
जनप्रतिनिधियों से कहा— अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बनें, लोकतांत्रिक संस्थाओं की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास
कोलकाता | विशेष संवाददाता

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वस्थ संवाद, तथ्यपरक बहस और जनसेवा की संस्कृति को प्रभावी नेतृत्व की आधारशिला बताते हुए कहा कि नारेबाज़ी, व्यवधान और सदन में गतिरोध पैदा करने से कोई नेता नहीं बनता। नेतृत्व की वास्तविक पहचान तथ्यों, तर्कों और रचनात्मक विचारों से होती है। उन्होंने कहा कि विधानमंडल का उद्देश्य केवल राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान और राज्य के विकास का मार्ग प्रशस्त करना है।
वे शनिवार को कोलकाता में आयोजित पश्चिम बंगाल विधानसभा के 18वें कार्यकाल के सदस्यों के लिए आयोजित दो दिवसीय प्रबोधन कार्यक्रम के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन लोकसभा सचिवालय के पार्लियामेंटरी रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसीज़ (PRIDE) ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के सहयोग से किया। समापन समारोह में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल आर. एन. रवि ने भी अपने विचार रखे।
लोकतंत्र की आत्मा है सार्थक संवाद
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह निरंतर संवाद, विचार-विमर्श और जवाबदेही की व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि संसद और विधानसभाएं ऐसी संस्थाएं हैं, जहां विभिन्न विचारधाराओं के बीच स्वस्थ चर्चा के माध्यम से जनहित के निर्णय लिए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखनी है तो सदन में संवाद का स्तर ऊंचा होना चाहिए। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे जनता के मुद्दों पर गंभीर चर्चा करें और ऐसे समाधान प्रस्तुत करें जो समाज के व्यापक हित में हों।
जनप्रतिनिधियों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता का विश्वास
ओम बिरला ने कहा कि जनता अपने प्रतिनिधियों को केवल कानून बनाने के लिए नहीं चुनती, बल्कि उनसे यह अपेक्षा भी करती है कि वे उनकी समस्याओं, आकांक्षाओं और सपनों की आवाज़ बनें। उन्होंने कहा कि किसी भी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है और उसी विश्वास को बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उन्होंने विधायकों से कहा कि वे अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों तक सीमित न रहें, बल्कि पूरे राज्य के विकास को ध्यान में रखकर नीतियों और योजनाओं के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं। उनका मानना था कि जब जनप्रतिनिधि व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हैं तभी राज्य और देश का संतुलित विकास संभव हो पाता है।
अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे विकास का लाभ
लोकसभा अध्यक्ष ने अपने संबोधन में बार-बार समाज के अंतिम व्यक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र की सफलता तभी मानी जाएगी जब शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि प्रत्येक विधायक का दायित्व है कि वह गरीब, वंचित और जरूरतमंद वर्गों की समस्याओं को सदन में मजबूती से उठाए तथा उनके समाधान के लिए सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से अपनी बात रखे।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का वास्तविक उद्देश्य समाज में समान अवसर उपलब्ध कराना और प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना है।
स्वामी विवेकानंद के विचार आज भी प्रासंगिक
अपने संबोधन के दौरान लोकसभा अध्यक्ष ने स्वामी विवेकानंद को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन और उनके विचार आज भी समाज और युवाओं को प्रेरणा देते हैं। उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने चरित्र निर्माण, सेवा और राष्ट्रभक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया था और आज के जनप्रतिनिधियों को भी उन्हीं मूल्यों को अपनाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत ने देश को अनेक महान विभूतियां दी हैं और आज भी यह राज्य पूरे देश को नई दिशा देने की क्षमता रखता है।
सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती
