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राष्ट्रीय River पर्वत सम्मेलन में गूंजा सनातन विकास मॉडल जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी

On: May 23, 2026 6:22 PM
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जमशेदपुर: में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय River पर्वत सम्मेलन का शनिवार को भव्य समापन हुआ। साकची स्थित मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के ऑडिटोरियम में आयोजित समापन समारोह में पर्यावरण संरक्षण, पर्वत और नदियों के अस्तित्व तथा विकास मॉडल को लेकर गंभीर मंथन हुआ। सम्मेलन के दौरान जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने वर्तमान विकास मॉडल पर सवाल उठाते हुए “सनातन विकास” मॉडल की अवधारणा सामने रखी। वहीं मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने प्राकृतिक संसाधनों को आर्थिक ढांचे के रूप में देखने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई।

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सम्मेलन के अंतिम दिन जमशेदपुर घोषणा पत्र भी जारी किया गया, जिसमें पर्वतीय और नदी पारितंत्रों के संरक्षण के लिए व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करने का संकल्प लिया गया।

सस्टेनेबल नहीं सनातन विकास मॉडल की जरूरत सरयू राय

राष्ट्रीय River पर्वत सम्मेलन के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए विधायक सरयू राय ने कहा कि वर्तमान विकास मॉडल वास्तव में विनाश का मॉडल बन चुका है।

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उन्होंने कहा कि आज पहले विकास किया जा रहा है और बाद में पहाड़ एवं नदियों को बचाने की बात की जाती है, जबकि होना यह चाहिए कि पहले प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा सुनिश्चित हो और उसके बाद विकास की दिशा तय की जाए।

सरयू राय ने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास होना चाहिए जो “चरैवेति-चरैवेति” के सिद्धांत पर आधारित हो और पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहे। उन्होंने इसी अवधारणा को “सनातन विकास” नाम दिया।

उन्होंने कहा कि ऐसा विकास मॉडल अपनाना होगा जिसमें आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्राकृतिक संसाधन सुरक्षित रह सकें।

कानून तो हैं लेकिन सही तरीके से लागू नहीं होते सरयू राय

अपने संबोधन में सरयू राय ने कहा कि देश में पर्यावरण संरक्षण और प्रशासन से जुड़े कई कानून पहले से मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा।

उन्होंने कहा कि कई बार कानूनों को उनकी मूल भावना के विपरीत लागू किया जाता है, जो एक बड़ी विडंबना है।

उन्होंने कहा कि नए कानून की आवश्यकता इसलिए महसूस हो रही है ताकि जनता के हाथ में एक मजबूत कानूनी हथियार आ सके और लोग न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकें।

सरयू राय ने स्पष्ट कहा कि विकास ऐसा होना चाहिए जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

सस्टेनेबल डेवलपमेंट के बजाय सनातन डेवलपमेंट की वकालत

सरयू राय ने कहा कि आज पूरी दुनिया में सस्टेनेबल डेवलपमेंट की चर्चा हो रही है और भारत सरकार ने भी 2030 तक इसका लक्ष्य निर्धारित किया है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके प्रभाव दिखाई नहीं दे रहे।

उन्होंने कहा कि “सनातन डेवलपमेंट” की अवधारणा अधिक प्रभावी हो सकती है। उनके अनुसार सनातन का अर्थ है – “नित्य नूतन, चिर पुरातन” यानी विकास ऐसा हो जो परंपरा और प्रकृति दोनों को साथ लेकर आगे बढ़े।

उन्होंने कहा कि विकास की धारा निरंतर चलती रहनी चाहिए, लेकिन उसमें अचानक ऐसा परिवर्तन नहीं होना चाहिए जिससे प्रकृति को नुकसान पहुंचे।

राजेंद्र सिंह बोले माई कहकर कमाई करेंगे तो न नदी बचेगी, न पहाड़

सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे जलपुरुष और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह ने कहा कि आज प्राकृतिक संसाधनों को केवल आर्थिक ढांचे के रूप में देखा जा रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।

उन्होंने कहा कि यदि नदी और पहाड़ को सिर्फ कमाई का जरिया माना जाएगा तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

राजेंद्र सिंह ने कहा कि भारत सरकार का वर्तमान एजेंडा प्राकृतिक संसाधनों से अधिकतम खनिज और रेयर मैटेरियल निकालने पर केंद्रित है, जबकि पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए जा रहे कानून इसके विपरीत सोच रखते हैं।

उन्होंने लोगों से अपील की कि जमशेदपुर घोषणा पत्र को गांव, पंचायत, मोहल्ले और समाज के बीच लेकर जाएं ताकि व्यापक जनसमर्थन तैयार किया जा सके।

कानून बनाने के लिए जन आंदोलन खड़ा करने की अपील

राजेंद्र सिंह ने कहा कि केवल ड्राफ्ट तैयार कर देने से कानून नहीं बन जाएगा। इसके लिए सामाजिक माहौल और जनसमर्थन तैयार करना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया, मीडिया, शिक्षण संस्थानों और जनसंवाद के माध्यम से लोगों को जोड़ना होगा। सांसदों, विधायकों और पंचायत स्तर तक इस मुद्दे को पहुंचाने की जरूरत है।

