
कोडरमा: वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल की याद में बुधवार को कोडरमा जिले में Black दिवस के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं एवं बुद्धिजीवियों ने भाग लिया। संगोष्ठी के दौरान आपातकाल के दौर को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण अध्याय बताते हुए उस समय लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों पर पड़े प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की ऐसी घटना थी, जिसने लोकतांत्रिक संस्थाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की अहमियत को और अधिक स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उस दौर में लोकतंत्र की रक्षा के लिए अनेक लोगों ने संघर्ष किया और अपने अधिकारों तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना किया।

लोकतंत्र सेनानियों को दी गई श्रद्धांजलि
संगोष्ठी की शुरुआत लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोकतंत्र सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित कर की गई। उपस्थित लोगों ने उन सभी व्यक्तित्वों के साहस, त्याग और बलिदान को नमन किया, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवाज उठाई।
वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र केवल एक शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों, स्वतंत्रता और संविधान के प्रति आस्था का प्रतीक है। ऐसे में लोकतंत्र की मजबूती के लिए समाज के प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
आपातकाल की घटनाओं को किया गया स्मरण
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल के विभिन्न पहलुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय देश में अनेक संवैधानिक और राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिले। उन्होंने कहा कि उस दौर से मिली सीख आज भी लोकतंत्र को मजबूत बनाने की प्रेरणा देती है।
वक्ताओं का कहना था कि इतिहास की घटनाओं को याद रखना इसलिए आवश्यक है ताकि भविष्य में लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए समाज हमेशा जागरूक बना रहे।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दिया गया जोर
संगोष्ठी में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा बताते हुए कहा गया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिक अपनी बात स्वतंत्र रूप से रख सकें और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का सम्मान किया जाए।
वक्ताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा केवल सरकार या किसी संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य है। समाज को संविधान के प्रति सम्मान और लोकतांत्रिक परंपराओं के संरक्षण के लिए सदैव जागरूक रहना चाहिए।
संविधान की गरिमा बनाए रखने का आह्वान
कार्यक्रम में संविधान की गरिमा और उसके मूल सिद्धांतों को बनाए रखने पर विशेष बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संविधान देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है और इसके आदर्शों का पालन करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि संविधान समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व जैसे मूल्यों को स्थापित करता है। इन मूल्यों को मजबूत बनाए रखने के लिए समाज को निरंतर प्रयास करना चाहिए।
लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण का लिया संकल्प
संगोष्ठी के दौरान उपस्थित लोगों ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, संविधान के सम्मान और नागरिक अधिकारों के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। वक्ताओं ने कहा कि लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है, जब समाज का प्रत्येक वर्ग संविधान के सिद्धांतों का सम्मान करते हुए लोकतांत्रिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाए।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सभी महान व्यक्तित्वों का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। उनके संघर्ष और बलिदान को सदैव स्मरण रखा जाना चाहिए।
लोकतंत्र सेनानियों को किया शत-शत नमन
संगोष्ठी के अंत में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोकतंत्र सेनानियों और महान विभूतियों को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उपस्थित लोगों ने उनके साहस, त्याग और समर्पण को याद करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए सदैव सजग रहने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा प्रत्येक नागरिक का साझा दायित्व है। लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत बनाए रखने के लिए समाज में जागरूकता, सहभागिता और संविधान के प्रति सम्मान की भावना निरंतर बनी रहनी चाहिए।





































