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13 साल का संघर्ष, मां का आखिरी स्पर्श: गाज़ियाबाद के हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति

On: March 15, 2026 12:57 PM
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गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश | विशेष रिपोर्ट

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मां और बेटे का रिश्ता दुनिया का सबसे गहरा रिश्ता माना जाता है। एक मां के लिए उसका बच्चा चाहे जितना बड़ा हो जाए, वह हमेशा बच्चा ही रहता है। गाज़ियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन निवासी हरीश राणा की कहानी इसी ममता, दर्द और संघर्ष की एक मार्मिक मिसाल बनकर सामने आई है।

करीब 13 वर्षों तक कोमा जैसी स्थिति में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करने के बाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल नियमों के तहत उन्हें “पैसिव इच्छामृत्यु (Right to Die with Dignity)” की अनुमति दे दी।

लेकिन इस फैसले के पीछे छिपी एक मां की पीड़ा और बेटे के लिए उसका अंतिम आशीर्वाद हर किसी की आंखें नम कर देने वाला है।

जब अंतिम क्षण आए, तो हरीश की मां चुपचाप उनके सिरहाने बैठीं, बेटे का सिर सहलाया और भर्राए गले से बोलीं —

“जा लल्ला… अब सो जा।”

यह सिर्फ एक वाक्य नहीं था, बल्कि एक मां का टूटा हुआ दिल और 13 साल की लंबी पीड़ा का अंत था।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति देकर भारत में “सम्मानजनक मृत्यु के अधिकार” पर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की विस्तृत रिपोर्ट, डॉक्टरों की राय और परिवार की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय सुनाया।

अदालत ने आदेश दिया कि निर्धारित मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत सरकारी अस्पताल में चरणबद्ध तरीके से लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम हटाया जाए, ताकि मरीज को गरिमा के साथ विदा दी जा सके।

यह फैसला भारत में इच्छामृत्यु को लेकर चल रही कानूनी और नैतिक बहस में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।

THE NEWS FRAME

2013 का हादसा जिसने बदल दी जिंदगी

हरीश राणा की जिंदगी 21 अगस्त 2013 को हुए एक दर्दनाक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई। जानकारी के अनुसार, हरीश उस समय चंडीगढ़ में एक ऊंची इमारत से गिर गए थे, जिससे उन्हें सिर और रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आईं।

इस दुर्घटना के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह Persistent Vegetative State (PVS) में चले गए हैं।

इस स्थिति में व्यक्ति:

  • बोल नहीं सकता
  • चल-फिर नहीं सकता
  • खुद से खाना नहीं खा सकता
  • और बाहरी दुनिया के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाता

हरीश पिछले 13 वर्षों से पूरी तरह लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम और मेडिकल देखभाल पर निर्भर थे।

13 साल तक परिवार ने नहीं छोड़ी उम्मीद

हरीश राणा के माता-पिता ने इन 13 वर्षों में बेटे की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके पिता अशोक राणा और मां ने हर संभव इलाज करवाया। कई अस्पतालों में डॉक्टरों से सलाह ली गई और उम्मीद की कि शायद कभी हरीश की हालत में सुधार हो जाए।

लेकिन वर्षों के इलाज के बावजूद उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। समय के साथ डॉक्टरों ने भी स्पष्ट कर दिया कि हरीश के ठीक होने की संभावना बेहद कम है

अदालत का दरवाज़ा खटखटाया

लंबे समय तक चले इस संघर्ष के बाद हरीश के परिवार ने अदालत का रुख किया।

परिवार ने कोर्ट से अपील की कि:

  • हरीश अब सामान्य जीवन नहीं जी सकते
  • वह पूरी तरह लाइफ़ सपोर्ट पर निर्भर हैं
  • उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है

ऐसे में उन्हें गरिमा के साथ मृत्यु (Right to Die with Dignity) का अधिकार दिया जाए।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर डॉक्टरों के एक विशेष मेडिकल बोर्ड ने हरीश की स्थिति का विस्तृत परीक्षण किया।

मेडिकल रिपोर्ट में पाया गया कि:

  • हरीश पिछले 13 वर्षों से Persistent Vegetative State में हैं
  • उनके मस्तिष्क की सामान्य गतिविधियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं
  • उनके ठीक होने की संभावना अत्यंत कम है

इन तथ्यों के आधार पर मेडिकल बोर्ड ने भी पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति देने की सिफारिश की

भारत में इच्छामृत्यु का कानूनी पक्ष

भारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) को लेकर कानून लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने “Right to Die with Dignity” को मौलिक अधिकारों के दायरे में स्वीकार किया था और कुछ शर्तों के साथ पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी।

पैसिव इच्छामृत्यु का मतलब होता है:

  • मरीज के लाइफ़ सपोर्ट सिस्टम को हटाना
  • कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों को बंद करना
  • लेकिन सक्रिय रूप से मृत्यु देने की अनुमति नहीं होती

हरीश राणा का मामला इसी कानूनी प्रावधान के तहत आया।

एक मां का दर्द, जो शब्दों में नहीं समा सकता

इस पूरी कहानी का सबसे भावुक पल वह था जब बेटे के अंतिम समय में उसकी मां उसके पास बैठी थीं। 13 साल तक बेटे की सेवा करने के बाद जब उन्हें विदा करने का समय आया, तो मां ने बस इतना कहा:

“जा लल्ला… अब सो जा।”

यह एक मां की मजबूरी थी। यह एक मां का त्याग था। और यह उस दर्द का प्रतीक था जिसे शायद शब्दों में कभी पूरी तरह बयान नहीं किया जा सकता।

एक परिवार की पीड़ा और कानून का संतुलन

हरीश राणा का मामला सिर्फ एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, परिवार की पीड़ा और चिकित्सा नैतिकता के बीच संतुलन का उदाहरण है।

यह घटना यह भी दिखाती है कि कभी-कभी जीवन को बचाने की कोशिश जितनी कठिन होती है, उतना ही कठिन होता है किसी प्रियजन को गरिमा के साथ विदा करने का निर्णय लेना।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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