भारत के कृषि इतिहास में कुछ ऐसे महान व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने अपनी वैज्ञानिक सोच और दूरदर्शिता से देश की दिशा बदलने का काम किया। डॉ. एम. एस. Swaminathan उन्हीं महान वैज्ञानिकों में से एक थे। उन्होंने कृषि विज्ञान को प्रयोगशालाओं तक सीमित न रखकर उसे खेतों और किसानों तक पहुंचाया। उनके प्रयासों ने भारत को उस दौर से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जब देश खाद्यान्न संकट और विदेशी अनाज पर निर्भरता से जूझ रहा था।
डॉ. स्वामीनाथन का पूरा जीवन किसान, कृषि और खाद्य सुरक्षा को समर्पित रहा। इसी योगदान के कारण उन्हें भारतीय हरित क्रांति का जननायक कहा जाता है। उनकी जयंती के अवसर पर उन्हें याद करना भारत की कृषि आत्मनिर्भरता की उस यात्रा को याद करना है, जिसने करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया।
7 अगस्त 1925 को हुआ जन्म
डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था। उनका बचपन ऐसे दौर में बीता, जब भारत गरीबी, भुखमरी और औपनिवेशिक शोषण जैसी गंभीर चुनौतियों से गुजर रहा था।
वर्ष 1943 का बंगाल अकाल उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ने वाली घटना बनी। इस अकाल में बड़ी संख्या में लोगों की भूख और कुपोषण के कारण मृत्यु हुई। इस भयावह स्थिति ने युवा स्वामीनाथन को सोचने के लिए मजबूर किया कि देश में खाद्यान्न की कमी को स्थायी रूप से कैसे दूर किया जा सकता है।
शुरुआत में उनका रुझान चिकित्सा के क्षेत्र में जाने का था, लेकिन बंगाल अकाल की त्रासदी देखने के बाद उन्होंने अपना जीवन कृषि विज्ञान को समर्पित करने का निर्णय लिया।
कृषि विज्ञान को बनाया जीवन का लक्ष्य
डॉ. स्वामीनाथन ने मद्रास एग्रीकल्चरल कॉलेज से कृषि शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली से आनुवंशिकी और पादप प्रजनन के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हासिल की।
उन्होंने आगे चलकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की। इसके बाद अमेरिका में भी उन्हें शोध करने के अवसर मिले। उनके सामने विदेश में बेहतर करियर बनाने के कई अवसर थे, लेकिन उन्होंने भारत लौटना पसंद किया।
उनका मानना था कि वैज्ञानिक ज्ञान का वास्तविक उद्देश्य समाज की समस्याओं का समाधान करना होना चाहिए। इसी सोच के साथ उन्होंने भारतीय किसानों की उत्पादकता बढ़ाने और देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
खाद्यान्न संकट के दौर में मिली बड़ी चुनौती
1960 के दशक में भारत गंभीर खाद्यान्न संकट से गुजर रहा था। देश की आबादी तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन कृषि उत्पादन उसकी जरूरतों के अनुरूप नहीं था। भारत को अपनी खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में विदेशी अनाज पर निर्भर रहना पड़ता था।
ऐसे कठिन समय में डॉ. स्वामीनाथन ने भारतीय कृषि में वैज्ञानिक तकनीकों को बड़े पैमाने पर लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग के साथ मिलकर उच्च उत्पादकता वाली गेहूँ की किस्मों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित और बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
हरित क्रांति को सफल बनाने में अहम भूमिका
हरित क्रांति केवल उन्नत बीजों के इस्तेमाल से सफल नहीं हुई। इसके पीछे सिंचाई, उर्वरक, कृषि विस्तार सेवाएं, आधुनिक कृषि तकनीक और सरकारी खरीद व्यवस्था जैसे कई महत्वपूर्ण तत्व शामिल थे।
डॉ. स्वामीनाथन ने इन सभी पहलुओं को एक साथ जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इसका प्रभाव सबसे पहले दिखाई दिया। बाद में यह अभियान देश के दूसरे हिस्सों तक भी पहुंचा।
उच्च उत्पादकता वाले बीजों और आधुनिक कृषि तकनीकों के इस्तेमाल से गेहूँ और अन्य प्रमुख फसलों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। धीरे-धीरे भारत विदेशी खाद्यान्न पर निर्भर देश से खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर देश बनने की दिशा में आगे बढ़ा।
केवल उत्पादन नहीं, पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर
डॉ. स्वामीनाथन की सोच केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं थी। वे इस बात को लेकर भी चिंतित थे कि लगातार रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और भूजल के अत्यधिक दोहन से भविष्य में कृषि और पर्यावरण को नुकसान हो सकता है।
