नई दिल्ली: आज के समय में स्वास्थ्य सेवाएं और दवाएं हर आम इंसान की बुनियादी जरूरत बन चुकी हैं। लेकिन बढ़ती महंगाई के इस दौर में जीवन रक्षक दवाओं (Life Saving Drugs) की कीमतें आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रही हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि देश में दवाओं के दाम कैसे तय होते हैं और सरकार आम जनता को सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए क्या-क्या प्रयास कर रही है। रसायन और उर्वरक राज्य मंत्री श्रीमती अनुप्रिया पटेल ने हाल ही में राज्यसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से इन तमाम बातों की विस्तृत जानकारी साझा की है。
1. देश में कैसे तय होती हैं दवाओं की कीमतें?
भारत में दवाओं की कीमतें और उन पर नियंत्रण रखने के नियम ‘राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति’ 2012 के अंतर्गत तय किए जाते हैं। इसके लिए मुख्य रूप से ‘औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश 2013′ (DPCO, 2013) के नियमों का पालन किया जाता है।
इस पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार की एक विशेष संस्था काम करती है, जिसे ‘राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण’ (NPPA) कहा जाता है। एनपीपीए की कार्यप्रणाली इस प्रकार काम करती है:
- सीलिंग प्राइस (अधिकतम मूल्य): एनपीपीए उन सभी दवाओं की अधिकतम कीमत तय करता है जो डीपीसीओ, 2013 की ‘अनुसूची-I’ में शामिल होती हैं। यह सूची ‘आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची’ पर आधारित होती है। इसके अलावा, नई दवाओं की खुदरा कीमत भी एनपीपीए द्वारा ही तय की जाती है।
- वार्षिक बदलाव: इस अनुसूची में शामिल दवाओं के अधिकतम मूल्यों में हर साल ‘थोक मूल्य सूचकांक’ (WPI) के आधार पर बदलाव किया जाता है।
- गैर-अनुसूची दवाएं: जो दवाएं इस अनुसूची में शामिल नहीं होती हैं, उनके निर्माताओं के लिए नियम है कि वे पिछले 12 महीनों में उस दवा की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) में 10% से अधिक की बढ़ोतरी नहीं कर सकते।
- विशेष अधिकार: विशेष परिस्थितियों और जनहित को ध्यान में रखते हुए, एनपीपीए के पास डीपीसीओ, 2013 के पैरा 19 के तहत भी दवाओं की कीमतें तय करने का अधिकार होता है। यदि कोई कंपनी तय कीमत से ज्यादा पैसे वसूलती है, तो उसके खिलाफ नियमों के अनुसार सख्त कार्रवाई की जाती है। एनपीपीए द्वारा तय या बदली गई सभी कीमतों की जानकारी आधिकारिक वेबसाइट (
www.nppa.gov.in) पर उपलब्ध रहती है।
2. दवाओं की कमी पर पैनी नजर
देश में किसी भी दवा की किल्लत न हो, इसके लिए एनपीपीए लगातार दवाओं की उपलब्धता पर नजर रखता है। यदि देश के किसी भी हिस्से में दवा की कमी की बात सामने आती है, तो उसे तुरंत दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। यह जानकारी चाहे ‘राज्य औषधि नियंत्रकों’ (SDC) से मिले, ‘फार्मा जन समाधान पोर्टल’ से, एनपीपीए हेल्पलाइन से, जन शिकायत पोर्टलों से या आम नागरिकों से प्राप्त हो, हर सूचना पर तुरंत कार्रवाई की जाती है।
3. किफायती और मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार की प्रमुख पहल
आम जनता को महंगे इलाज और जीवन रक्षक दवाओं के बोझ से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने कई महत्वपूर्ण योजनाएं और कदम उठाए हैं:
- i. प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना:देशभर में 20,000 से अधिक ‘जनऔषधि केंद्र’ खोले गए हैं, जहां उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं बहुत ही कम दामों पर मिलती हैं। इन केंद्रों पर मिलने वाली दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में आम तौर पर 50% से 80% तक सस्ती होती हैं।
- ii. आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY):स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग की इस योजना के अंतर्गत पात्र परिवारों को हर साल ₹5 लाख तक का स्वास्थ्य बीमा मिलता है। इस बीमा सुरक्षा में अस्पताल में भर्ती होने (सेकेंडरी और टर्शियरी केयर) के साथ-साथ इलाज के दौरान लगने वाली दवाओं का खर्च भी पूरी तरह शामिल होता है।
- iii. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निःशुल्क औषधि सेवा पहल:‘भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों’ (IPHS) के तहत देश के सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों—यानी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) से लेकर जिला अस्पतालों तक—जरूरी दवाएं मरीजों को बिलकुल मुफ्त उपलब्ध कराई जाती हैं।
- iv. अमृत (AMRIT) फार्मेसी स्टोर:कैंसर, दिल की गंभीर बीमारियों और अन्य जटिल रोगों के इलाज के लिए सस्ती दवाएं, इम्प्लांट और सर्जिकल सामान उपलब्ध कराने के लिए ‘अमृत’ पहल शुरू की गई है। कई बड़े अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों में बने अमृत फार्मेसी स्टोरों पर ये जीवन रक्षक चीजें बाजार की कीमतों से औसतन 50% तक की छूट पर मिलती हैं।
- v. राष्ट्रीय आरोग्य निधि और विवेकाधीन अनुदान:कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन यापन करने वाले गरीब मरीजों के लिए सरकार आर्थिक मदद देती है। यह मदद ‘राष्ट्रीय आरोग्य निधि’ और ‘स्वास्थ्य मंत्री के विवेकाधीन अनुदान’ जैसी योजनाओं के माध्यम से प्रदान की जाती है।
बेशक जीवन रक्षक दवाओं की बढ़ती कीमतें आम आदमी के लिए चिंता का विषय हैं, लेकिन सरकार की मूल्य नियंत्रण नीतियां और जनऔषधि केंद्रों जैसी योजनाएं राहत का एक बड़ा जरिया बन रही हैं। जरूरत इस बात की है कि आम नागरिक इन सरकारी योजनाओं और पोर्टल्स की पूरी जानकारी रखें, ताकि महंगे इलाज के दौर में वे किफायती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा लाभ उठा सकें।










