
जामताड़ा: Jamtara हूल दिवस के अवसर पर झारखंड की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने संथाल परगना के ऐतिहासिक भोगनाडीह गांव में प्रशासनिक व्यवस्थाओं और सुरक्षा इंतजामों को लेकर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि वीर सिदो-कान्हू की धरती को पुलिस छावनी में बदल दिया गया है और उनके वंशजों तथा ग्रामीणों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है, मानो वे अपने ही इतिहास और शहीदों को श्रद्धांजलि देने के अधिकार से वंचित हों।

चम्पाई सोरेन ने कहा कि वीर सिदो-कान्हू की विरासत को कमजोर करने या उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने की किसी भी कोशिश को झारखंड की जनता कभी स्वीकार नहीं करेगी। उन्होंने कहा कि जो लोग वीरों की धरती पर अत्याचार कर रहे हैं, उन्हें जनता लोकतांत्रिक तरीके से करारा जवाब देगी।
हूल दिवस पर भोगनाडीह को बनाया गया पुलिस छावनी चम्पाई सोरेन
चम्पाई सोरेन ने अपने बयान में कहा कि हूल दिवस जैसे ऐतिहासिक अवसर पर भोगनाडीह गांव में भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई है। उनके अनुसार, पूरे क्षेत्र को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है।
उन्होंने दावा किया कि प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था के लिए 58 मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति की है और गांव के विभिन्न हिस्सों में पुलिस का कड़ा पहरा लगाया गया है। उनका कहना था कि इस तरह की व्यवस्था से स्थानीय लोगों और श्रद्धांजलि देने आने वालों में असहजता का माहौल बना।
वीरों को नमन करने के लिए भी लेनी पड़ रही अनुमति’
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि वीर सिदो-कान्हू के वंशजों और ग्रामीणों को अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने के लिए भी प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ रही है।
उन्होंने कहा कि लोगों से कथित रूप से बॉन्ड भरवाए जाने जैसी प्रक्रियाएं अपनाई जा रही हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं हैं। उनके अनुसार, यह स्थिति उन शहीदों के सम्मान के विपरीत है जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर देश की आजादी की नींव मजबूत की थी।
1855 के संथाल हूल की याद दिलाई
चम्पाई सोरेन ने अपने संबोधन में वर्ष 1855 के ऐतिहासिक संथाल हूल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय वीर सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव और फूलो-झानो ने अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंका था।
उन्होंने कहा कि इन महान क्रांतिकारियों ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि आजादी के सात दशक बाद भी उनके वंशजों को अपने ही गांव में श्रद्धांजलि देने के लिए प्रशासनिक अनुमति और औपचारिकताओं का सामना करना पड़ेगा।
उन्होंने कहा कि हूल केवल एक आंदोलन नहीं था, बल्कि जल, जंगल, जमीन और स्वाभिमान की रक्षा का ऐतिहासिक संघर्ष था, जिसने पूरे देश को प्रेरित किया।
सरकार पर लगाए तानाशाही रवैये के आरोप
चम्पाई सोरेन ने राज्य सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सत्ता के प्रभाव में सरकार लोकतांत्रिक अधिकारों की अनदेखी कर रही है।
उन्होंने कहा कि आज देश लोकतांत्रिक व्यवस्था से चलता है और किसी भी नागरिक को अपने इतिहास, संस्कृति और शहीदों को सम्मान देने से नहीं रोका जा सकता। उनके अनुसार, यदि ऐसा किया जाता है तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
ब्रिटिश शासन नहीं, लोकतंत्र का दौर है’
अपने बयान में चम्पाई सोरेन ने कहा कि अब देश में न तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद है और न ही राजशाही का शासन। उन्होंने कहा कि आज भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है, जहां नागरिकों को संविधान द्वारा अभिव्यक्ति और श्रद्धांजलि अर्पित करने का अधिकार प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि वह लोगों को उनके महान स्वतंत्रता सेनानियों और जननायकों को सम्मान देने से रोके।
वीर सिदो-कान्हू की विरासत को मिटाने की कोशिश सफल नहीं होगी
चम्पाई सोरेन ने कहा कि वीर सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव और फूलो-झानो की विरासत झारखंड की पहचान है। उन्होंने कहा कि इन महान क्रांतिकारियों के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि कोई उनकी विरासत को कमजोर करने या उनके सम्मान को कम करने का प्रयास करेगा, तो झारखंड की जनता इसका लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देगी।
हूल दिवस का ऐतिहासिक महत्व
हूल दिवस हर वर्ष 30 जून को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष 1855 में शुरू हुए संथाल हूल की याद में मनाया जाता है, जब वीर सिदो-कान्हू, चाँद, भैरव, फूलो और झानो सहित हजारों संथाल वीरों ने अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ ऐतिहासिक विद्रोह किया था।
यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती और महत्वपूर्ण जनआंदोलनों में से एक माना जाता है। झारखंड सहित पूर्वी भारत के कई क्षेत्रों में इस दिन शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और विभिन्न सांस्कृतिक एवं स्मृति कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
राजनीतिक बयान के बाद बढ़ी चर्चा
चम्पाई सोरेन के इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। हूल दिवस जैसे ऐतिहासिक अवसर पर प्रशासनिक व्यवस्थाओं और सुरक्षा इंतजामों को लेकर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है।
हालांकि, इस संबंध में प्रशासन की ओर से इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
हूल दिवस के अवसर पर पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने भोगनाडीह में सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर राज्य सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि वीर सिदो-कान्हू और अन्य हूल वीरों की विरासत झारखंड की अस्मिता का प्रतीक है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके वंशजों और ग्रामीणों को श्रद्धांजलि देने में अनावश्यक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, इस विषय पर प्रशासन का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।





