उन्होंने बताया कि इस कानून को लेकर देशभर में चर्चा शुरू की जाएगी और विभिन्न राज्यों में भी सम्मेलन आयोजित होंगे।

जमशेदपुर घोषणा पत्र जारी पर्वत संरक्षण कानून बनाने का संकल्प

राष्ट्रीय River पर्वत सम्मेलन के अंतिम दिन “जमशेदपुर घोषणा पत्र” जारी किया गया।

यह घोषणा पत्र तरुण भारत संघ, आईआईटी (आईएसएम) धनबाद, जल बिरादरी, युगांतर भारती, नेचर फाउंडेशन, स्वर्णरेखा क्षेत्र विकास ट्रस्ट और मिशनY के संयुक्त तत्वावधान में तैयार किया गया।

घोषणा पत्र में पर्वतीय और नदी पारितंत्रों के संरक्षण, सुरक्षा और सतत प्रबंधन के प्रति प्रतिबद्धता जताई गई।

घोषणा पत्र के 10 प्रमुख बिंदु

घोषणा पत्र में कुल 10 महत्वपूर्ण बिंदु शामिल किए गए हैं। इनमें प्रमुख रूप से कहा गया कि पर्वतीय पारितंत्र जल सुरक्षा, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

घोषणा पत्र में पर्वतीय जलग्रहण क्षेत्रों और जलस्रोतों की रक्षा करने का संकल्प लिया गया।

इसके साथ ही आदिवासी और स्थानीय समुदायों को पर्वतीय पारितंत्र का प्रमुख संरक्षक मानते हुए उनके पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करने की बात कही गई।

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पर्वत संरक्षण अधिनियम बनाने की दिशा में पहल

घोषणा पत्र में पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक समग्र और अधिकार-सम्मानित कानूनी ढांचा विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया।

इसमें राज्य सरकारों और भारत सरकार से आग्रह किया गया कि प्रस्तावित विधिक ढांचे को “पर्वत संरक्षण अधिनियम” के रूप में संसद और विधानसभाओं में प्रस्तुत किया जाए।

सम्मेलन में यह भी तय किया गया कि अगले एक वर्ष के भीतर कानून का प्रारूप तैयार कर लिया जाएगा।

कानून के ड्राफ्ट को लेकर आए कई महत्वपूर्ण सुझाव

सम्मेलन के दौरान कानून के ड्राफ्ट को लेकर विशेषज्ञों और प्रतिभागियों ने कई सुझाव दिए।

इनमें कानून की भाषा को सरल और आम लोगों के समझने योग्य बनाने, वैज्ञानिक संस्थानों को अधिकार देने, ब्लास्टिंग पर पूर्ण रोक लगाने, वैध और अवैध खनन पर स्पष्ट प्रावधान तैयार करने और रिवर बेसिन प्रोटेक्शन पर विशेष चर्चा शामिल रही।

इसके अलावा पहाड़ की स्पष्ट परिभाषा तय करने और नीति निर्धारकों की भूमिका मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।

प्रो. अंशुमाली और प्रो. पीयूष कांत पांडेय को मिली जिम्मेदारी

राष्ट्रीय River पर्वत सम्मेलन के संरक्षक राजेंद्र सिंह ने कानून का अंतिम ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी प्रो. अंशुमाली और प्रो. पीयूष कांत पांडेय को सौंपी।

दोनों विशेषज्ञ विभिन्न ड्राफ्टों और सम्मेलन में हुई चर्चाओं का अध्ययन कर एक समग्र प्रारूप तैयार करेंगे। यह ड्राफ्ट एक सप्ताह के भीतर तैयार कर राजेंद्र सिंह और विधायक सरयू राय को सौंपा जाएगा।

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सम्मेलन में अतिथियों का सम्मान और पुस्तक विमोचन

सम्मेलन के दौरान विभिन्न अतिथियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं को शॉल, पौधा और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर विधायक सरयू राय की नई पुस्तक “Changing Face of Saranda” का भी विमोचन किया गया। पुस्तक में सारंडा क्षेत्र में आए पर्यावरणीय और सामाजिक परिवर्तनों का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

इसके साथ ही पर्यावरण विषयों पर आधारित 126 पृष्ठों की स्मारिका का भी विमोचन हुआ।

पर्यावरण और संस्कृति के रिश्ते को समझने की जरूरत

सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि भारत की संस्कृति और प्रकृति का संबंध बेहद गहरा रहा है। जब तक विकास प्रकृति और संस्कृति के संतुलन के साथ हुआ, तब तक भारत समृद्ध रहा।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि यदि प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इसी गति से जारी रहा, तो आने वाले समय में पर्यावरणीय संकट और गंभीर हो सकता है।

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