नई दिल्ली: Harappan सभ्यता (सिंधु घाटी सभ्यता) के पतन और उसके सिकुड़ने की वजह को लेकर लंबे समय से वैज्ञानिक शोध करते रहे हैं। अब भारत के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन के जरिए इस रहस्य पर नई रोशनी डाली है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP) के वैज्ञानिकों ने पराग कणों (Pollen) के विश्लेषण के आधार पर दावा किया है कि लगभग 4,200 वर्ष पहले हुए अचानक जलवायु परिवर्तन और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (ISM) के कमजोर पड़ने के कारण हड़प्पा सभ्यता का विस्तार सिमट गया। इस अध्ययन के अनुसार जलवायु में आए बड़े बदलाव के कारण लोगों को सिंधु और घग्गर-हाकरा नदी क्षेत्र छोड़कर पूर्वी गांगेय मैदानों की ओर पलायन करना पड़ा।
पराग कणों ने खोले हजारों साल पुराने रहस्य
वैज्ञानिकों ने गढ़वाल हिमालय स्थित देवरिया ताल (झील) से प्राप्त तलछट (Sediment Core) का विस्तृत अध्ययन किया। इस तलछट में मौजूद पराग कणों और बीजाणुओं का विश्लेषण कर हजारों वर्ष पुराने वनस्पति और जलवायु परिवर्तनों का पता लगाया गया।
पराग कणों को वैज्ञानिक लंबे समय से अतीत की वनस्पति, पर्यावरण और जलवायु के अध्ययन का विश्वसनीय माध्यम मानते हैं। इनकी मदद से यह समझा जा सकता है कि किसी क्षेत्र में हजारों वर्ष पहले किस प्रकार की वनस्पति मौजूद थी और उस समय मौसम कैसा रहा होगा।
बीएसआईपी ने किया उच्च स्तरीय शोध
यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन कार्यरत बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (BSIP) द्वारा किया गया। शोधकर्ताओं ने देवरिया ताल से प्राप्त तलछट के नमूनों का उच्च-रिज़ॉल्यूशन अध्ययन किया, जो मध्य होलोसीन काल से लेकर वर्तमान समय तक के पर्यावरणीय परिवर्तनों की जानकारी देता है।
शोध के दौरान 10 एएमएस रेडियोकार्बन डेटिंग का उपयोग किया गया, जिससे तलछट की सही आयु निर्धारित की गई। यह डेटिंग अमेरिका के जॉर्जिया विश्वविद्यालय स्थित सेंटर फॉर एप्लाइड आइसोटोप स्टडीज (CAIS) में की गई।
4200 वर्ष पहले आया था बड़ा जलवायु परिवर्तन
शोधकर्ताओं के अनुसार लगभग 4250 कैलेंडर वर्ष पूर्व ओक और पाइन के पराग कणों के अनुपात में अचानक बदलाव देखने को मिला।
यह परिवर्तन लगभग 4200 वर्ष पहले हुई एक वैश्विक जलवायु घटना की ओर संकेत करता है, जिसे वैज्ञानिक “4.2 हजार वर्ष घटना (4.2 ka Event)” के नाम से जानते हैं। इस दौरान विश्व के कई हिस्सों में मौसम अचानक अधिक शुष्क और ठंडा हो गया था।
कमजोर मानसून बना हड़प्पा सभ्यता के संकट का कारण
अध्ययन में कहा गया है कि इसी अवधि के दौरान भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (Indian Summer Monsoon) काफी कमजोर पड़ गया था।
मानसून कमजोर होने से सिंधु नदी और घग्गर-हाकरा नदी क्षेत्र में नियमित बाढ़ आना बंद हो गई। यही बाढ़ कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी और पर्याप्त जल उपलब्ध कराती थी। जब यह प्राकृतिक व्यवस्था प्रभावित हुई तो खेती करना कठिन हो गया।
लोगों को करना पड़ा पलायन
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और कमजोर मानसून के कारण सिंधु घाटी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के सामने खाद्यान्न संकट और जल की समस्या उत्पन्न हो गई।
ऐसी परिस्थितियों में बड़ी संख्या में लोग सिंधु क्षेत्र छोड़कर पूर्वी गंगा के मैदानों की ओर चले गए, जहां कृषि के लिए अधिक अनुकूल परिस्थितियां मौजूद थीं। इस पलायन के कारण धीरे-धीरे हड़प्पा सभ्यता का विस्तार कम होता गया।
गढ़वाल हिमालय बना अध्ययन का प्रमुख केंद्र
शोध के लिए गढ़वाल हिमालय के देवरिया ताल को इसलिए चुना गया क्योंकि यहां की तलछट में हजारों वर्षों का प्राकृतिक इतिहास सुरक्षित है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस झील से प्राप्त रिकॉर्ड हिमालयी क्षेत्र में मानसून, वनस्पति और जलवायु परिवर्तन को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुए हैं।
कैसे की गई रेडियोकार्बन डेटिंग?
