नई जंग, प्रचार – गाड़ी जब्ती का आरोप; पूर्व CM चम्पाई सोरेन 24 अगस्त को खेत में हल चलाएंगे

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रांची, नगड़ी।

नगड़ी की धरती पर किसानों का आंदोलन अब सिर्फ खेत-खलिहान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है। अपनी जमीन बचाने की लड़ाई को और तेज करने के लिए “नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति” ने अनोखी रणनीति अपनाई है। किसानों ने पूरे झारखंड के लोगों से अपील की है कि वे इस आंदोलन में “एक मुट्ठी चावल और 10 रुपये” का सहयोग दें।

किसानों की रणनीति:

बैठक के बाद समिति ने तय किया कि अब ग्रामीण अपने ही खेतों पर धरना देंगे और कानूनी लड़ाई भी अदालत में लड़ेंगे। लेकिन आर्थिक तंगी को देखते हुए उन्होंने कहा कि –

  • हर परिवार से एक मुट्ठी चावल सहयोग स्वरूप लिया जाएगा।
  • 10 रुपये की मदद से वे कोर्ट में अपने पक्ष की लड़ाई लड़ेंगे।
  • जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे सिर्फ चावल देकर भी समर्थन कर सकते हैं।

एक स्थानीय रैयत सीता कच्छप ने कहा –

“यह सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि हमारे पुरखों की पहचान और अस्तित्व की लड़ाई है। हमें समाज का साथ चाहिए।”

प्रशासन पर आरोप

किसानों का आरोप है कि प्रशासन ने उनकी प्रचार गाड़ी जब्त कर ली है। इससे आंदोलन की बात आम लोगों तक पहुंचाने में कठिनाई हो रही है। बावजूद इसके किसानों ने साफ कर दिया है कि वे पीछे नहीं हटेंगे और कोर्ट से लेकर खेत तक लड़ाई लड़ेंगे।

चम्पाई सोरेन का समर्थन

पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन आज नगड़ी पहुंचे और किसानों के संघर्ष को पूरी तरह जायज़ बताया। उन्होंने कहा –

“ये किसान सिर्फ जमीन नहीं, अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। सरकार सीएनटी एक्ट, ग्रामसभा और भूमि अधिग्रहण कानून का सीधा उल्लंघन कर रही है।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि अगर जमीन का अधिग्रहण 1957 में हुआ था और मुआवजा नहीं दिया गया, तो 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 24 (2) के मुताबिक यह जमीन किसानों को वापस मिलनी चाहिए। लेकिन राज्य सरकार इसके खिलाफ काम कर रही है।

सोरेन ने ऐलान किया कि वे 24 अगस्त को किसानों की जमीन पर हल चलाएंगे और आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेंगे।

  • आंदोलन में शामिल हुए लोग
  •  पूर्व मंत्री देव कुमार धान
  •  धर्मगुरु जगलाल पाहन
  •  नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति के सदस्य
  •  बड़ी संख्या में ग्रामीण

खास बातें:

  • किसानों ने “एक मुट्ठी चावल और 10 रुपये” का नारा दिया।
  •  आंदोलन अब सामाजिक अभियान का रूप ले रहा है।
  •  सरकार पर कानून तोड़ने और अवैध अतिक्रमण का आरोप।
  •  पूर्व सीएम चम्पाई सोरेन ने किसानों के संघर्ष को दिया समर्थन।

नगड़ी का यह आंदोलन सिर्फ जमीन की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का संघर्ष बन गया है। गरीब किसान समाज से सहयोग मांगकर यह संदेश दे रहे हैं कि छोटी-छोटी मदद भी बड़े संघर्ष को ताकत दे सकती है।

नगड़ी किसान आंदोलन का विस्तृत ग्राउंड-रिपोर्ट

“एक मुट्ठी चावल और 10 रुपये—ज़मीन-बचाओ, अस्तित्व-बचाओ”

नगड़ी में चल रहा किसानों का आंदोलन अब खेतों की मेड़ पार कर समाज की चौपाल तक पहुँच चुका है। “नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति” ने रणनीति बदली है—लड़ाई अब सड़क से अदालत तक, और संसाधन समाज की भागीदारी से जुटेंगे। हर घर से एक मुट्ठी चावल और 10 रुपये की सहयोग-अपील ने इस संघर्ष को एक जन-आंदोलन में बदलना शुरू कर दिया है।

क्या बदला, क्यों बदला?—आंदोलन की नई रूपरेखा

खेत पर धरना: ग्रामीण कल से अपनी-अपनी जमीन पर ही धरना देंगे—यानी संघर्ष की सीधी साइट-ऑफ-डिस्प्यूट पर शांतिपूर्ण बैठकी।

 अदालती लड़ाई: समिति ने साफ किया—अवैध अतिक्रमण के आरोप को वे कोर्ट में चुनौती देंगे।

 समर्थन का मॉडल: संसाधनों की कमी को देखते हुए “एक मुट्ठी चावल + 10 रुपये” का मॉडल अपनाया गया—इच्छुक परिवार सिर्फ चावल देकर भी समर्थन कर सकते हैं।

स्थानीय रैयत सीता कच्छप का कहना है—यह सिर्फ जमीन नहीं, पहचान और पुरखों की धरोहर का सवाल है; समाज का साथ जरूरी है।

  • किसानों के आरोप—प्रशासन पर सख्त सवाल
  •  प्रचार-गाड़ी जब्त: किसानों का आरोप है कि प्रशासन ने उनके प्रचार वाहन को जब्त कर लिया, जिससे सूचना-संचार बाधित हुआ।
  • अतिक्रमण का विवाद: ग्रामीणों का दावा—बिना विधिक प्रक्रिया के उनकी खेती योग्य जमीन पर तार-बाड़ खड़े किए जा रहे हैं।

