
अमड़ापाड़ा/पाकुड़: अबुआ राज के लगभग 25 साल हो गए झारखंड बने, लेकिन जिस सपने के साथ यह राज्य बना था — “अपना राज, अपनी सरकार, अपने लोग” — उस सपने की हकीकत आज भी कई गाँवों में खाट पर लदे मरीज़ों की चुप्पी बन कर रह गई है।

यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, बल्कि झारखंड की हकीकत है। अमड़ापाड़ा प्रखंड के एक पहाड़ी गांव से एक बीमार को खाट पर उठाकर कई किलोमीटर दूर अस्पताल ले जाया गया, क्योंकि वहाँ न सड़क थी, न एम्बुलेंस, और न ही कोई प्रशासनिक ध्यान।
यह वही झारखंड है जहाँ आदिवासी स्वशासन, आत्मनिर्भरता और विकास का सपना लिए अलग राज्य की मांग हुई थी।
कहा गया था –
“अब हमारे अपने राज में हमारे समाज की बात सुनी जाएगी, हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और इज्ज़त मिलेगी…”
पर आज भी अगर लोगों को बीमार होने पर खाट पर लादकर जंगल-पहाड़ पार करना पड़ रहा है, तो यह सवाल बन जाता है – क्या यह अबुआ राज है?
अबुआ राज में स्थानीय लोगों की पीड़ा:
“हमरा गाँव में रोड नाही, एम्बुलेंस कहाँ से आईत? जेकरा के बुखार होता, ओकरा के बाँस के खाट पर उठाके अस्पताल ले जाई के परी।”
राजनीति बनाम ज़िम्मेदारी
झारखंड की वर्तमान सरकार से लोग उम्मीद करते थे कि आदिवासी समाज की बातें समझी जाएंगी, लेकिन भ्रष्टाचार, घोटाले, बेरुखी और लापरवाही ने लोगों को मायूस कर दिया है।
आज हालत यह है कि
- गाँवों में डॉक्टर नहीं
- एम्बुलेंस नहीं
- सड़कों का कोई नामोनिशान नहीं
देश ने तरक्की की है — एक आदिवासी बेटी आज राष्ट्रपति बनी है, मगर झारखंड का मूल निवासी आज भी सरकार की अनदेखी और उदासीनता से त्रस्त है।
सरकार से जनता की अपील
- राजनीति तो चलती रहेगी, पर क्या इंसानियत थोड़ी देर के लिए प्राथमिकता नहीं बन सकती?
- क्या पहाड़ के इन मासूमों की तकलीफें कभी फ़ाइलों से बाहर निकलकर ज़मीर तक पहुँचेंगी?
लगभग पच्चीस साल पहले, झारखंड को अलग राज्य का दर्जा इस उम्मीद से दिया गया था कि यहाँ की सरकार आदिवासी समाज की ज़रूरतों को समझेगी, उनकी संस्कृति, अधिकार और अस्मिता को प्राथमिकता देगी। सपनों में यह तस्वीर थी कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और खेती जैसे बुनियादी मुद्दों पर झारखंडी सोच और ज़मीनी समझ से नीतियाँ बनेंगी, ताकि आदिवासी समाज देश की तरक्की में बराबरी से भागीदार बन सके।
लेकिन आज, इस सपने की तस्वीर धुंधली हो गई है।
देश ने वाकई तरक्की की है — एक आदिवासी बेटी, द्रौपदी मुर्मू आज भारत की राष्ट्रपति हैं। यह गौरव का क्षण है। लेकिन झारखंड के गाँवों की गलियों में, पहाड़ों के बीच, आज भी लोग खाट पर मरीजों को ढोने पर मजबूर हैं — ये दृश्य दर्दनाक हैं और असल में ये सरकार की प्राथमिकताओं का आईना हैं।
अमड़ापाड़ा की डूमरचीर पंचायत की कहानी:
बड़ा बास्को पहाड़ में एक बीमार व्यक्ति को जब अस्पताल ले जाना पड़ा, तो न कोई सड़क मिली, न एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता। परिजनों ने खाट में बाँस की मदद से उसे कई किलोमीटर तक ढोया, ताकि वह ज़िंदा रह सके। यह वही झारखंड है, जिसके लिए कहा गया था — अबुआ राज में अबुआ नियम होबे।











