शोधकर्ताओं ने त्रापा (Trapa) पौधे के बीजों के खोल का उपयोग करते हुए 10 एएमएस रेडियोकार्बन डेटिंग की।
इन तिथियों को आधुनिक वैज्ञानिक सॉफ्टवेयर OxCal 4.355 की सहायता से कैलेंडर वर्षों में परिवर्तित किया गया। इससे शोधकर्ताओं को विभिन्न समय अवधियों का सटीक कालक्रम तैयार करने में सफलता मिली।
वैज्ञानिकों ने क्या पाया?
डॉ. मोहम्मद फिरोज़ कमर के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि लगभग 4200 वर्ष पहले जलवायु अचानक अधिक शुष्क हो गई थी।
इस अवधि में ओक और पाइन जैसे वृक्षों की संरचना में भी बदलाव देखने को मिला, जो स्पष्ट रूप से पर्यावरणीय परिवर्तन का संकेत देता है। यह परिणाम पहले के भूवैज्ञानिक और तलछटी अध्ययनों से भी मेल खाते हैं।
क्यों कमजोर हुआ भारतीय मानसून?
शोधकर्ताओं के अनुसार उस समय अंतर उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) दक्षिण की ओर खिसक गया था।
इसके साथ ही उत्तरी गोलार्ध में गर्मियों के दौरान सौर विकिरण में कमी आई, जिससे मानसूनी प्रणाली प्रभावित हुई। अध्ययन में यह भी बताया गया कि उस समय अल-नीनो (El Niño) की मजबूत स्थिति और हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD) की नकारात्मक अवस्था ने भी मानसून को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4.2 हजार वर्ष पुरानी घटना क्यों है महत्वपूर्ण?
वैज्ञानिकों के अनुसार 4.2 हजार वर्ष पहले हुई यह जलवायु घटना केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में बड़े सामाजिक और पर्यावरणीय बदलावों का कारण बनी थी।
यह घटना आज भी वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन का विषय है क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलती है कि जलवायु परिवर्तन किस प्रकार मानव सभ्यताओं, कृषि और सामाजिक संरचनाओं को प्रभावित कर सकता है।
भविष्य के लिए भी महत्वपूर्ण है यह शोध
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन केवल इतिहास समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य के जलवायु परिवर्तन को समझने में भी सहायक होगा।
यदि भविष्य में मानसून में इसी प्रकार के बड़े बदलाव होते हैं, तो उनके कृषि, जल संसाधनों और मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकते हैं, इसका अनुमान लगाने में भी ऐसे शोध उपयोगी साबित होंगे।
भारतीय वैज्ञानिकों के इस अध्ययन ने Harappan सभ्यता के पतन से जुड़े एक महत्वपूर्ण पहलू पर नया वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। शोध के अनुसार लगभग 4200 वर्ष पहले कमजोर पड़े मानसून और अचानक हुए जलवायु परिवर्तन ने सिंधु घाटी क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जिसके कारण लोगों को पूर्वी गंगा के मैदानों की ओर पलायन करना पड़ा। पराग कणों और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के आधार पर किया गया यह अध्ययन न केवल प्राचीन इतिहास को बेहतर ढंग से समझने में मदद करता है, बल्कि वर्तमान जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
















