नई दिल्ली, 6 अगस्त। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को एक प्रेरणादायी संस्कृत सुभाषितम् साझा करते हुए मानव और प्रकृति के बीच संतुलित एवं सामंजस्यपूर्ण संबंधों का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पृथ्वी समस्त जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और मानव जीवन का पालन-पोषण करने वाली माता है, इसलिए उसके संरक्षण और सम्मान का भाव प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का हिस्सा होना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स (X) पर वैदिक परंपरा से जुड़ा यह संस्कृत श्लोक साझा किया—
विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्।
शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥
विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्।
शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥ pic.twitter.com/jjaeiNMgvJ
— Narendra Modi (@narendramodi) August 6, 2026
इस श्लोक का भावार्थ है कि पृथ्वी समस्त औषधियों और जीवन की पालन-पोषण करने वाली माता है। वह धर्म और नैतिक व्यवस्था के आधार पर स्थिर है। हम सभी उसके साथ कल्याणकारी और सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते हुए जीवन व्यतीत करें।
प्रधानमंत्री का यह संदेश पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और प्रकृति के प्रति भारतीय संस्कृति की प्राचीन सोच को रेखांकित करता है। भारतीय परंपरा में पृथ्वी को केवल प्राकृतिक संसाधनों का स्रोत नहीं, बल्कि “माता” का दर्जा दिया गया है, जिसकी रक्षा और सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व माना गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय असंतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के दौर में इस प्रकार के संदेश समाज को प्रकृति के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया यह संस्कृत सुभाषितम् भारतीय ज्ञान परंपरा के उस मूल दर्शन को भी सामने लाता है, जिसमें मानव और प्रकृति के बीच संतुलन को सुख, समृद्धि और वैश्विक कल्याण का आधार माना गया है।













