
जमशेदपुर | समाज का दर्पण कहे जाने वाले पत्रकार, जिनके भरोसे देश और राज्य की जनता सच तक पहुँचती है, वे खुद सत्य लिखने की सजा झेल रहे हैं। ताज़ा घटना ने न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ आज कितना असुरक्षित है।

- पुलिस की गुंडागर्दी, पत्रकार की थाने में पिटाई
- देश का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार अब सुरक्षित नहीं हैं।
- बिना अपराध किए ही थाने में सजा दे दी गई।
- लाठियों से पीटा गया, अपराधियों की तरह हवालात में बंद कर दिया गया।
थाने के भीतर पिटे पत्रकार
गुरुवार को स्थानीय पत्रकार आकाश कुमार और अभिषेक सिन्हा किसी खबर को कवर करने के सिलसिले में उलीडीह थाना पहुँचे थे। लेकिन खबर लिखने वाले ये हाथ अचानक पुलिस की लाठियों के निशाने पर आ गए।
आरोप है कि थाने में मौजूद एएसआई मुकेश दुबे ने न केवल दोनों पत्रकारों के साथ गाली-गलौज की, बल्कि उन्हें लाठियों से बेरहमी से पीटकर घायल अवस्था में हाजत में बंद कर दिया। बिना अपराध के अपराधी बना दिया गया।
पत्रकारों का आक्रोश, थाने में उमड़ा जनसैलाब
घटना की खबर फैलते ही राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन और प्रेस क्लब ऑफ जमशेदपुर के वरीय एवं स्थानीय पत्रकार बड़ी संख्या में थाना पहुँचे। वहाँ उन्होंने एसआई की इस गुंडागर्दी के खिलाफ जमकर विरोध किया। पत्रकारों का कहना था—
“अगर कलम की आवाज़ को दबाने की कोशिश होगी तो यह लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला होगा।”
थाना प्रभारी ने लगाई फटकार
कुछ देर बाद जब थाना प्रभारी उलीडीह थाना पहुंचे और मामले को गंभीरता से लेते हुए एएसआई मुकेश दुबे को फटकार लगाई और बिना किसी सूचना के किसी पर झूठा आरोप लगाने और गुंडागर्दी करने पर फटकार लगाई।
एसएसपी ने दिया कार्रवाई का आश्वासन
पत्रकारों का गुस्सा देखते हुए मामले की सूचना जिला पुलिस कप्तान पियूष पांडे और नगर पुलिस अधीक्षक कुमार शिवाशीष तक पहुँची। उच्च अधिकारियों ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए पीड़ित पत्रकारों को न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। दोनों पीड़ित पत्रकारों ने उलीडीह थाना के माध्यम से वरीय पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत भी सौंपी।
लोकतंत्र पर चोट, सुरक्षा पर सवाल
यह घटना केवल दो पत्रकारों की पिटाई नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार है। कलम से सच लिखने वाले हाथों को लाठियों से तोड़ा गया। पुलिस का यह रवैया साफ करता है कि सत्ता की आँखों में आँख डालकर सवाल पूछना आज कितना खतरनाक हो गया है।
यह घटना एक गहरी चेतावनी है : अगर चौथे स्तंभ की आवाज़ को दबाया जाएगा तो लोकतंत्र का संतुलन टूट जाएगा। पत्रकारों की सुरक्षा सिर्फ उनका अधिकार नहीं, बल्कि समाज की सुरक्षा भी है। क्योंकि जब कलम खामोश हो जाएगी, तो सच अंधेरे में दफन हो जाएगा।








































