
श्रद्धांजलि: भारत की आज़ादी का इतिहास शहीदों के बलिदान और त्याग से भरा हुआ है। हर वर्ष जब हम 15 अगस्त – स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, तब हमारी आँखों के सामने उन वीर सपूतों की तस्वीरें उभर आती हैं जिन्होंने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

इन्हीं शहीदों के प्रति अपनी गहन श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करते हुए कवि गोपाल बृजनंदन ने अपनी मार्मिक कविता “ऐ क्रांतिबीर तू समर बीर” के माध्यम से अमर बलिदानियों को नमन किया है।
शहीदों को नमन
ऐ क्रांतिबीर तू समर बीर
तुम्हें शत शत आज नमन करते,
इस देश की माटी कण-कण को,
हम आज तुन्हें अर्पण करते..
तूने प्राण गंवाए हंसते हसते,
सूली चढ़ गए आए न भरके।
छोड़ गए हो देश की थाती,
देकर हमे अमिट आजादी।।
पुष्प चढ़ाकर दीप जलाकर,
हम, तिलक और चंदन करते–
ऐ क्रांतिबीर-
जब जंजीर गुलामों की हाथों में,
पैरों में बेड़ी पहनी थी।
भारत माता कराह रही थी,
वर्षों से रोदन करती थी।।
प्राण न्योछावर कर दी तुमने
अंत समय लड़ते-लड़ते-
ऐ क्रांतिबीर-
शैल राज तू शीष झुका ले,
सिंधु धार तू पग प्रक्षाल दे।
ऐ कोटि सूर्य ऐ कोटि चंद्र,
ऐ सुनो व्योम तू नवल ताल दे ।
ऐ पवन आज तू उनकी याद में,
फुलों का वर्षण कर दे ।।
ऐ क्रातिबीर—
– गोपाल बृजनंदन
कविता का संदेश
कवि अपने शब्दों में उन वीरों की याद दिलाते हैं जिन्होंने हंसते-हंसते फाँसी का फंदा चूमा और मातृभूमि के लिए हंसते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
कविता में शहीदों के अमिट योगदान को पुष्प, दीप और तिलक के रूप में श्रद्धांजलि दी गई है।
कवि प्रकृति को भी संबोधित करते हुए कहते हैं कि पर्वत शीश झुका ले, समुद्र अपने जल से उनके चरण धोए और पवन उनके नाम पर पुष्पवर्षा करे।
यह केवल श्रद्धांजलि ही नहीं बल्कि राष्ट्रप्रेम का संकल्प भी है कि हम शहीदों की थाती – स्वतंत्रता – को सहेजकर रखें।

आपको बता दें कि इस कविता के कवि श्री गोपाल बृजनंदन (गोपाल कृष्ण) जी झारखंड प्रशासनिक सेवा में इंस्पेक्टर के पद पर बागबेड़ा, जिला पूर्वी सिंहभूम में सेवारत हैं।
शहीदों की विरासत और आज की पीढ़ी
कवि गोपाल बृजनंदन कविता के माध्यम से कहता है कि – आजादी के 78 वर्षों बाद भी हमें यह याद रखना होगा कि स्वतंत्रता केवल उत्सव नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी भी है। शहीदों ने जो आज़ादी हमें दी, उसका अर्थ तभी सार्थक होगा जब हर नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करेगा।
राष्ट्रहित सर्वोपरि
आज की पीढ़ी के लिए यह कविता एक प्रेरणा संदेश है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है।
स्वतंत्रता दिवस पर गोपाल बृजनंदन की यह कविता हमें न केवल अतीत के बलिदानों की याद दिलाती है, बल्कि हमें यह भी सिखाती है कि आजादी का मूल्य समझें और उसे बनाए रखने के लिए सदैव जागरूक रहें।
शहीदों की पावन स्मृति को नमन करते हुए –
“वो शहीद ही थे, जिनके रक्त से यह धरती लाल हुई और जिनकी कुर्बानियों से भारत आज़ाद हुआ।”













































