नई दिल्ली: पश्चिम Asia (मध्य पूर्व) में लगातार बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर में जहाजों पर हमलों तथा सैन्य गतिविधियों के कारण वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इसका सबसे बड़ा असर उन देशों पर पड़ सकता है, जो कच्चे तेल के आयात पर निर्भर हैं। भारत भी ऐसे देशों में शामिल है, क्योंकि देश अपनी कुल तेल आवश्यकता का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा, ईंधन की कीमतों, महंगाई और आर्थिक विकास पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है पश्चिम एशिया?
भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व के देशों से पूरा होता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और अन्य खाड़ी देश भारत को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करते हैं।
देश में इस्तेमाल होने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग आधा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में यदि यहां युद्ध, समुद्री संघर्ष या आपूर्ति में कोई बाधा आती है, तो उसका सीधा असर भारत की ऊर्जा व्यवस्था पर पड़ना तय माना जाता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्र
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य से प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का परिवहन होता है।
यदि इस मार्ग पर किसी कारणवश जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो पूरी दुनिया में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसी तरह लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में बढ़ते सुरक्षा जोखिमों ने भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित किया है।
समुद्री व्यापार पर बढ़ा खतरा
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने अपने नियमित समुद्री मार्ग बदल दिए हैं।
अब बड़ी संख्या में जहाज अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा सफर तय कर रहे हैं। इससे माल की डिलीवरी में 10 से 15 दिन तक की अतिरिक्त देरी हो रही है। साथ ही जहाजों के संचालन की लागत भी काफी बढ़ गई है।
बीमा और माल ढुलाई हुई महंगी
समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा जोखिम बढ़ने के कारण जहाजों के लिए वॉर रिस्क इंश्योरेंस का प्रीमियम कई गुना बढ़ गया है।
इसका सीधा असर माल ढुलाई की लागत पर पड़ा है। शिपिंग कंपनियां अतिरिक्त खर्च को आयातकों पर डाल रही हैं, जिससे आयातित वस्तुएं पहले की तुलना में महंगी हो सकती हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी
भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति और गंभीर होती है, तो कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल या उससे अधिक तक पहुंच सकती हैं। इससे तेल आयात करने वाले देशों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।
भारत का आयात बिल बढ़ने की आशंका
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि होती है, तो भारत का वार्षिक आयात बिल अरबों डॉलर तक बढ़ सकता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ेगा और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी बढ़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है असर
फिलहाल भारतीय तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार के उतार-चढ़ाव का पूरा असर उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचने दे रही हैं।
हालांकि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने की नौबत आ सकती है। इससे आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।
महंगाई बढ़ने का खतरा
ईंधन की कीमतें बढ़ने का असर केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता।
परिवहन महंगा होने से फल, सब्जियां, खाद्यान्न, दूध, दवाइयां और रोजमर्रा की अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है। इससे खुदरा महंगाई दर बढ़ने की संभावना मजबूत हो जाती है।
एविएशन और उर्वरक उद्योग भी होंगे प्रभावित
महंगे कच्चे तेल का असर विमानन उद्योग पर भी पड़ सकता है।
एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) महंगा होने से हवाई यात्रा की लागत बढ़ सकती है। वहीं प्राकृतिक गैस और ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से उर्वरक उद्योग की लागत भी बढ़ेगी, जिसका असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है।
उद्योगों की उत्पादन लागत में होगी वृद्धि
ऊर्जा लगभग हर उद्योग की मूल आवश्यकता है।
यदि तेल और गैस महंगे होते हैं तो स्टील, सीमेंट, केमिकल, प्लास्टिक, परिवहन, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण क्षेत्र की लागत बढ़ जाएगी। इससे उत्पादों की कीमतें बढ़ सकती हैं और औद्योगिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है।
भारत का बैकअप प्लान
संभावित संकट से निपटने के लिए भारत सरकार पहले से ही कई स्तरों पर तैयारी कर रही है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय रूस, अमेरिका, अफ्रीका और अन्य देशों से भी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया है। इस विविधीकरण से किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम करने में मदद मिली है।
सामरिक तेल भंडार से मिलेगी राहत
भारत ने आपातकालीन परिस्थितियों के लिए विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में सामरिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves) तैयार किए हैं।
इन भूमिगत भंडारों में सुरक्षित रखा गया तेल आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में कुछ समय तक देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कूटनीतिक स्तर पर भी सक्रिय है भारत
भारत लगातार सभी प्रमुख तेल उत्पादक देशों के साथ संपर्क बनाए हुए है।
सरकार का प्रयास है कि किसी भी परिस्थिति में देश की ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो। साथ ही वैश्विक मंचों पर भी भारत शांति और स्थिरता की वकालत कर रहा है ताकि समुद्री व्यापार सामान्य बना रहे।
आम लोगों को क्या रखना चाहिए ध्यान?
यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां लंबे समय तक तनावपूर्ण बनी रहती हैं, तो ईंधन और अन्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी संभव है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और तेल कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। इसलिए घबराने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन ऊर्जा की बचत, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग और अनावश्यक ईंधन खपत से बचना हर नागरिक के लिए उपयोगी कदम हो सकता है।
पश्चिम Asia में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय सुरक्षा का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा बाजार और विश्व अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। भारत जैसे तेल आयात पर निर्भर देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सरकार ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने, आयात स्रोतों में विविधता लाने और सामरिक तेल भंडार का उपयोग करने जैसी रणनीतियों पर काम कर रही है। आने वाले दिनों में यदि तनाव कम होता है तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है, लेकिन यदि संकट गहराता है तो इसका असर ईंधन की कीमतों, महंगाई और देश की आर्थिक गतिविधियों पर व्यापक रूप से देखने को मिल सकता है।


