नोट: प्रशासन का पक्ष समाचार लिखे जाने तक उपलब्ध नहीं हो सका; उपलब्ध होते ही जोड़ा जाएगा।

  • समाज का स्वर—“यह जमीन नहीं, अस्तित्व की लड़ाई”
  • आदिवासी-मूलवासी समुदाय के बीच यह भावना प्रबल है कि विस्थापन = आजीविका, संस्कृति और सामाजिक सुरक्षा का नुकसान।
  • सामुदायिक सहायता को सम्मान की अर्थव्यवस्था के रूप में पेश किया गया—छोटा योगदान, बड़ी स्थिरता।
  • राजनीतिक समर्थन—पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन का बयान

नगड़ी पहुँचे पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने किसानों के हल-कुदाल और कृषि उपकरणों का निरीक्षण किया और कहा—

किसान जमीन नहीं, अस्तित्व बचा रहे हैं; सीएनटी एक्ट, ग्रामसभा के अधिकार, और भूमि-अधिग्रहण कानून के प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है।

यदि 1957 में अधिग्रहण का दावा हो भी, 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 24(2) के तहत जहाँ मुआवज़ा/कब्ज़ा पूर्ण न हुआ हो, वहाँ अधिग्रहण की कार्यवाही स्वतः निष्फल मानी जा सकती है—ऐसे में जमीन वापस करने का प्रावधान बनता है, उन्होंने कहा।

 24 अगस्त को वे किसानों की जमीन पर हल चलाने की घोषणा कर चुके हैं, प्रतीकात्मक रूप से भूमि अधिकार के पक्ष में।

इस मौके पर पूर्व मंत्री देव कुमार धान, धर्मगुरु जगलाल पाहन, संघर्ष समिति के सदस्य और बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

कानूनी परिप्रेक्ष्य—सरल भाषा में

 सीएनटी एक्ट (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम): परंपरागत समुदायों की जमीन की परिवर्तन/हस्तांतरण पर कड़े नियम; ग्रामसभा की भूमिका अहम।

 ग्रामसभा की स्वीकृति: अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि-संबंधी निर्णयों में ग्रामसभा का परामर्श/अनुमोदन प्रमुख माना जाता है।

 LARR Act 2013, धारा 24(2): यदि पुराने अधिग्रहण में पाँच वर्ष से अधिक समय बीत गया हो और

  1. मुआवज़ा वितरित न हुआ हो, या

  2. भौतिक कब्ज़ा न लिया गया हो,

तो अधिग्रहण निरस्त माना जा सकता है—ऐसी स्थिति में जमीन पुनः स्वामी/कृषक के पक्ष में जाती है।

कानूनी स्थिति अक्सर जटिल फैसलों/दस्तावेज़ों पर निर्भर करती है; अंतिम शब्द अदालत का होता है।

ग्राउंड-रियलिटी: संघर्ष का सामाजिक मॉडल

 लोक-भागीदारी वित्त: एक मुट्ठी चावल + 10 रुपये—कम बाधा, अधिक पहुँच।

सांस्कृतिक जुड़ाव: चावल (अनाज) को समर्थन के प्रतीक के तौर पर चुनना—आहार, अन्नदाता और अधिकार का त्रिकोण रचता है।

कम-लागत, उच्च-संप्रेषण: घर-घर सहभागिता से मौखिक/समुदायिक नेटवर्क सक्रिय होता है; प्रचार-वाहन जब्ती के असर को काउंटर किया जा रहा है।

आगे क्या?

  • कल से: किसानों का खेत-पर-धरना आरंभ।
  •  24 अगस्त: पूर्व CM चम्पाई सोरेन का प्रतीकात्मक हल-चलाना प्रस्तावित।
  •  अगला चरण: विधिक याचिका/आपत्ति दाखिल कर अदालती सुनवाई की तैयारी; समुदाय-स्तर पर सहयोग-संग्रह अभियान निरंतर।

पाँच बड़े सवाल

1. क्या प्रशासन ने ग्रामसभा/कानूनी प्रक्रिया का पूरा पालन किया?

2. 1957 अधिग्रहण का दस्तावेज़ी रिकॉर्ड—मुआवज़ा/कब्ज़ा का वास्तविक स्टेटस क्या है?

3. सीएनटी/भूमि-अधिग्रहण कानून के बीच समन्वय कैसे साधा गया?

4. पब्लिक ऑर्डर बनाम भूमि-अधिकार—शांतिपूर्ण धरनों पर स्थानीय पुलिस-प्रशासन की नीति क्या है?

5. वैकल्पिक समधान—मध्यस्थता/समझौता/पुनर्वास के विकल्पों पर सरकार की स्पष्ट योजना?

“खास बातें”

  • आंदोलन सामाजिक स्वरूप ले रहा; घरों से सहयोग जुटाने की पहल।
  • प्रचार-गाड़ी जब्ती पर किसानों का विरोध, अदालत जाने की तैयारी।
  • पूर्व CM का खुला समर्थन, 24 अगस्त को हल-चलाने का ऐलान।

 कानूनी धारा 24(2) की दुहाई—अधूरे/लंबित अधिग्रहण पर जमीन वापसी का तर्क।

छोटी मदद, बड़े मायने

नगड़ी का संघर्ष बताता है कि भूमि-अधिकार केवल संपत्ति नहीं, पहचान, संस्कृति और आजीविका का प्रश्न है। “एक मुट्ठी चावल और 10 रुपये” का मॉडल सम्मानजनक भागीदारी का रास्ता खोलता है—जहाँ हर घर, अपनी क्षमता जितना, न्याय की लड़ाई में हिस्सेदार बन सकता है।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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