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बच्चों को कुपोषण से बचाए: अमेरिकी वैज्ञानिकों का रिसर्च

On: August 16, 2025 8:41 PM
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कुपोषण: पौधे की नियमित देखभाल करते है ताकि वह जल्द बड़ा हो, हारा-भरा रहे, इसलिए जड़ में खाद-पानी डालना पड़ता है। यह उस की परवाह करना कहा जाता है। यदि आप उसकी परवाह करते है तो निश्चित रूप से पौधा हरा रहेगा और अपनी हरियाली से अपनी खुशबू से तथा यदि फलदार है तो जब अपने स्वरूप में आएगा आपको आंतरिक खुशी होगी। पौधे की हरियाली, उसकी खुशबू , उसके फल आपकों उत्साह से भर देगा और उसका और भी ख्याल रखेंगे। 

जड़ में खाद-पानी आपने दिया इसलिए उन फूलों की खुशबू, उसके फल खाकर निहाल होते रहेंगे। यही हाल गर्भ में आए शिशुओं का होता है। यदि गर्भकाल से ही ख्याल रखा जाए, उचित परामर्श विशेषज्ञों से लिया जाए तो जन्मकाल से ही शिशु स्वास्थ्य होगा। निरोग रहेगा। आगे चलकर उसका मस्तिष्क विकसित होता रहेगा। लेकिन, यदि गर्भ से ही शिशु का ख्याल नहीं रखा जाएगा तो जन्म लेते ही वह कई रोगों से ग्रस्त हो जाएगा, फिर आप अपनी कमी नहीं बताएंगे बल्कि ईश्वर को कोसते रहेंगे  कि उनके साथ ऐसा क्यों हुआ?

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स्वास्थ्य समस्याओं के निदान के लिए हमने मेट्रो ग्रुप ऑफ़ हॉस्पिटल्स के चेयरमैन और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. पुरुषोत्तम लाल से बात की। उन्होंने बताया कि गर्भवती माताओं के खानपान का बच्चों पर पूरा असर पड़ता है। माँ के रहन-सहन का भी होने वाले बच्चों पर पूरा असर पड़ता है।

गलत खानपान, असामान्य जगहों पर रहना और बीड़ी-सिगरेट, शराब जैसी आदतों का असर जन्म के बाद गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ता है। अगर गर्भवती माताएँ गलती से या जानबूझकर गलत दवाइयों का सेवन कर लेती हैं, तो इसका असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर भी पड़ता है। कुछ चीज़ें जिन्हें हम जन्मजात कहते हैं, उनका असर माता-पिता के ज़रिए ही बच्चे पर पड़ता है।

दोस्त न बनाना, एकतरफ़ा सोच रखना, दिन भर टीवी देखना, कृत्रिम निद्रावस्था (एआई) की लत लग जाना और खुद को सामाजिक रिश्तों से दूर रखना भी कुपोषण का शिकार हो जाता है। जहाँ तक गर्मी में रहने से दिमाग के कमज़ोर होने की बात है, तो भारतीय परिवेश में ऐसा प्राचीन काल से होता आ रहा है। इसलिए जब तक देश का शिक्षा स्तर नहीं सुधरेगा और देश सुशिक्षित नहीं बनेगा, तब तक देश ऐसी समस्याओं और बीमारियों से ग्रस्त रहेगा।

दुनिया की कई संस्थाओं द्वारा बच्चों के स्वास्थ्य पर शोध किया गया है और इसका परिणाम यह रहा है कि बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है। अब बच्चे उस तरह नहीं मरते जैसे पिछली शताब्दियों में मरते थे। दुनिया के कई शोध संस्थानों ने यह साबित किया है कि अगर माता-पिता गर्भाधान के समय से ही विशेषज्ञों के माध्यम से अजन्मे बच्चे की देखभाल शुरू कर दें, तो बच्चों की अकाल मृत्यु के कारणों में कमी आएगी और भविष्य में भी स्वस्थ बच्चे पैदा होंगे।

हाल ही में अमेरिका की आयोनिस ऑक्सफोर्ड (IOI) ने एक शोध में पाया है कि पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध का खतरा बढ़ सकता है। जिसमें कहा गया है कि पांच साल से कम उम्र के गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों में रोगाणुरोधी प्रतिरोधी बैक्टीरिया विकसित होने का खतरा काफी बढ़ सकता है। अब आइए समझने की कोशिश करते हैं कि यह

कुपोषण क्या है – कुपोषण का अर्थ है किसी व्यक्ति द्वारा ऊर्जा या पोषक तत्वों की अधिकता या असंतुलन। अगर हम कुपोषण के बारे में थोड़ा और जानें, तो कुपोषण, यानी शरीर को पर्याप्त पोषण न मिलना, कई कारणों में से एक हो सकता है। इसके मुख्य कारण गरीबी, अज्ञानता, खराब स्वास्थ्य सेवाएँ और भोजन की कमी हैं। इसके अलावा, कुपोषण के कारण कुछ चिकित्सीय और मानसिक बीमारियाँ भी हो सकती हैं।

