अंतरराष्ट्रीय डेस्क: अफ्रीकी देश Sudan पिछले तीन वर्षों से भी अधिक समय से भीषण गृहयुद्ध की आग में जल रहा है। सत्ता संघर्ष के कारण शुरू हुई यह लड़ाई अब दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक बन चुकी है। हजारों लोगों की मौत, लाखों लोगों का विस्थापन और बुनियादी सुविधाओं का ध्वस्त होना इस युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी है। लेकिन इन सबके बीच जो सबसे दर्दनाक तस्वीर सामने आई है, वह है बच्चों का अपहरण कर उन्हें जबरन युद्ध के मैदान में बाल सैनिक के रूप में भेजे जाने का आरोप।
मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कई नाबालिग बच्चों को उनकी इच्छा के विरुद्ध हथियार थमाकर लड़ाई में झोंका गया। युद्ध से बच निकले कुछ किशोरों ने अपनी आपबीती सुनाते हुए ऐसे भयावह अनुभव साझा किए हैं, जिन्होंने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है
क्या है Sudan का गृहयुद्ध?
सूडान में गृहयुद्ध की शुरुआत 15 अप्रैल 2023 को हुई, जब देश की नियमित सेना सूडानी आर्म्ड फोर्सेज (SAF) और अर्धसैनिक संगठन रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (RSF) के बीच सत्ता नियंत्रण को लेकर संघर्ष शुरू हुआ।

यह संघर्ष धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया और अब यह लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित कर चुका है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार, इस युद्ध के कारण बड़े पैमाने पर लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं और देश गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहा है।
बाल सैनिक बनाए जाने के आरोप
मानवाधिकार संगठनों ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) और कॉन्फ्लिक्ट इनसाइट्स ग्रुप (Conflict Insights Group) ने अपनी रिपोर्टों में आरोप लगाया है कि दारफुर क्षेत्र में सक्रिय लड़ाकों के साथ विदेशी भाड़े के सैनिक भी मौजूद रहे हैं। रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में किशोर बच्चों को भी हथियार उठाने के लिए मजबूर किया गया।
इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से सभी पहलुओं से पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन रिपोर्टों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चिंता पैदा की है।
विदेशी लड़ाकों की भूमिका पर उठे सवाल
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्षों से चले आ रहे संघर्षों के कारण कोलंबिया के कई पूर्व सैनिक विदेशों में सुरक्षा सेवाओं या युद्ध क्षेत्रों में काम करने जाते रहे हैं।
कुछ मानवाधिकार रिपोर्टों में दावा किया गया कि सूडान में भी विदेशी लड़ाकों की मौजूदगी देखी गई। हालांकि कोलंबिया सरकार ने कहा है कि उसके पास ऐसे आरोपों की पुष्टि करने वाली कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है कि उसके नागरिकों ने बाल सैनिकों की भर्ती या प्रशिक्षण में भूमिका निभाई हो। सरकार ने बच्चों के किसी भी प्रकार के सैन्य उपयोग की निंदा की है।
15 वर्षीय किशोर ने सुनाई दर्दनाक आपबीती
युद्ध से बच निकले एक किशोर ने बताया कि जब वह लगभग 15 वर्ष का था, तब उसे जबरन पकड़कर युद्ध क्षेत्र में ले जाया गया।
उसके अनुसार, हवाई हमलों के दौरान उसके हाथ-पैर एंटी-एयरक्राफ्ट गन से बांध दिए गए थे ताकि वह भाग न सके। उसने बताया कि यदि कोई बच्चा भागने की कोशिश करता, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते।
उसने यह भी कहा कि वह लगातार भय में जी रहा था और केवल अपने घर लौटना चाहता था।
बच्चों को कथित रूप से जंजीरों में रखा गया
कुछ किशोरों ने दावा किया कि उन्हें एक सैन्य शिविर में अन्य बच्चों के साथ रखा गया, जहां उनके हाथ लंबे समय तक बंधे रहते थे।
उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें सामान्य जीवन की सुविधाएं भी नहीं मिलती थीं और लगातार सैन्य प्रशिक्षण तथा युद्ध संबंधी गतिविधियों में शामिल होने का दबाव बनाया जाता था।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि कठिन है, लेकिन मानवाधिकार संगठनों ने ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
खूनी संघर्ष में फंसे मासूम
युद्ध से प्रभावित बच्चों ने बताया कि उन्होंने अपने सामने कई लोगों को घायल होते और मरते देखा।
कुछ बच्चों के शरीर पर विस्फोटों और गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध क्षेत्रों में बच्चों पर पड़ने वाला मानसिक प्रभाव जीवनभर बना रह सकता है।
मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि किसी भी संघर्ष में बच्चों का उपयोग लड़ाकों के रूप में किया जाता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और बाल अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।
संयुक्त राष्ट्र लंबे समय से संघर्ष क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें हिंसा से दूर रखने की अपील करता रहा है।
यूएई पर लगे आरोप और उसका जवाब
कुछ रिपोर्टों में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) पर आरोप लगाया गया कि उसने कथित रूप से संघर्ष में शामिल पक्षों को सहायता पहुंचाई।
हालांकि यूएई सरकार ने इन आरोपों से स्पष्ट रूप से इनकार किया है।
यूएई ने कहा कि उसने सूडान में किसी भी युद्धरत पक्ष को हथियार या सैन्य सहायता उपलब्ध नहीं कराई है और न ही उसका किसी भाड़े के सैनिक गतिविधि से संबंध है। उसने संघर्ष में सभी पक्षों द्वारा किए गए अत्याचारों की निंदा करते हुए शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया।

कोलंबिया सरकार का भी बयान
कोलंबिया सरकार ने कहा कि उसके पास ऐसी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उसके नागरिकों ने सूडान में बच्चों की भर्ती या प्रशिक्षण में भाग लिया।
सरकार ने स्पष्ट किया कि यदि कहीं भी बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
युद्ध का सबसे बड़ा शिकार बन रहे बच्चे
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी युद्ध में सबसे अधिक नुकसान बच्चों को उठाना पड़ता है।

वे शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामान्य बचपन से वंचित हो जाते हैं। युद्ध के कारण लाखों बच्चे शरणार्थी बनने को मजबूर होते हैं और कई बार परिवारों से भी बिछड़ जाते हैं।
बाल अधिकार संगठनों का कहना है कि संघर्ष क्षेत्रों में बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की मांग
संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सूडान में मानवीय सहायता बढ़ाने, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और संघर्ष को समाप्त करने के लिए ठोस प्रयास करने की अपील की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध का स्थायी समाधान केवल बातचीत, राजनीतिक सहमति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से ही संभव है।
मानवीय संकट पर दुनिया की नजर
सूडान का यह संघर्ष केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक मानवीय चिंता का विषय बन चुका है। बच्चों को लेकर सामने आए आरोपों ने युद्ध की भयावहता को और भी गंभीर बना दिया है।
हालांकि युद्ध के दौरान सामने आने वाले कई दावों की स्वतंत्र पुष्टि करना कठिन होता है, इसलिए सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। फिर भी इतना स्पष्ट है कि किसी भी संघर्ष में बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

सूडान की यह त्रासदी दुनिया को यह याद दिलाती है कि युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिकों, विशेषकर मासूम बच्चों, को उठाना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब यही है कि हिंसा को रोका जाए, नागरिकों की रक्षा की जाए और आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की भयावहता से बचाया जाए।















