“विद्यार्थियों के लिए क्या
वाकई थे सब इतने खपा।
नीट के लिए शिक्षा मंत्री
चलो अब दिया इस्तीफा।।
पेपर लीक तो और हुआ है
अन्य परीक्षाएं अन्य राज्य।
उन्हें भी तो इस्तीफा मागो
शिक्षा मंत्री जितने आज।।
देर आया दुरुस्त आया
उदाहरण तो किया पेश।
छात्रों का सम्मान बढ़ाया
जलने से बचाया देश।।
गिरेवान को झांको अब
अब तो तुम्हारी बारी है।
नैतिकता से इस्तीफा दो
समझूं तब बहादुरी है।।
इस्तेमाल मत करो उन्हें
वे देश का भविष्य है।
उन्हें भला क्या पता है
राजनीत क्या रहस्य है।।
गर संविधान नैतिकता
सब के लिए बराबर है।
दिख रही जो नैतिकता
कैसे इतनी अंतर है।?
देश-जनता देख रही है
उनकी परखी नजर है।
सुधार जाओ पस्ताओगे
आगे का जो मंजर है।।”
- करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद पोटका, पूर्वी सिंहभूम, झारखंड
भावार्थ
यह कविता छात्रों के भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और राजनीति पर आधारित है। कवि का कहना है कि यदि किसी बड़ी परीक्षा में हुई गड़बड़ी या विवाद की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कोई मंत्री इस्तीफा देता है, तो यही नैतिकता अन्य मामलों में भी समान रूप से लागू होनी चाहिए। कवि का मानना है कि केवल एक घटना पर प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं है। यदि अन्य परीक्षाओं में भी पेपर लीक या गंभीर अनियमितताएँ हुई हैं, तो उन मामलों में भी समान जवाबदेही तय होनी चाहिए।

कविता में छात्रों को देश का भविष्य बताया गया है और कहा गया है कि उन्हें राजनीतिक विवादों का माध्यम नहीं बनाना चाहिए। छात्र मेहनत करके अपने सपने पूरे करना चाहते हैं, इसलिए उनके हितों को सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए। कवि यह भी कहते हैं कि संविधान और नैतिकता सभी के लिए समान होनी चाहिए। यदि किसी एक व्यक्ति या घटना पर नैतिकता की बात की जाती है, तो वही मापदंड सभी पर लागू होना चाहिए। अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग रवैया अपनाना उचित नहीं है।
अंत में कवि नेताओं और जिम्मेदार लोगों से आत्ममंथन करने की अपील करते हैं। उनका कहना है कि जनता सब कुछ देख रही है और समय आने पर सही-गलत का निर्णय करेगी। इसलिए सत्ता में बैठे लोगों को निष्पक्षता, जवाबदेही और नैतिक मूल्यों का पालन करते हुए देश और छात्रों के हित में कार्य करना चाहिए।














