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Sindh को भारत में शामिल करने की मांग को लेकर भारतीय जन महासभा ने सौंपा ज्ञापन

On: August 14, 2026 6:43 PM
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जमशेदपुर: Sindh को भारत में शामिल किए जाने की मांग को लेकर भारतीय जन महासभा के एक प्रतिनिधिमंडल ने संस्था के अध्यक्ष धर्म चंद्र पोद्दार के नेतृत्व में पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में सिंध को भारत का हिस्सा बनाए जाने की मांग उठाई गई है।

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प्रतिनिधिमंडल ने अपने ज्ञापन में कहा कि भारत के राष्ट्रगान में “पंजाब सिंध गुजरात मराठा…” पंक्ति का उल्लेख है। संस्था का कहना है कि राष्ट्रगान में सिंध का उल्लेख देश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ा हुआ है और इसे वर्तमान भौगोलिक स्थिति से जोड़कर देखा जाना चाहिए।

राष्ट्रगान में Sindh के उल्लेख को बनाया आधार

भारतीय जन महासभा की ओर से सौंपे गए ज्ञापन में राष्ट्रगान की पंक्ति “पंजाब सिंध गुजरात मराठा…” का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राष्ट्रगान में सिंध का नाम आज भी शामिल है।

प्रतिनिधिमंडल का तर्क है कि राष्ट्रगान में उल्लिखित इस पंक्ति को पूर्ण रूप से साकार करने के लिए सिंध को भारत में शामिल किया जाना चाहिए। संस्था ने इसी विचार को अपनी मांग का प्रमुख आधार बनाया है।

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि सिंध का भारत के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसलिए सिंध को लेकर उठाई गई यह मांग केवल भूमि से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विरासत से संबंधित विषय के रूप में देखी जानी चाहिए।

1947 के विभाजन का किया उल्लेख

ज्ञापन में वर्ष 1947 के भारत विभाजन का भी उल्लेख किया गया है। प्रतिनिधिमंडल की ओर से कहा गया कि विभाजन के दौरान पाकिस्तान के गठन के लिए भारत की भूमि का एक बड़ा हिस्सा अलग किया गया था।

ज्ञापन में संस्था ने अपना तर्क रखते हुए कहा कि विभाजन के समय मुस्लिम आबादी के अनुपात को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान को भूमि दी गई थी। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि इसके बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमान भारत में ही रह गए।

इसी आधार पर संस्था ने भूमि के बंटवारे से संबंधित अपना दृष्टिकोण प्रधानमंत्री के समक्ष रखा है।

भारत में रह गए मुसलमानों के हिस्से की भूमि का तर्क

ज्ञापन में भारतीय जन महासभा ने कहा कि विभाजन के समय जो मुसलमान भारत में रह गए, उनके हिस्से की भूमि भी पाकिस्तान के हिस्से में चली गई।

प्रतिनिधिमंडल ने इसी तर्क के आधार पर प्रधानमंत्री से मांग की है कि सिंध के रूप में भूमि वापस लेने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए। संस्था का कहना है कि इससे उनके अनुसार विभाजन से जुड़े भूमि संबंधी प्रश्न का समाधान हो सकता है।

यह मांग संस्था की ओर से ज्ञापन में रखे गए राजनीतिक और ऐतिहासिक तर्कों पर आधारित है।

प्रधानमंत्री से सिंध वापस लेने की मांग

प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री के नाम सौंपे गए ज्ञापन में स्पष्ट रूप से मांग की कि सिंध को भारत में वापस शामिल करने की दिशा में पहल की जाए।

संस्था का कहना है कि सिंध को भारत में शामिल किए जाने से राष्ट्रगान में उल्लिखित पंक्ति को उनके अनुसार वास्तविक भौगोलिक संदर्भ में पूरा किया जा सकेगा।

प्रतिनिधिमंडल ने इस मांग को न्याय के दृष्टिकोण से भी उचित बताया और कहा कि विभाजन के समय भूमि के बंटवारे को लेकर उनके द्वारा उठाए गए प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

ऐतिहासिक विरासत से जोड़कर देखी मांग

भारतीय जन महासभा ने सिंध को भारत से जोड़ते हुए उसके ऐतिहासिक महत्व का भी उल्लेख किया। सिंध क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीन सभ्यताओं और व्यापारिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है।

प्रतिनिधिमंडल का मानना है कि भारत के इतिहास और संस्कृति में सिंध की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इसी ऐतिहासिक जुड़ाव के आधार पर संस्था लंबे समय से सिंध को लेकर अपनी विचारधारा और मांग को सामने रखने का प्रयास कर रही है।

ज्ञापन के माध्यम से सरकार तक पहुंचाई बात

प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त से मुलाकात कर अपना ज्ञापन सौंपा और प्रधानमंत्री तक अपनी मांग पहुंचाने का आग्रह किया। उपायुक्त के माध्यम से ज्ञापन भेजे जाने के पीछे उद्देश्य केंद्र सरकार के समक्ष संस्था का पक्ष रखना बताया गया।

