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अबुआ राज के 25 बरिस बाद भी… सड़कों से दूर, सिस्टम से दूर आदिवासी समाज!

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On: July 16, 2025 10:14 PM
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तस्वीर: डूमरचीर पंचायत, बड़ा बास्को पहाड़ से मरीज को खाट पर ले जाते ग्रामीण
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अमड़ापाड़ा/पाकुड़: अबुआ राज के लगभग 25 साल हो गए झारखंड बने, लेकिन जिस सपने के साथ यह राज्य बना था — “अपना राज, अपनी सरकार, अपने लोग” — उस सपने की हकीकत आज भी कई गाँवों में खाट पर लदे मरीज़ों की चुप्पी बन कर रह गई है।

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यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि झारखंड की हकीकत है। अमड़ापाड़ा प्रखंड के एक पहाड़ी गांव से एक बीमार को खाट पर उठाकर कई किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाया गया, क्योंकि वहाँ न सड़क थी, न एम्बुलेंस, और न ही कोई प्रशासनिक ध्यान।

यह वही झारखंड है जहाँ आदिवासी स्वशासन, आत्मनिर्भरता और विकास का सपना लिए अलग राज्य की मांग हुई थी।

कहा गया था –

“अब हमारे अपने राज में हमारे समाज की बात सुनी जाएगी, हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और इज्ज़त मिलेगी…”

पर आज भी अगर लोगों को बीमार होने पर खाट पर लादकर जंगल-पहाड़ पार करना पड़ रहा है, तो यह सवाल बन जाता है – क्या यह अबुआ राज है?

अबुआ राज में स्थानीय लोगों की पीड़ा:

 “हमरा गाँव में रोड नाही, एम्बुलेंस कहाँ से आईत? जेकरा के बुखार होता, ओकरा के बाँस के खाट पर उठाके अस्पताल ले जाई के परी।”

राजनीति बनाम ज़िम्मेदारी

झारखंड की वर्तमान सरकार से लोग उम्मीद करते थे कि आदिवासी समाज की बातें समझी जाएंगी, लेकिन भ्रष्टाचार, घोटाले, बेरुखी और लापरवाही ने लोगों को मायूस कर दिया है।

आज हालत यह है कि

  • गाँवों में डॉक्टर नहीं
  •  एम्बुलेंस नहीं
  •  सड़कों का कोई नामोनिशान नहीं

देश ने तरक्की की है — एक आदिवासी बेटी आज राष्ट्रपति बनी है, मगर झारखंड का मूल निवासी आज भी सरकार की अनदेखी और उदासीनता से त्रस्त है।

सरकार से जनता की अपील

  • राजनीति तो चलती रहेगी, पर क्या इंसानियत थोड़ी देर के लिए प्राथमिकता नहीं बन सकती?
  • क्या पहाड़ के इन मासूमों की तकलीफें कभी फ़ाइलों से बाहर निकलकर ज़मीर तक पहुँचेंगी?

लगभग पच्चीस साल पहले, झारखंड को अलग राज्य का दर्जा इस उम्मीद से दिया गया था कि यहाँ की सरकार आदिवासी समाज की ज़रूरतों को समझेगी, उनकी संस्कृति, अधिकार और अस्मिता को प्राथमिकता देगी। सपनों में यह तस्वीर थी कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और खेती जैसे बुनियादी मुद्दों पर झारखंडी सोच और ज़मीनी समझ से नीतियाँ बनेंगी, ताकि आदिवासी समाज देश की तरक्की में बराबरी से भागीदार बन सके।

लेकिन आज, इस सपने की तस्वीर धुंधली हो गई है।

देश ने वाकई तरक्की की है — एक आदिवासी बेटी, द्रौपदी मुर्मू आज भारत की राष्ट्रपति हैं। यह गौरव का क्षण है। लेकिन झारखंड के गाँवों की गलियों में, पहाड़ों के बीच, आज भी लोग खाट पर मरीजों को ढोने पर मजबूर हैं — ये दृश्य दर्दनाक हैं और असल में ये सरकार की प्राथमिकताओं का आईना हैं।

अमड़ापाड़ा की डूमरचीर पंचायत की कहानी:
बड़ा बास्को पहाड़ में एक बीमार व्यक्ति को जब अस्पताल ले जाना पड़ा, तो न कोई सड़क मिली, न एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता। परिजनों ने खाट में बाँस की मदद से उसे कई किलोमीटर तक ढोया, ताकि वह ज़िंदा रह सके। यह वही झारखंड है, जिसके लिए कहा गया था — अबुआ राज में अबुआ नियम होबे।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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