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करुणामय मंडल की कविता में सरकारी योजनाओं पर तीखा प्रहार — ‘सेवा के अधिकार सप्ताह’ को बताया जनता को भ्रमित करने की कवायद

On: November 26, 2025 11:00 PM
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जमशेदपुर / पोटका : पूर्व जिला पार्षद करुणामय मंडल ने सरकार की योजनाओं और विशेष रूप से “सेवा के अधिकार सप्ताह” कार्यक्रम पर एक तीखी और भावपूर्ण कविता के माध्यम से आम जनता की पीड़ा, उपेक्षा और असंतोष को आवाज़ दी है। कविता 25 नवंबर को सुबह 4 बजकर 25 मिनट पर लिखी गई, जिसमें उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था की कमियों और जनता के समय, श्रम व अधिकारों की उपेक्षा पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

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“कितनी शातिर सरकार है
उसकी पुक्ता ये है गवाह।
बुड़बक बनाए जनता को
“सेवा के अधिकार सप्ताह”।।

चार पांच पंचायतों को
यूं दूर दूर से बुलाना।
धान कटनी के समय में
झुटमुट का झुलाना।।

एक दिन में तीर मारेगी
क्या ऐसी सरकार ?
समस्याएं समाधान होगी
ना रहेगी सरोकार।?

सेवा की ये अद्भुत फॉर्मूला
नई नई अविष्कार है।
“अंधेरी नगरी चौपट राजा”
सरकार नमस्कार है।।

बूढ़े बुजुर्ग दूर दूर से आए
काम छोड़ कामगार।
ढकोसला में शामिल होने
भीड़ का बढ़े आकार।।

कोई तो पूछे इन ज्ञानियों से
क्या है सेवा का अधिकार ?
परेशान करे भले जनता को
तकलीफ दे सरकार।?

जनता की सेवा गर करनी है
दूर करनी गर व्यथा।
घर घर उनकी पंहुचे सेवा
करो ऐसी व्यवस्था।।

इतनी पंचायतें साथ बुलाकर
क्या कर दोगे काम ?
बीते बार की वो पोटली तेरी
अब भी है बदनाम।।

पिछली बार कितनी समस्याएं
हुई है समाधान ?
पर्ची निकल कर नाकामी का
दें दूं क्या प्रमाण।?

तकलीफ में है लाचार जनता
भूल गई है प्रतिवाद।
कौन सुनें उसकी कहानी
किसे करे फरियाद।?

मौन है पर मिटी नहीं है
आक्रोश की वो आगन।
चिंगारी जब धधक उठेगी
चमकेगी धरा गगन।।

हद करो ये मनमानी की
कवि का कलम जिंदा है।
किसी की बेड़ी बंधन में
जो कभी ना बंधा है।।

मूक बधिर प्रतिवादों को
जरूर उर्जीत करेगी।
थके हारे माहौल में भी
जल्द क्रांति लायेगी।।

कविता का केंद्रीय भाव

कवि का मानना है कि सरकार “सेवा के अधिकार सप्ताह” के नाम पर जनता को वास्तव में राहत देने के बजाय औपचारिकता और दिखावे में अधिक व्यस्त है। कविता में पूछा गया है कि — जब किसान धान कटनी के मौसम में अपनी रोज़ी और जीवन के संघर्ष में जुटे हों, तब दूर-दूर की पंचायतों से लोगों को बुलाकर केवल एक दिन में सभी समस्याओं के समाधान का दावा करना कितना तर्कसंगत है?

जनता की तकलीफ़ को मुख्य मुद्दा बनाकर आवाज़

करुणामय मंडल ने कहा है कि सरकार यदि सच में जनता की सेवा करना चाहती है तो भीड़ भरी औपचारिक सभाएं करने के बजाय सेवा को घर-घर पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि बुजुर्ग, मजदूर और किसान बिना काम बाधित किए अपना काम सरकारी तंत्र के ज़रिए आसानी से करवा सकें।

पूर्व कार्यक्रमों की विफलता पर सवाल

कविता में पिछले वर्षों के ऐसे ही कार्यक्रमों में समस्याओं के समाधान न होने और अधिकतर शिकायतों के अधूरे रहने का भी उल्लेख है।
कवि कहते हैं कि — अगर चाहें तो वे पिछली बार की “नाकामी” के प्रमाण भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

जनता की पीड़ा और मौन आक्रोश

पूरी रचना में जनता की लाचारी, थकान, संघर्ष और मूक विरोध की भावना बार-बार सामने आती है। कवि कहते हैं कि
भले ही जनता आज मजबूरी में चुप है, लेकिन आक्रोश की आग बुझी नहीं है और समय आने पर यही चिंगारी बड़ा रूप ले सकती है।

व्यवस्था सुधार की अपील

कवि अंत में स्पष्ट संदेश देते हैं कि—

“जनता की सेवा के नाम पर औपचारिकता नहीं,
बल्कि कार्यशील व्यवस्था बननी चाहिए।”

उनके अनुसार कवि की कलम हमेशा अन्याय के विरुद्ध बुलंद रहेगी और जनता की आवाज़ को उठाती रहेगी।

करुणामय मंडल की कविता में सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता, जनता के वास्तविक समाधान, कार्यशैली में सुधार, और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर तीखी लेकिन सकारात्मक आलोचना दिखाई देती है।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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