
झारखंड: सांसद जोबा माझी ने Cell प्रबंधन को कड़ा संदेश दिया है कि लाठी के जोर पर विस्थापितों का हक मत मारिए, वरना जनता सड़क पर उतरेगी और लाठियां कम पड़ जाएंगी। नोवामुंडी प्रखंड के गुवा में नई परियोजना के नाम पर लोगों को बेदखल करने का विरोध तेज हो गया है। जोबा माझी ने विस्थापितों के साथ बैठक की और त्रिपक्षीय वार्ता का ऐलान किया। यह मुद्दा न सिर्फ स्थानीय लोगों के हक की लड़ाई है, बल्कि कॉर्पोरेट लालच के खिलाफ जनाक्रोश का प्रतीक भी। आइए, जानते हैं गुवा कांड की पूरी inside story और आगे की रणनीति।

Cell गुवा विस्थापन विवाद पृष्ठभूमि
झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के नोवामुंडी प्रखंड में स्थित गुवा एक खनिज समृद्ध इलाका है। यहां Cell (स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड) की नई परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण हो रहा है। लेकिन समस्या यह है कि Cell प्रबंधन स्थानीय आदिवासी और गरीब परिवारों को उजाड़ रहा है। पूर्वजों के खून-पसीने से सींची गई जमीन पर बसे ये परिवार घर के बदले घर की मांग कर रहे हैं।
विस्थापितों का कहना है कि सर्वे में सैकड़ों परिवार छूट गए। 184 नए घर बनाए गए, लेकिन 500 से ज्यादा परिवार प्रभावित हैं। Cell प्रबंधन अतिक्रमण हटाओ अभियान चला रहा है, लेकिन पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था नहीं। यह विवाद पुराना है – पहले भी सांसद जोबा माझी ने हस्तक्षेप किया था। गुवा बाजार के डीपासाई और जाटा हाटिंग क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रभावित लोग हैं। लाठी के जोर पर जबरन बेदखली की कोशिश से गुस्सा भड़क गया।
सांसद जोबा माझी का गुवा दौरा विस्थापितों का दर्द
शुक्रवार को सांसद जोबा माझी गुवा पहुंचीं। विस्थापित परिवारों और झामुमो समर्थकों ने उनका जोरदार स्वागत किया। बैठक में विस्थापितों ने अपनी व्यथा सुनाई – कैसे उनके पूर्वजों ने सेल को सींचा, लेकिन आज उन्हें ठोकर मिल रही है। मांगें साफ हैं: घर के बदले घर, छूटे परिवारों को शामिल करना, उचित मुआवजा।
जोबा माझी ने विस्थापितों को अपना परिवार बताया। उन्होंने कहा, “सेल प्रबंधन लाठी के जोर पर अन्याय न करे। जनता सड़क पर उतरेगी तो लाठियां कम पड़ जाएंगी। मैं सबसे आगे खड़ी रहूंगी।” उन्होंने चेतावनी दी कि जरूरत पड़ी तो संसद में मामला उठाएंगी और Cell के खनिज परिवहन को बाधित करेंगी। त्रिपक्षीय वार्ता जल्द होगी, जिसमें विस्थापितों की सभी मांगें रखी जाएंगी। यह बयानबाजी नहीं, बल्कि ठोस एक्शन का संकेत है।
बैठक में प्रमुख नेता
- झामुमो जिलाध्यक्ष सोनाराम देवगम
- सचिव राहुल आदित्य
- प्रवक्ता बुधराम लागुरी
- जिप अध्यक्ष लक्ष्मी सुरेन
- जिप सदस्य देवकी कुमारी
- मुखिया चाँदमनी लागुरी
ये सभी ने विस्थापितों का साथ दिया। बैठक में बामिया माझी, मानकी लागुरा देवगम, मोहम्मद तबारक, अभिषेक सिंकु समेत सैकड़ों विस्थापित मौजूद थे।
Cell विस्थापितों की मुख्य मांगें
गुवा विस्थापित किसी परियोजना का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन उनका हक चाहते हैं। यहां उनकी प्रमुख मांगें हैं:
- घर के बदले घर: पुराने घर जितना बड़ा नया घर।
- सर्वे सुधार: छूटे परिवारों को शामिल करें।
- मुआवजा: जमीन और फसल का पूरा हर्जाना।
- रोजगार: सेल में स्थानीय युवाओं को नौकरी।
- पुनर्वास: स्कूल, बाजार और सड़कें नए स्थान पर।
विस्थापितों ने कहा, “हम Cell के खिलाफ नहीं, लेकिन उजाड़े बिना विकास नहीं चलेगा।” यह मांगें जायज हैं, क्योंकि झारखंड में खनन से करोड़ों कमाई होती है, लेकिन स्थानीय गरीब क्यों भुगते?