प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि केंद्र सरकार इस विषय पर संस्था द्वारा उठाए गए ऐतिहासिक और संवैधानिक पहलुओं पर विचार करे।

प्रतिनिधिमंडल में कई सदस्य रहे शामिल

ज्ञापन सौंपने वाले प्रतिनिधिमंडल में संस्था के अध्यक्ष धर्म चंद्र पोद्दार के अलावा कई सदस्य शामिल थे।

प्रतिनिधिमंडल में शिव शंकर पाल, राम अवतार अग्रवाल, विनय कुमार शर्मा, पी. के. श्रीवास्तव, अभिषेक बजाज, शिवात्मा तिवारी, पूजा कुमारी और संतोष कुमार गनेड़ीवाला सहित अन्य सदस्य मौजूद रहे।

सभी सदस्यों ने संस्था की ओर से रखी गई मांग का समर्थन किया और ज्ञापन के माध्यम से अपनी बात सरकार तक पहुंचाई।

सिंध को लेकर संस्था ने रखे अपने विचार

भारतीय जन महासभा की ओर से कहा गया कि सिंध को लेकर उसकी मांग लंबे समय से चले आ रहे ऐतिहासिक दृष्टिकोण पर आधारित है। संस्था का कहना है कि विभाजन के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच जो भौगोलिक बदलाव हुआ, उसके संदर्भ में सिंध को लेकर भी चर्चा होनी चाहिए।

प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन के माध्यम से केंद्र सरकार से इस विषय पर विचार करने का आग्रह किया है।

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय भावना का किया उल्लेख

ज्ञापन में राष्ट्रगान का उल्लेख करते हुए संस्था ने राष्ट्रीय भावना को अपनी मांग से जोड़ने का प्रयास किया। प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि राष्ट्रगान में भारत के विभिन्न क्षेत्रों और सांस्कृतिक पहचान का उल्लेख किया गया है।

इसी क्रम में सिंध का नाम भी राष्ट्रगान का हिस्सा है। संस्था का तर्क है कि सिंध को भारत में शामिल किए जाने से राष्ट्रगान की इस पंक्ति को उनके अनुसार भौगोलिक रूप से भी पूर्णता मिलेगी।

विभाजन के मुद्दे पर बहस की मांग

ज्ञापन में उठाई गई मांग 1947 के विभाजन से जुड़े जटिल ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रश्नों को भी सामने लाती है। प्रतिनिधिमंडल ने भूमि के बंटवारे और उस समय की जनसंख्या संरचना को आधार बनाकर अपना पक्ष रखा है।

संस्था ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए और सिंध को भारत में शामिल करने की दिशा में आवश्यक पहल की जाए।

हालांकि, सिंध वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है और इस प्रकार की मांग भारत-पाकिस्तान संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक राजनीतिक एवं कूटनीतिक प्रश्नों से जुड़ी हुई है।

ज्ञापन सौंपने का उद्देश्य

प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, ज्ञापन सौंपने का मुख्य उद्देश्य सरकार के सामने संस्था की मांग को औपचारिक रूप से रखना है। संस्था चाहती है कि सिंध से संबंधित उसके ऐतिहासिक तर्कों और विभाजन के दौरान हुए भूमि बंटवारे के मुद्दे पर केंद्र सरकार विचार करे।

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि उनकी मांग का उद्देश्य सिंध को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा को आगे बढ़ाना है।

आगे सरकार के रुख पर नजर

उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे जाने के बाद अब प्रतिनिधिमंडल की नजर केंद्र सरकार के रुख पर है। सरकार इस प्रकार के विषयों पर क्या निर्णय लेती है या कोई प्रतिक्रिया देती है, यह आगे स्पष्ट होगा।

फिलहाल भारतीय जन महासभा ने सिंध को भारत में शामिल करने की मांग को लेकर अपना पक्ष सरकार के समक्ष रखा है।

Sindh को भारत में शामिल करने की मांग को लेकर भारतीय जन महासभा ने पूर्वी सिंहभूम के उपायुक्त के माध्यम से प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। संस्था के अध्यक्ष धर्म चंद्र पोद्दार के नेतृत्व में पहुंचे प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रगान की “पंजाब सिंध गुजरात मराठा…” पंक्ति, 1947 के विभाजन और भूमि बंटवारे से जुड़े अपने तर्कों को ज्ञापन में प्रमुखता से रखा।

प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मांग की है कि सिंध को भारत में वापस शामिल करने की दिशा में पहल की जाए। संस्था ने इसे ऐतिहासिक विरासत और विभाजन से जुड़े भूमि संबंधी प्रश्न के समाधान से जोड़कर प्रस्तुत किया है।

ज्ञापन सौंपने के दौरान शिव शंकर पाल, राम अवतार अग्रवाल, विनय कुमार शर्मा, पी. के. श्रीवास्तव, अभिषेक बजाज, शिवात्मा तिवारी, पूजा कुमारी, संतोष कुमार गनेड़ीवाला सहित कई सदस्य मौजूद रहे। अब इस मांग पर केंद्र सरकार की ओर से किसी संभावित प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

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