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दो दिवसीय National नदी पर्वत सम्मेलन का भव्य आगाज जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने उठाई सख्त कानून की मांग

On: May 22, 2026 6:46 PM
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जमशेदपुर: के साकची स्थित मोती लाल नेहरू पब्लिक स्कूल में शुक्रवार को दो दिवसीय National नदी पर्वत सम्मेलन का शानदार आगाज हुआ। इस ऐतिहासिक सम्मेलन में देशभर से पहुंचे पर्यावरणविदों, न्यायविदों, वैज्ञानिकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और युवा प्रतिनिधियों ने एक स्वर में नदी और पहाड़ों की सुरक्षा के लिए विशिष्ट एवं सशक्त कानून बनाने की मांग उठाई।

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यह सम्मेलन तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट, जल बिरादरी और मिशनY के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। सम्मेलन का मूल उद्देश्य भारत की नदियों और पर्वतों के संरक्षण, संवर्द्धन और सुरक्षा के लिए ठोस संवैधानिक एवं कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।

कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। मंच पर मौजूद सभी अतिथियों ने पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के साथ सम्मेलन का उद्घाटन किया। पूरे आयोजन के दौरान नदी और पहाड़ों के अस्तित्व पर गंभीर चर्चा हुई तथा यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि यदि अब भी कठोर कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियां प्राकृतिक संसाधनों से वंचित हो जाएंगी।

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अथर्ववेद की उक्ति के साथ बोले जलपुरुष राजेंद्र सिंह

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता और देशभर में “जलपुरुष” के नाम से प्रसिद्ध राजेंद्र सिंह ने अपने ओजस्वी संबोधन से सम्मेलन में नई ऊर्जा भर दी। उन्होंने अथर्ववेद की उक्ति का उल्लेख करते हुए कहा—

“जो पृथ्वी को कष्ट देता है, हे पृथ्वी! तू उसका विनाश कर दे।”

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति को मां का दर्जा दिया गया है, लेकिन आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में नदियों और पहाड़ों का निर्मम शोषण किया जा रहा है।

राजेंद्र सिंह ने कहा कि आजादी के 77 वर्षों में सरकारों ने अनेक कानून बनाए, लेकिन नदियों और पर्वतों को बचाने के लिए कोई समर्पित कानून नहीं बना। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जो कानून बने हैं, वे केवल “नाक-बाल काटने” जैसे प्रतीकात्मक कानून हैं।

उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का उद्देश्य केवल मनुष्यों की रक्षा करना नहीं है, बल्कि पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं और प्रकृति के संपूर्ण तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।

अरावली से हिमालय तक संकट में पहाड़ राजेंद्र सिंह ने जताई चिंता

राजेंद्र सिंह ने अरावली पर्वतमाला पर अपने संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि वर्षों की लड़ाई के बाद 28 हजार खदानों को बंद कराया गया था। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में ऐतिहासिक फैसले दिए, लेकिन हाल के वर्षों में कुछ फैसलों ने चिंता भी बढ़ाई है।

उन्होंने कहा कि पहाड़ केवल पत्थरों का ढेर नहीं हैं, बल्कि वे जलचक्र, वर्षा और जीवन के आधार हैं। यदि पहाड़ खत्म हो जाएंगे तो नदियां भी समाप्त हो जाएंगी।

उन्होंने स्पष्ट कहा—

“हमें पानी चाहिए तो पहाड़ बचाने ही होंगे। देश के सभी पर्वतों को जीवित रखना राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।”

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न्यायमूर्ति वी. गोपाला गौड़ा ने राष्ट्रपति से कानून बनाने की अपील की

सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश वी. गोपाला गौड़ा ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि देश में प्रतिभाशाली न्यायविद, वैज्ञानिक और नीति निर्माता होने के बावजूद नदियों और पहाड़ों के लिए कोई समर्पित कानून नहीं बन पाया है।

उन्होंने राष्ट्रपति से अपील करते हुए कहा कि संसद का विशेष सत्र बुलाकर नदी और पर्वत संरक्षण कानून पारित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि समय रहते कठोर कानून नहीं बनाए गए तो देश की नदियां और पर्वत धीरे-धीरे लुप्त हो जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि पर्यावरण संरक्षण के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय को और अधिक सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

सरयू राय बोले –स्वर्णरेखा नदी की स्थिति बेहद चिंताजनक

जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि झारखंड सहित पूरे देश में नदियों और पहाड़ों की हालत लगातार खराब होती जा रही है। उन्होंने स्वर्णरेखा नदी का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2005 तक नदी के किनारे बसे लोग उसके पानी पर निर्भर थे, लेकिन आज नदी का पानी अत्यधिक प्रदूषित हो चुका है।

उन्होंने कहा कि साहेबगंज सहित झारखंड के कई क्षेत्रों में पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। यह स्थिति केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा है।

