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तिलका माँझी आदिवासी अस्मिता और स्वाधीनता के प्रथम महानायक को नमन

On: February 12, 2026 12:01 PM
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भागलपुर: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई ऐसे वीर नायक हैं जिनका योगदान मुख्यधारा के इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं पा सका। उन्हीं में एक अग्रणी नाम है तिलका माँझी, जिन्हें देश के प्रथम आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों में गिना जाता है। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 18वीं सदी में ही सशस्त्र प्रतिरोध का बिगुल फूंककर आदिवासी अस्मिता और स्वाभिमान की रक्षा का मार्ग प्रशस्त किया।

बताया जाता है कि तिलका माँझी का जन्म लगभग 1750 के आसपास वर्तमान बिहार-झारखंड क्षेत्र के भागलपुर के तिलकपुर गाँव में एक संथाल/पहाड़िया आदिवासी परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम जाबरा पहाड़िया माना जाता है। अंग्रेजों के आगमन के बाद लगाए गए कर, जमींदारी और जंगलों पर नियंत्रण जैसी नीतियों ने आदिवासी समाज के जीवन पर गहरा असर डाला। जमीन छिनने लगी और शोषण बढ़ा, जिसके खिलाफ तिलका माँझी ने संघर्ष का रास्ता चुना।

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उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित कर अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। जंगलों और पहाड़ियों को आधार बनाकर उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर अंग्रेजों को चुनौती दी। उनका संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि भूमि, जल, जंगल और सम्मान की रक्षा का आंदोलन भी था।

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि 1784 में तिलका माँझी ने भागलपुर के अंग्रेज कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड पर हमला कर उसे मार गिराया। यह घटना अंग्रेजी शासन के लिए बड़ा झटका साबित हुई। इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया। अंततः 1785 के आसपास उन्हें गिरफ्तार कर अमानवीय यातनाएं दी गईं और भागलपुर में एक बरगद के पेड़ पर फांसी दे दी गई।

तिलका माँझी की शहादत ने आदिवासी समाज में प्रतिरोध की नई चेतना जगाई। उनके बाद संथाल विद्रोह, बिरसा मुंडा आंदोलन जैसे कई संघर्ष सामने आए। आज भी उन्हें आदिवासी स्वाभिमान, साहस और स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। भागलपुर विश्वविद्यालय का नाम तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय रखा जाना उनके योगदान की मान्यता का प्रतीक है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तिलका माँझी का संघर्ष बताता है कि भारत की स्वतंत्रता की जड़ें बहुत पहले आदिवासी क्षेत्रों में पड़ चुकी थीं। उनका जीवन आज भी यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, संसाधनों पर अधिकार और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा का संघर्ष है।

इतिहासकारों और समाज के विभिन्न वर्गों ने मांग की है कि तिलका माँझी जैसे नायकों को पाठ्यपुस्तकों, शोध और सार्वजनिक विमर्श में उचित स्थान दिया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उनके साहस और बलिदान से प्रेरणा ले सकें।

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