उन्होंने समय रहते टिकाऊ कृषि की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका मानना था कि आज की कृषि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जो आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों को भी पूरा कर सके।
इसी सोच से उन्होंने “सदाबहार क्रांति” (Evergreen Revolution) का विचार सामने रखा। इसका उद्देश्य कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता, जल संरक्षण, जैव-विविधता और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखना था।
राष्ट्रीय किसान आयोग में किसानों के हित की आवाज
डॉ. स्वामीनाथन ने किसानों की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए नीति स्तर पर भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
वर्ष 2004 में गठित राष्ट्रीय किसान आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने किसानों की आर्थिक स्थिति, कृषि ऋण, फसल बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य और महिला किसानों के अधिकारों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं।
उनकी रिपोर्ट में किसान की आय और कृषि को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने पर विशेष जोर दिया गया। आज भी उनकी सिफारिशों को भारतीय कृषि नीति और किसान कल्याण से जुड़े विमर्श में महत्वपूर्ण माना जाता है।
किसानों के साथ महिलाओं की भूमिका को भी माना महत्वपूर्ण
डॉ. स्वामीनाथन का दृष्टिकोण कृषि क्षेत्र को व्यापक रूप से देखने वाला था। उनका मानना था कि खेती में महिलाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि कार्यों में महिलाओं के योगदान को पहचान दिलाने तथा महिला किसानों को अधिकार और संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में भी उन्होंने आवाज उठाई।
उनकी सोच थी कि कृषि विकास तभी वास्तविक रूप से सफल माना जाएगा, जब उसका लाभ छोटे और सीमांत किसानों तथा ग्रामीण परिवारों तक पहुंचे।
देश-विदेश के अनेक सम्मानों से हुए सम्मानित
कृषि विज्ञान और भारत की खाद्य सुरक्षा में डॉ. स्वामीनाथन के योगदान को देश और दुनिया ने सम्मान दिया। उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।
उन्हें विश्व खाद्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने कृषि और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल भारत रत्न से अलंकृत किया।
ये सम्मान उनके वैज्ञानिक योगदान के साथ-साथ किसान और समाज के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का भी प्रमाण हैं।
28 सितंबर 2023 को हुआ निधन
लंबे और प्रेरणादायी जीवन के बाद डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का 28 सितंबर 2023 को निधन हो गया। उनके निधन से भारत ने कृषि विज्ञान और खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में एक महान मार्गदर्शक को खो दिया।
हालांकि उनका भौतिक जीवन समाप्त हो गया, लेकिन उनकी वैज्ञानिक सोच, किसान-केंद्रित दृष्टिकोण और टिकाऊ कृषि की अवधारणा आज भी प्रासंगिक है।
आज भी प्रासंगिक है डॉ. स्वामीनाथन की सोच
आज भारत खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में काफी आगे बढ़ चुका है, लेकिन कृषि के सामने नई चुनौतियां भी मौजूद हैं। जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी, मिट्टी की गिरती गुणवत्ता, किसानों की आय और टिकाऊ कृषि जैसे विषय लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।
ऐसे समय में डॉ. स्वामीनाथन का सदाबहार क्रांति का विचार और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। कृषि विकास ऐसा होना चाहिए, जिसमें उत्पादन के साथ प्रकृति और किसानों दोनों का हित सुरक्षित रहे।
भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता के महान शिल्पी
डॉ. एम. एस. Swaminathan केवल एक कृषि वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वे भारत की खाद्य सुरक्षा और कृषि आत्मनिर्भरता के महान शिल्पी थे। उन्होंने विज्ञान को किसान की जरूरतों से जोड़ा और यह दिखाया कि सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नीतिगत समर्थन और किसान की मेहनत मिलकर देश की तस्वीर बदल सकते हैं।
जब भी भारत की खाद्य आत्मनिर्भरता, हरित क्रांति और किसान कल्याण की चर्चा होगी, डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक महान वैज्ञानिक को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस विचार को सम्मान देना है जिसमें किसान मजबूत हो, कृषि टिकाऊ हो और देश खाद्य सुरक्षा के मामले में आत्मनिर्भर रहे।






