सरयू राय ने कहा कि एक प्रारंभिक कानून का ड्राफ्ट तैयार किया गया है और विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर उसमें आवश्यक सुधार किए जाएंगे।

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पर्यावरणविद दिनेश मिश्र ने कहा नदियां संसाधन नहीं, मां हैं

प्रख्यात पर्यावरणविद दिनेश मिश्र ने कहा कि भारतीय समाज में नदियों को मां का दर्जा दिया गया है, लेकिन आधुनिक सोच ने उन्हें केवल संसाधन बनाकर रख दिया है।

उन्होंने कहा कि पहले नदियों के उपयोग की एक मर्यादा थी, लेकिन अब असीमित दोहन ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि नदियों और पहाड़ों के साथ छेड़छाड़ कम की जाए, क्योंकि यही आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व की गारंटी हैं।

जल बिरादरी और वैज्ञानिकों ने जताई गहरी चिंता

जल बिरादरी के National संयोजक बोलिशेट्टी सत्यनारायणा ने कहा कि यदि पहाड़ नहीं बचेंगे तो वर्षा नहीं होगी और देश जल संकट की ओर बढ़ जाएगा। उन्होंने युवाओं से पर्यावरण संरक्षण आंदोलन से जुड़ने की अपील की।

आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के मिशनY के संयोजक प्रोफेसर अंशुमाली ने कहा कि दामोदर नदी की लंबाई में लगभग 70 प्रतिशत कमी आ चुकी है। उन्होंने इसे गंभीर पर्यावरणीय संकट बताया।

युगांतर प्रकृति के अध्यक्ष अंशुल शरण ने कहा कि भारत में पर्वत और नदी संरक्षण कानून न होने के कारण प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति लगातार दयनीय होती जा रही है।

तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने रखे महत्वपूर्ण सुझाव

सम्मेलन के प्रथम तकनीकी सत्र में “पर्वत और जल संरक्षण, संवर्द्धन व सुरक्षा अधिनियम की आवश्यकता” विषय पर गहन चर्चा हुई।

पत्रकार दीपक पर्बतियार ने कहा कि केवल कानून बना देने से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की भी आवश्यकता है।

डॉ. रामबूझ ने कहा कि संविधान स्पष्ट रूप से नदियों को प्रदूषित न करने की बात करता है, लेकिन वास्तविक स्थिति बेहद चिंताजनक है।

डॉ. राकेश कुमार सिंह ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल हो चुका है। उन्होंने 31 मार्च को जमशेदपुर में बड़ी संख्या में मछलियों की मौत का उदाहरण देते हुए जनजागरूकता की कमी पर चिंता जताई।

डॉ. समीर ने नदियों को स्वस्थ बनाने के लिए वैज्ञानिक उपायों पर प्रस्तुति दी, जबकि डॉ. पीयूष कांत पांडेय ने कहा कि पहाड़ों के बिना जल की कल्पना असंभव है।

वरिष्ठ पत्रकार विवेक कुमार तिवारी ने सारंडा के जंगलों में बढ़ती माइनिंग और साल वृक्षों पर मंडरा रहे खतरे का मुद्दा उठाया।

National सम्मेलन में युवाओं की बड़ी भागीदारी बनी खास आकर्षण

National नदी पर्वत सम्मेलन में जमशेदपुर और आसपास के कॉलेजों से 300 से अधिक छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। युवा प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी ने यह संकेत दिया कि नई पीढ़ी पर्यावरण संरक्षण को लेकर गंभीर है।

राजेंद्र सिंह के भाषण के दौरान कई बार जोरदार तालियां गूंजीं। उन्होंने अपने संबोधन में सरयू राय की सराहना करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण का बड़ा आंदोलन वही व्यक्ति चला सकता है जिसे सत्ता का मोह न हो।

सम्मेलन के दौरान खरकई नदी पर लिखी गई पुस्तक का विमोचन भी किया गया। यह पुस्तक प्रसेनजीत सरकार, शिवम ठाकुर और आकाश जायसवाल द्वारा लिखी गई है।

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National नदी और पर्वत संरक्षण कानून की दिशा में ऐतिहासिक पहल

जमशेदपुर में आयोजित यह सम्मेलन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देशव्यापी पर्यावरण आंदोलन की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। सम्मेलन में मौजूद विशेषज्ञों, न्यायविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है जब भारत को नदियों और पर्वतों के लिए पृथक एवं प्रभावी कानून बनाना ही होगा।

यदि देश की नदियां सूखती रहीं और पहाड़ कटते रहे, तो आने वाले वर्षों में जल संकट, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक आपदाएं और भयावह रूप ले सकती हैं। इसलिए यह सम्मेलन आने वाले समय में पर्यावरण नीति निर्माण की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच साबित हो सकता है।

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