
चक्रधरपुर: Goilkera प्रखंड में वर्षों से अधूरी पड़ी सड़क निर्माण योजना को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश आखिरकार खुलकर सामने आ गया। बुधवार को प्रभावित ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने ग्रामीण कार्य विभाग (REO) कार्यालय, चक्रधरपुर के समक्ष शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन कर विभाग के खिलाफ अपनी नाराजगी जताई। प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि करीब 8 वर्षों से अधूरी पड़ी सड़क निर्माण योजना को अविलंब पूरा किया जाए, ताकि क्षेत्र के लोगों को बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी परेशानियों से राहत मिल सके।

इस आंदोलन का नेतृत्व मनोहरपुर विधानसभा के पूर्व प्रत्याशी और आजसू नेता डॉ. दिनेश चंद्र बोयपाई ने किया। बड़ी संख्या में ग्रामीणों की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि यह सिर्फ एक सड़क का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और रोजमर्रा के जीवन से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है।
₹4.56 करोड़ की लागत से स्वीकृत हुई थी 7.33 किलोमीटर सड़क
ग्रामीणों ने बताया कि गोइलकेरा-मनोहरपुर मुख्य सड़क से आमजरण होते हुए कैरम, मिंडीसोया और गोयरा मुख्य सड़क तक 7.33 किलोमीटर लंबी सड़क के निर्माण को लगभग ₹4.56 करोड़ की लागत से स्वीकृति मिली थी। इस सड़क का उद्देश्य क्षेत्र के कई गांवों को मुख्य मार्ग से जोड़ना और ग्रामीणों को बेहतर आवागमन सुविधा उपलब्ध कराना था।
लेकिन योजना स्वीकृत होने के बावजूद सड़क निर्माण कार्य आज तक पूरा नहीं हो सका। ग्रामीणों के अनुसार, निर्माण कार्य शुरू तो हुआ, लेकिन बाद में किसी कारणवश ठप पड़ गया और पिछले 8 वर्षों से यह सड़क अधूरी पड़ी हुई है। नतीजा यह है कि करोड़ों रुपये की योजना आज भी जमीन पर पूरी तरह नहीं उतर सकी, जबकि क्षेत्र के लोग रोजाना इसकी कीमत परेशानियों के रूप में चुका रहे हैं।
सड़क अधूरी रहने से हजारों ग्रामीणों का जीवन प्रभावित
धरना-प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने कहा कि अधूरी सड़क के कारण क्षेत्र के हजारों लोगों को हर दिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। यह सड़क केवल एक निर्माण परियोजना नहीं है, बल्कि कई गांवों के लिए जीवनरेखा जैसी है। सड़क की खराब स्थिति का असर आवागमन, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बाजार पहुंच और सरकारी सेवाओं तक पहुंच—सभी पर पड़ रहा है।
बरसात के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है। जगह-जगह कीचड़, गड्ढे और टूटी सतह के कारण वाहन चलाना मुश्किल हो जाता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में दिक्कत होती है, बच्चों को स्कूल जाने में परेशानी होती है और किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में अतिरिक्त समय व खर्च उठाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे केवल आश्वासन सुनते आ रहे हैं, लेकिन जमीन पर कोई ठोस सुधार नहीं दिख रहा।
REO कार्यालय के समक्ष सौंपा गया ज्ञापन
धरना के दौरान ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने विभागीय अधिकारियों को एक ज्ञापन भी सौंपा। ज्ञापन में मांग की गई कि सड़क निर्माण कार्य को शीघ्र पुनः प्रारंभ किया जाए और इसे निर्धारित समय-सीमा के भीतर गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरा किया जाए। प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि निर्माण कार्य में हुई देरी की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आखिर 8 वर्षों तक यह योजना अधूरी क्यों पड़ी रही।
ग्रामीणों का कहना था कि यदि किसी योजना के लिए करोड़ों रुपये स्वीकृत हो जाएं और फिर भी वह वर्षों तक अधूरी रहे, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि जवाबदेही का भी सवाल है। ऐसे में विभाग और संबंधित एजेंसियों की भूमिका की जांच जरूरी है।
निगरानी समिति गठन और खर्च का विवरण सार्वजनिक करने की मांग
ग्रामीणों ने केवल सड़क पूरी करने की मांग नहीं की, बल्कि उन्होंने योजना की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण मांगें भी उठाईं। ज्ञापन में यह मांग की गई कि सड़क निर्माण कार्य की निगरानी के लिए स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की एक निगरानी समिति गठित की जाए। उनका कहना है कि यदि स्थानीय स्तर पर निगरानी होगी, तो निर्माण की गुणवत्ता और प्रगति दोनों पर नजर रखी जा सकेगी।

