
बचपन: यह कविता मानव जीवन के दो महत्वपूर्ण पड़ाव—बचपन और पचपन के बीच की यात्रा को बड़ी कोमलता से दर्शाती है। कवि आज के तनावपूर्ण, उत्तरदायित्वों से घिरे जीवन से थककर जब पीछे मुड़ता है, तो उसे बचपन की दुनिया एक शुद्ध, सरल और सच्ची दुनिया लगती है।

- जहां मस्ती थी, नो टेंशन था, न कोई डर था, न दिखावा।
- जहां रिश्ते सच्चे थे, शिक्षा खेलों में थी, और संस्कार व्यवहार में।
- जहां न कोई ईर्ष्या थी, न ही हिंसा, बस एक प्यारी सी बस्ती थी, जहां हर कोई खुश रहता था।
- यह कविता हर उम्र के व्यक्ति को अंदर से छूती है, जो कभी न कभी इस ‘गोलू-मोलू’ मासूम दुनिया में था।
करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद, पोटका (पूर्वी सिंहभूम, झारखंड) एक संवेदनशील विचारक, समाजसेवी और अनुभवों से परिपक्व लेखक हैं। उनकी रचनाओं में समाज की सच्चाइयों, मानवीय मूल्यों, और आत्मिक संवेदनाओं का सुंदर समावेश रहता है।
वे केवल राजनेता नहीं, बल्कि भावनाओं को काव्य के माध्यम से स्वर देने वाले एक जनकवि भी हैं, जो अपनी मिट्टी, स्मृतियों और संबंधों से गहराई से जुड़े हैं।
संपर्क: 9693623151
उनकी कविता केवल शौक नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद और आत्ममंथन का माध्यम है। वे जनप्रतिनिधि होकर भी जनभावनाओं के कवि हैं।
कविता: “अचानक जब देखा मैंने नटखट ये बचपन को…”
“अचानक जब देखा मैने
नटखट ये बचपन को।
मानो फिर से उछल दिया
उलझी हुई पचपन को।।
क्या खूब थी नो टेंशन की
दिन भर की वो मस्तियां।
अलग दुनिया अलग गांव
मानो थी अलग बस्तियां।।
उस बस्ती में हमारी भी
होती अलग सी हस्ती थी।
ना होती थी निगरानी वहां
ना किसी की गस्ती थी।।
परिवार-प्रेम खूब सिखा है
उसी खेल के जीवन में।
कर्म कर्तव्य बुजुर्ग भांति
संचित हुआ तन-मन में।।
स्वार्थ रहित उस शैशव में
शिक्षा संस्कार सब मिला।
कल्पना में सब सीखे थे
जीवन जीने की नई कला।।
हिंसा नहीं था शिशु मन में
था सब का हित सदा।
भाई बहन सहचर साथी
कितनी खुश रहे सर्वदा।।
संशय की इस पचपन से
उस राह जब मुड़ता हूं।
मानो वही गोलू-मोलू सी
अपने आप को पाता हूं।।
पचपन से फिसल के फिर
बचपन में आता हूं।
भुला इस आज की उलझन
गुनगुना के गाता हूं।।”
रचयिता: करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद पोटका, पूर्वी सिंहभूम, झारखंड
भावनात्मक पहलू:
यह कविता बचपन की मासूमियत और पचपन की उलझनों के बीच के अंतर को बड़ी ही कोमलता और आत्मीयता से दर्शाती है। कवि जब वर्तमान के व्यस्त, तनावपूर्ण और संशयग्रस्त जीवन को देखता है, तो उसे अपना भोला, नटखट, स्वतंत्र और निस्वार्थ बचपन याद आ जाता है।
कविता के हर छंद में वो बाल्यकाल की निश्छलता, परिवार का प्रेम, बिना भय के खेलना और सीखना, और आपसी संबंधों की मधुरता झलकती है।
कवि कहता है कि उस बचपन में न कोई तनाव था, न ही कोई स्वार्थ, वहां केवल अपनापन और सच्ची मुस्कान थी।
आज की जटिल और तनावग्रस्त दुनिया से जब वह थकता है, तो वो यादें उसे फिर से जीने की प्रेरणा देती हैं।
यह कविता सिर्फ यादों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक आत्ममंथन है—कि क्या हम फिर से वैसा जीवन नहीं जी सकते जो निस्वार्थ, प्रेममय और सरल हो?
अर्थ
“नटखट बचपन” – स्वतंत्रता, उल्लास और कल्पनाशीलता का प्रतीक।
“उलझी पचपन” – जिम्मेदारियों, तनाव, सामाजिक प्रतिबद्धताओं से ग्रसित वर्तमान जीवन का चित्रण।
“नो टेंशन की मस्तियां” – बाल्यकाल की वो निश्छलता जो आज के जीवन में दुर्लभ है।
“ना निगरानी, ना गस्ती” – भरोसे और आज़ादी से भरा माहौल, जहां बच्चे अपनी दुनिया खुद बनाते थे।
“कर्म कर्तव्य बुजुर्ग भांति” – बाल्यकाल में ही जीवन मूल्यों का सीखना, जो आज के शिक्षा में भी कम पड़ता है।
“संशय की इस पचपन से…” – यह पंक्ति वर्तमान के असमंजस और आंतरिक द्वंद्व की ओर इशारा करती है।
कविता यह संकेत देती है कि बचपन केवल एक उम्र नहीं, बल्कि एक अवस्था है, जिसे हम चाहें तो आज भी आत्मा में जगा सकते हैं।
यह कविता हर उस व्यक्ति की आत्मा को स्पर्श करती है जिसने कभी सच्चा बचपन जिया हो। यह एक कालजयी संदेश है कि सादगी, प्रेम और निश्छलता में ही जीवन की असली कला छुपी है। करुणामय मंडल जी की यह प्रस्तुति सिर्फ कविता नहीं, बल्कि बचपन की गोद में लौटने का आह्वान है।
“चलो फिर से खुद में झांके, जहाँ अब भी बचपन मुस्कुराता है…”











































