“छात्रों में भी पक्षपात
ये कैसी राजनीत है।
ये तुम्हारे दोहरी चेहरे
गोलियारों में चर्चित है।।
देश के ये छात्रों की भी
क्या अद्भुत किस्मत है।
गठबंधन में उलझा ये
न्याय की बदसूरत है।।
ढाल नहीं बना किसी ने
सब ने लिया इनके आड़।
छात्रों के आड़ में शेर बने
दिए स्वार्थ की खूब दहाड़।।
दिल्ली में इस्तीफा मांगे
रांची में ना आए पास।
राजनीत का यही तकाजा
गठबंधन का ना टूटे विश्वास।।
देख रही जो देश की जनता
रांची में भी क्या वफ़ा होगा ?
दिल्ली जैसा रांची में भी
शिक्षा मंत्री इस्तीफा देगा ??”
– करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद पोटका, पूर्वी सिंहभूम झारखंड
पूर्व जिला पार्षद पोटका (पूर्वी सिंहभूम, झारखंड) करुणामय मंडल द्वारा रचित इस कविता का भावार्थ :
इस कविता के माध्यम से कवि करुणामय मंडल ने वर्तमान राजनीतिक माहौल और छात्र राजनीति पर तीखा व्यंग्य किया है। कवि का मुख्य उद्देश्य राजनीति में दोहरे मापदंड और स्वार्थी नीतियों की आलोचना करना है:
- राजनीति में छात्रों का उपयोग और पक्षपात: कवि कहते हैं कि आज की राजनीति में छात्रों के साथ भी पक्षपात किया जा रहा है। नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए छात्रों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन जब न्याय की बारी आती है, तो गठबंधन और राजनीतिक मजबूरियों के आगे न्याय व्यवस्था बदसूरत नजर आती है।
- स्वार्थी नेताओं की दहाड़: कविता की इन पंक्तियों में बताया गया है कि किसी भी दल या नेता ने कभी छात्रों को अपनी ढाल या सुरक्षा कवच नहीं बनाया, बल्कि सबने अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए छात्रों के नाम का सहारा लिया है। नेता छात्रों की आड़ में अपनी राजनीतिक रानियां और राजा बनकर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकते हैं और खूब दहाड़ते हैं।
- दोहरी नीति और राजनीतिक मजबूरियां: कवि ने दिल्ली और रांची की राजनीति के बीच के फर्क और विरोधाभास को उजागर किया है। एक तरफ जहां नेता दिल्ली में विरोधियों से इस्तीफे की मांग करते हैं, वहीं अपने राज्य या रांची में भ्रष्टाचार या विवाद आने पर वे चुप्पी साध लेते हैं या आरोपियों के बचाव में आ जाते हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए किया जाता है ताकि आपसी गठबंधन और राजनीतिक विश्वास पर कोई आंच न आए।
- जनता की नजर और सवाल: अंत में कवि देश और राज्य की जनता की ओर इशारा करते हुए पूछते हैं कि जनता सब देख रही है। क्या रांची में भी दिल्ली जैसा ही निष्पक्ष और कड़ा रुख अपनाया जाएगा, या फिर राजनीतिक समझौतों के तले सब कुछ दबा दिया जाएगा? क्या रांची में भी विवादों से घिरे शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ेगा?
संक्षेप में यह कविता राजनीतिक दलों द्वारा छात्रों के हितों के नाम पर की जाने वाली राजनीति और दोहरे चरित्र पर एक करारा सवाल उठाती है।