इसके अलावा प्रदर्शनकारियों ने निर्माण कार्य की प्रगति और खर्च का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की भी मांग की। उनका कहना था कि जब योजना सार्वजनिक धन से बन रही है, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि अब तक कितना काम हुआ, कितना पैसा खर्च हुआ और शेष काम कब तक पूरा होगा।
बरसात में राहत के लिए अस्थायी मरम्मत की मांग
ग्रामीणों ने यह भी मांग उठाई कि जब तक सड़क निर्माण का पूरा काम दोबारा शुरू होकर खत्म नहीं हो जाता, तब तक बरसात के मौसम में आवागमन सुचारु रखने के लिए तत्काल अस्थायी मरम्मत कराई जाए। उनका कहना है कि सड़क की वर्तमान स्थिति इतनी खराब है कि कई बार लोग बीच रास्ते में फंस जाते हैं। ऐसे में कम से कम अस्थायी मरम्मत करके आवागमन को थोड़ा आसान बनाया जाना चाहिए।
यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने और पूरी होने में समय लग सकता है, लेकिन ग्रामीणों की रोजमर्रा की समस्याएं तत्काल समाधान चाहती हैं। खासकर बारिश के मौसम में खराब सड़कें गांवों को लगभग अलग-थलग कर देती हैं।
डॉ. दिनेश चंद्र बोयपाई ने विभाग को दी चेतावनी
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे डॉ. दिनेश चंद्र बोयपाई ने कहा कि वर्षों से अधूरी पड़ी सड़क के कारण क्षेत्र का विकास बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि विभागीय उदासीनता और प्रशासनिक ढिलाई के कारण ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित होना पड़ रहा है। उनका कहना था कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधा का अभाव किसी भी क्षेत्र के विकास को रोक देता है और यही स्थिति आज गोइलकेरा क्षेत्र में देखने को मिल रही है।
डॉ. बोयपाई ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि विभाग द्वारा जल्द सकारात्मक पहल नहीं की गई, तो ग्रामीणों के साथ मिलकर आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इसके बाद जो भी स्थिति बनेगी, उसकी पूरी जिम्मेदारी विभाग और प्रशासन की होगी।
सड़क केवल सुविधा नहीं, विकास की बुनियाद है
ग्रामीणों के प्रदर्शन ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे की योजनाएं आखिर समय पर पूरी क्यों नहीं हो पातीं। सड़क केवल यात्रा का साधन नहीं होती, बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और सामाजिक विकास की बुनियाद होती है। यदि किसी क्षेत्र की सड़कें खराब हों या अधूरी पड़ी हों, तो उसका सीधा असर उस क्षेत्र के विकास पर पड़ता है।

गोइलकेरा-मनोहरपुर क्षेत्र की यह सड़क भी ऐसे ही महत्व की परियोजना है। यदि यह सड़क समय पर पूरी हो जाती, तो आसपास के गांवों को मुख्य सड़क से बेहतर संपर्क मिलता, बाजार और अस्पताल तक पहुंच आसान होती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती। लेकिन अधूरी सड़क ने इन सभी संभावनाओं को रोक कर रख दिया है।
ग्रामीणों में बढ़ रहा अविश्वास, अब ठोस कार्रवाई की मांग
लगातार देरी और अधूरे निर्माण के कारण ग्रामीणों में विभाग के प्रति अविश्वास बढ़ता जा रहा है। उनका कहना है कि उन्हें बार-बार आश्वासन दिया गया, लेकिन सड़क का काम फिर भी पूरा नहीं हुआ। ऐसे में अब वे केवल वादे नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई देखना चाहते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि विभाग ने इस बार भी सिर्फ आश्वासन देकर मामला टालने की कोशिश की, तो आंदोलन और तेज होगा।
यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि अब ग्रामीण समुदाय अपने अधिकारों और विकास योजनाओं को लेकर पहले से अधिक जागरूक और मुखर हो चुका है। वे चाहते हैं कि सरकार और विभाग सिर्फ योजनाओं की घोषणा न करें, बल्कि उन्हें समय पर जमीन पर भी उतारें।
प्रशासन के लिए भी बड़ी परीक्षा
यह मामला प्रशासन और ग्रामीण कार्य विभाग दोनों के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है। यदि विभाग अब भी इस योजना को लेकर गंभीरता नहीं दिखाता, तो न केवल जनाक्रोश बढ़ेगा, बल्कि विकास योजनाओं के प्रति जनता का भरोसा भी कमजोर होगा। दूसरी ओर, यदि प्रशासन इस मामले में त्वरित निर्णय लेकर सड़क निर्माण कार्य दोबारा शुरू कराता है, तो इससे ग्रामीणों को राहत मिलेगी और सरकार की विकास प्रतिबद्धता पर भी सकारात्मक संदेश जाएगा।
Goilkera प्रखंड में ₹4.56 करोड़ की लागत से स्वीकृत 7.33 किलोमीटर सड़क का 8 वर्षों तक अधूरा पड़े रहना केवल एक निर्माण परियोजना की विफलता नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास की गंभीर चुनौती का प्रतीक है। REO कार्यालय के समक्ष ग्रामीणों का धरना-प्रदर्शन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब लोग बुनियादी सुविधाओं को लेकर चुप बैठने वाले नहीं हैं।
ग्रामीणों की मांग बिल्कुल स्पष्ट है—सड़क निर्माण कार्य को जल्द पुनः शुरू किया जाए, समय-सीमा में पूरा किया जाए, देरी की जांच हो, खर्च का विवरण सार्वजनिक किया जाए और स्थानीय निगरानी व्यवस्था बनाई जाए। अब देखना यह होगा कि विभाग और प्रशासन इस जनआवाज को कितनी गंभीरता से लेते हैं और कब तक अधूरी सड़क को पूरा कर क्षेत्र के लोगों को राहत दिलाते हैं।

