जोबा माझी आदिवासी हितों की सच्ची रखवाली
जोबा माझी झारखंड की चक्रधरपुर से सांसद हैं। वे झामुमो की firebrand नेता हैं, जो आदिवासी अधिकारों के लिए जानी जाती हैं। पहले भी गुवा विस्थापन पर उन्होंने Cell सीजीएम से वार्ता की। उनका मानना है कि भारत और झारखंड लंबी लड़ाई से मिले हैं, कोई कॉर्पोरेट स्थानीय हक नहीं छीन सकता।
उनके संसद में सवाल – पर्यटन विकास से लेकर राशन वितरण तक – आदिवासी मुद्दों पर केंद्रित हैं। गुवा में उनका स्टैंड साफ है: एक भी परिवार बेघर नहीं होगा। यह लड़ाई झारखंड की बड़ी जंग का हिस्सा है।
Cell प्रबंधन की चूक
Cell ने बहाली में भी अनियमितता की। स्थानीय युवाओं को नौकरी न देकर बाहरी लाए। अतिक्रमण हटाओ में 500 पुलिस तैनात कीं, लेकिन पुनर्वास भूल गए। उपायुक्त ने कहा कि चाबी मिले तो घर खाली करें, लेकिन ग्राउंड पर दिक्कतें हैं।
त्रिपक्षीय वार्ता उम्मीद की किरण
जोबा माझी ने त्रिपक्षीय वार्ता का ऐलान किया – विस्थापित, Cell प्रबंधन और प्रशासन। पहले भी नरवा पहाड़ माइंस में ऐसी वार्ता सफल रही। सोमवार को धालभूम एसडीओ की मौजूदगी में समझौता हुआ। गुवा में भी यही फॉर्मूला काम करेगा।
वार्ता में मांगें प्रमुखता से रखी जाएंगी। अगर Cell नहीं माना, तो आंदोलन तेज होगा। सांसद ने खनिज परिवहन रोकने की धमकी दी है, जो सेल के लिए बड़ा झटका होगा।
झारखंड में विस्थापन की बड़ी समस्या
झारखंड खनिज धनी राज्य है, लेकिन विस्थापन सबसे बड़ी त्रासदी। Cell , यूएसआईएल जैसी कंपनियां करोड़ों कमाती हैं, लेकिन आदिवासी बेघर। पोटका, नरवा पहाड़ जैसे इलाकों में बार-बार आंदोलन। लाठी के जोर पर दमन से समस्या हल नहीं होती। केंद्र सरकार को नीति बनानी चाहिए – 100% पुनर्वास पहले।
झामुमो जैसे दल स्थानीय हितों की रक्षा कर रहे हैं। जोबा माझी जैसी नेता जरूरी हैं।
समाधान के उपाय
- कानूनी हस्तक्षेप: हाईकोर्ट में PIL।
- सर्वेक्षण: स्वतंत्र एजेंसी से नया सर्वे।
- पैकेज: मुआवजा + नौकरी + जमीन।
- आंदोलन: शांतिपूर्ण सत्याग्रह।
- नीति: विस्थापन कानून सख्त करें।
समाज पर प्रभाव जनआंदोलन की शुरुआत
यह घटना झारखंड भर में फैलेगी। गुवा से सबक मिलेगा कि एकजुट होकर लड़ो। Cell प्रबंधन को समझना होगा कि जनता की ताकत असीम है। विस्थापित खुशहाल होंगे तो विकास तेज होगा। जोबा माझी का साथ हर आदिवासी नेता को लेना चाहिए।
चुनौतियां और भविष्य
चुनौतियां बड़ी हैं – कॉर्पोरेट लॉबी, कमजोर प्रशासन। लेकिन त्रिपक्षीय वार्ता सफल हो सकती है। सांसद संसद में मुद्दा उठाएंगी। जनता जाग गई है, अब पीछे हटना मुश्किल।
Cell प्रबंधन लाठी के जोर पर विस्थापितों का हक नहीं मार सकता। सांसद जोबा माझी की अगुवाई में त्रिपक्षीय वार्ता न्याय दिलाएगी। एक भी परिवार बेघर न हो, यही विकास है। झारखंड के सभी विस्थापित एकजुट हों। लाठी कम पड़ जाएंगी अगर अन्याय हुआ।











































