
नई दिल्ली: सिख पंथ के नौवें गुरु Guru Tegh Bahadur जी महाराज का प्रकाश पर्व देशभर में श्रद्धा, आस्था और गौरव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में गुरुद्वारों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए गए, जहां श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में पहुंचकर गुरु जी को नमन किया और उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

यह पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक ऐसे महापुरुष के जीवन और बलिदान को याद करने का अवसर है, जिन्होंने मानवता, धार्मिक स्वतंत्रता और सत्य की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। इसी कारण गुरु तेग बहादुर जी को “हिन्द दी चादर” यानी भारत की ढाल कहा जाता है।
प्रकाश पर्व के अवसर पर Gurudwara Sis Ganj Sahib और Harmandir Sahib सहित देशभर के प्रमुख गुरुद्वारों में सुबह से ही कीर्तन, अरदास और गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ का आयोजन हुआ। श्रद्धालुओं ने सेवा भाव से लंगर में भाग लिया और गुरु जी की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। कई स्थानों पर नगर कीर्तन भी निकाले गए, जिनमें गुरु तेग बहादुर जी के जीवन की झलक प्रस्तुत की गई।
गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 1 अप्रैल 1621 को Amritsar में हुआ था। वे सिखों के छठे गुरु Guru Hargobind जी के पुत्र थे। बचपन से ही उनमें आध्यात्मिकता, साहस और वीरता के गुण स्पष्ट रूप से दिखाई देते थे। उनका नाम “तेग बहादुर” उनके अद्भुत युद्ध कौशल और वीरता के कारण पड़ा। वे एक ओर जहां तलवार के धनी योद्धा थे, वहीं दूसरी ओर एक महान संत, चिंतक और कवि भी थे।
उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय तप, साधना और मानव सेवा में बिताया। सादगी, विनम्रता और उच्च नैतिक मूल्यों के प्रतीक गुरु जी ने लोगों को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा दी। उनकी वाणी, जो Guru Granth Sahib में संकलित है, आज भी जीवन को सही दिशा देने का कार्य करती है।
उस समय भारत में मुगल सम्राट Aurangzeb का शासन था, जब धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही थी। कश्मीरी पंडितों पर जबरन धर्म परिवर्तन का संकट मंडरा रहा था। इस कठिन समय में उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी से सहायता की गुहार लगाई। यह केवल एक समुदाय का मुद्दा नहीं था, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की रक्षा का प्रश्न बन गया था।
गुरु तेग बहादुर जी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का निर्णय लिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि वे धर्म परिवर्तन कर लेते हैं, तो अन्य लोग भी कर लेंगे, अन्यथा उन्हें अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता दी जाए। यह निर्णय उनके अद्भुत साहस और दृढ़ संकल्प का प्रतीक था।
औरंगजेब के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार कर Delhi लाया गया, जहां उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी गईं। उनके साथियों—भाई मति दास, भाई सती दास और भाई दयाला को भी अमानवीय यातनाएं दी गईं, लेकिन सभी अपने धर्म और सिद्धांतों पर अडिग रहे।
अंततः 1675 में चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान हुआ। उन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा धर्म दूसरों के अधिकारों की रक्षा करना है। उनका यह बलिदान भारतीय इतिहास में अद्वितीय है, क्योंकि उन्होंने अपने धर्म के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।
आज के समय में भी उनका जीवन और संदेश उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने हमें सिखाया कि अन्याय, अत्याचार और असत्य के विरुद्ध खड़ा होना हर व्यक्ति का कर्तव्य है। उनकी शिक्षाएं सहिष्णुता, भाईचारे और मानवता की भावना को मजबूत करती हैं।
प्रकाश पर्व के इस अवसर पर देशभर में आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों ने उनके आदर्शों को याद किया और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। यह पर्व हमें यह संदेश देता है कि सच्ची श्रद्धांजलि केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्मों में होती है हिन्द दी चादर” गुरु तेग बहादुर जी का जीवन एक प्रकाश स्तंभ की तरह है, जो हमें सत्य, साहस और त्याग के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यदि समाज उनके आदर्शों को अपनाए, तो एक न्यायपूर्ण, शांतिपूर्ण और समरस समाज की स्थापना संभव है।









