
व्यंग्य: करुणामय मंडल द्वारा रचित यह कविता “मईया सम्मान योजना” के तहत झारखंड सरकार की तरफ से दी जाने वाली सम्मान राशि के वितरण में हो रही अनियमितता, परेशानी और अव्यवस्था को दर्शाती है। यह कविता सिर्फ शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि हजारों माताओं की पीड़ा और व्यथा का स्वर है। कवि ने सरकारी तंत्र की जटिलताओं, लोगों की उम्मीदों, और ज़मीनी हकीकत को सरल शब्दों में भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।

कविता की हर पंक्ति में मातृशक्ति की उपेक्षा और असहायता की करुण पुकार सुनाई देती है। कभी सम्मान पाने की खुशी तो कभी फॉर्म भरकर भी कुछ न मिलने की मायूसी। इस रचना के माध्यम से कवि ने सरकार को व्यवस्था सुधारने का मार्मिक आग्रह किया है, ताकि जिनके नाम पर योजनाएं चलाई जाती हैं, उन्हें वास्तव में उसका लाभ भी मिल सके।
कविता: क्या योजना आया भाई, ये “मईया सम्मान”
क्या योजना आया भाई,
ये “मईया सम्मान”।
कार्यालय का चक्कर काट,
मईया हैं परेशान।।
एक हजार से ढाई हजार,
बढ़ा सम्मान राशि।
नई सरकार बांटी सब से,
अपनी जीत की खुशी।।
बेरोकटोक ऐसे भरा गया,
मईयाओं के फॉर्म।
बन गई अब “गले की हड्डी”,
सारी हेकड़ी खत्म।।
आधा को मिले लाभ इसकी,
आधा हो रही परेशान।
वाह झारखंड सरकार की,
अद्भुत मईया सम्मान।।
किसी को मिला ढाई हजार,
किसी को साढ़े सात।
जितनी मईया उतनी सुनो,
अलगअलग बात।।
जिसको मिला सम्मान राशि,
उस मईया की खुशी।
जिसे राशि ना मिला पाया,
उनकी है मायूसी।।
कभी पंचायत, कभी ब्लॉक,
कभी दौड़े जिला।
परेशान हैं ना पाने वाली,
अद्भुत ये सिलसिला।।
सामाजिक सुरक्षा विभाग,
हो गया भीड़भाड़।
कर्मचारी सुने सुबहशाम,
मईयाओं के दहाड़।।
पेंशन के काम में नियुक्त हैं,
मात्र तीन कर्मचारी।
जिले के लाखों मईयाओं की,
भार पड़ रही है भारी।।
खुलते ऑफिस, लंबी लाइन,
ना मिला सम्मान राशि।
चेक कराए, कोई कारण पूछे,
सुबह से भूखीप्यासी।।
ये कितनों करे, ना हो पाता,
समस्या का समाधान।
ऐसे में कैसे मिल सके,
मईयाओं को सम्मान।।
व्यवस्था को दुरुस्त करे,
हो सके तो सरकार।
वरना मईया परेशान रहेंगी,
सब होगा बेकार।।
भावार्थ :
यह कविता झारखंड की “मईया सम्मान योजना” की वास्तविक ज़मीनी तस्वीर को सामने लाती है। कवि ने बहुत ही सहज भाषा में यह दिखाया है कि जब सरकारें बड़ेबड़े वादे करती हैं, तो आम लोग उन पर भरोसा कर लेते हैं, लेकिन उस भरोसे के साथ जब उन्हें ठोकरें मिलती हैं, तब तक वे थक चुके होते हैं।
यह रचना सिर्फ शिकायत नहीं है, बल्कि एक सार्थक सुझाव और संवेदनशील चेतावनी भी है कि योजनाएं तभी सार्थक होती हैं जब उनका लाभ जरूरतमंदों तक बिना बाधा पहुंचे।
कविता अंत में सरकार से व्यवस्था सुधारने की अपील करती है – क्योंकि “यदि व्यवस्था ठीक नहीं होगी, तो योजना का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा।”
यह आवाज़ सिर्फ एक पूर्व जिला पार्षद की नहीं, बल्कि हर उस ‘मईया’ की है जो सुबह से भूखीप्यासी लाइन में लगी है, सम्मान की आस में।












