कुपोषण एक वैश्विक समस्या है। विकसित और विकासशील दोनों देशों में गरीबी और अल्पपोषण इसके मुख्य कारण हैं। हम दुनिया भर में वंचितों को बेहतर शिक्षा और सहायता प्रदान कर सकते हैं, जिसमें स्वच्छ पानी, पौष्टिक संपूर्ण खाद्य पदार्थ और दवाएं शामिल हैं।

कुपोषण आम है और दुनिया भर में बीमारी, विकलांगता और मृत्यु का एक प्रमुख कारण भी है। शिक्षा, बुनियादी ढांचे और नीतिगत उपायों सहित कुपोषण से कई मोर्चों पर लड़ने की जरूरत है। घर पर संतुलित आहार खाने से कुपोषण को रोकने में मदद मिल सकती है।

भारतीय संदर्भ में, क्या भारतीय समाज के लिए वह भोजन और स्वच्छ पानी उपलब्ध होना संभव है, जिसकी शोधकर्ता शुरुआती स्तर पर बात करते हैं? यदि हाँ, तो कैसे? अगर हम देखें तो क्या इस देश में ऐसा आहार संभव है जहाँ 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन योजना के तहत कतार में खड़े हैं? शोधकर्ताओं का कहना है कि पर्याप्त पोषण प्रदान करें।

विशेषज्ञों का कहना है कि

यह प्रोटीन, कैलोरी और आवश्यक विटामिन और खनिजों से भरपूर होना चाहिए कुपोषण में मांसपेशियों का क्षय दिखाई दे सकता है, लेकिन यह ध्यान देने योग्य नहीं भी हो सकता है और कुपोषण का कारण भी बन सकता है।

इसी तरह ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न  के साउथ बेल्स  विश्वविद्यालय के शोधकर्ता ने अध्ययन के बाद कहा कि बच्चों के सीखने की क्षमता अधिक गर्मी से प्रभावित होता है। इस शोधकर्ता ने भारत को शामिल करते हुए  कुल 61 देशों के लगभग 14.5 मिलियन छात्रों से संबंधित सात पूर्व प्रकाशित अध्ययनों के डाटा की समीक्षा की है। शोधकर्ता के अध्ययन में बताया गया हैं कि लंबे समय तक गर्मी के संपर्क मे रहने से बच्चों के संज्ञानात्मक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

शोधकर्ता लव वर्ष्णेय ने कहा है कि ज्यादा तापमान से दिमाग और खून के बीच अवरोध टूट जाता है और दिमाग में अवांछनीय प्रोटीन और आयन जमा होने लगते हैं, लिहाजा दिमाग में सूजन और उनके सामान्य कार्यों में बाधा आने लगती है और मस्तिष्क कोशिकाएं मरने लगती है। इतना ही नहीं शरीर को नियंत्रित करने वाला दिमागी हिस्सा भी प्रभावित होता है जो पसीने के माध्यम से शरीर का तापमान नियंत्रित करता है।

भारत का तापमान जो लगभग अनियंत्रित है और अत्यधिक तापमान वाला देश है उसे कैसे नियंत्रित किया जाए? उपाय के रूप जो परिवार आर्थिक रूप से कुछ संपन्न है वह तो अपने बच्चों को विदेश भेज देते हैं, लेकिन भारत की झोपड़ियों में रहने वाले अथवा सुदूर गांव रहने वाले क्या कर सकते हैं।

सच तो यह है कि इस प्रकार के परिवार के गरीब बच्चे अपने देश में अशिक्षित रह जाते है और उनकी आबादी बढ़ती जाती है और उनका पूरा परिवार गरीबी रेखा के नीचे रह जाता है।

यह अस्सी करोड़ लोगों की सच्चाई होती है। जब तक देश का प्रत्येक वर्ग शिक्षित नहीं होगा यह देश गरीबी से जूझता हुआ पिछड़ता ही जाएगा। विश्व के परिवेश अथवा भारत के भी शोधकर्ता इस बात को जानते हैं, लेकिन उनका काम यहीं खत्म हो जाता है।

अब सरकार का ही यह कर्तव्य होता है कि ऐसे समाज को किस तरह संपन्न कराया जाए ताकि समाज का हर व्यक्ति अपने दो जून का तथा अपने परिवार और बच्चों को स्वास्थ्य जीवन और शिक्षित कराने में सक्षम हो सके। जो स्थित आज देश की बनी हुई है उसमें तो ऐसा लगता है कि बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षित समाज का निर्माण करने में अभी वर्षों लग सकता है।

ऐसा इसलिए कि जनता सरकार की उम्मीद पर ही और भरोसे पर निर्भर रहतीं है; क्योंकि उसका विश्वास होता है कि सरकार ही इस गरीबी, अशिक्षा को दूर कर सकती है।

  • निशिकांत ठाकुर (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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