ओम बिरला ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में निरंतर सीखना अत्यंत आवश्यक है। तेजी से बदलती तकनीक, डिजिटल व्यवस्था और आधुनिक प्रशासनिक प्रणाली को देखते हुए जनप्रतिनिधियों को स्वयं को लगातार अपडेट रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए केवल राजनीतिक अनुभव पर्याप्त नहीं है, बल्कि कानून, वित्त, प्रशासन, डिजिटल तकनीक और संसदीय प्रक्रियाओं की भी गहरी समझ आवश्यक है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम जनप्रतिनिधियों की कार्यक्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जनता की समस्याओं को सदन तक पहुंचाएं
लोकसभा अध्यक्ष ने विधायकों से कहा कि विधानसभा केवल राजनीतिक भाषण देने का मंच नहीं है, बल्कि जनता की आवाज़ उठाने का सबसे प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कहा कि सदन में उठाई गई प्रत्येक समस्या लाखों नागरिकों की उम्मीदों का प्रतिनिधित्व करती है। इसलिए प्रत्येक विधायक को अपने क्षेत्र की समस्याओं का गंभीर अध्ययन कर तथ्यों के आधार पर उन्हें सदन में प्रस्तुत करना चाहिए।
उन्होंने सरकारों से भी अपेक्षा की कि वे विपक्ष सहित सभी जनप्रतिनिधियों द्वारा दिए गए रचनात्मक सुझावों पर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं। उनके अनुसार लोकतंत्र में बेहतर निर्णय तभी संभव हैं जब सभी पक्षों के विचारों को महत्व दिया जाए।
सादगी, पारदर्शिता और ईमानदारी ही असली पहचान
अपने संबोधन में ओम बिरला ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में सम्मान पद या अधिकार से नहीं मिलता, बल्कि ईमानदारी, सादगी, पारदर्शिता और जनसेवा से अर्जित होता है।
उन्होंने कहा कि जनता ऐसे नेताओं को लंबे समय तक याद रखती है जो सहज उपलब्ध रहते हैं, नैतिक मूल्यों का पालन करते हैं और अपने कार्यों के प्रति जवाबदेह रहते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता भी इसी पर निर्भर करती है कि उनके प्रतिनिधि कितनी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्व निभाते हैं।
जनता की भागीदारी से बने बेहतर कानून
लोकसभा अध्यक्ष ने सुझाव दिया कि विधायकों को कानून बनाने की प्रक्रिया में आम नागरिकों, विशेषज्ञों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से भी सुझाव लेने चाहिए। इससे कानून अधिक व्यावहारिक, जनोन्मुखी और प्रभावी बनेंगे। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की सफलता जनता की भागीदारी पर आधारित होती है और नीति निर्माण में समाज की सहभागिता लोकतांत्रिक मूल्यों को और मजबूत बनाती है।
विकसित भारत के निर्माण में राज्यों की अहम भूमिका
विकसित भारत@2047 का उल्लेख करते हुए ओम बिरला ने कहा कि भारत के विकास का मार्ग राज्यों के विकास से होकर गुजरता है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पश्चिम बंगाल एक बार फिर देश के विकास में अग्रणी भूमिका निभाएगा।
उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि पश्चिम बंगाल ने शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में पूरे देश का नेतृत्व किया है। आज आवश्यकता है कि राज्य उसी ऊर्जा और प्रतिबद्धता के साथ विकास की नई कहानी लिखे।
संसदीय परंपराओं को मजबूत बनाने पर रहा विशेष जोर
दो दिवसीय प्रबोधन कार्यक्रम के दौरान विधायी कार्यप्रणाली, संसदीय परंपराएं, कार्यपालिका की जवाबदेही, समिति प्रणाली, विधायी प्रक्रिया, वित्तीय एवं बजटीय प्रबंधन, संसदीय विशेषाधिकार, आचार-नीति तथा डिजिटल विधायी पहलों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत सत्र आयोजित किए गए। इन सत्रों में देश के विभिन्न हिस्सों से आए संसदीय विशेषज्ञों, सांसदों और पीठासीन अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा किए।
समापन समारोह में असीम कुमार घोष, पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष रथीन्द्र बोस, राज्य सरकार के मंत्री, सांसद, विधायक तथा अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का यह संदेश केवल पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के जनप्रतिनिधियों के लिए एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मार्गदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की मजबूती सदन में शोर-शराबे से नहीं, बल्कि सार्थक बहस, जिम्मेदार नेतृत्व, जनसेवा, पारदर्शिता और जनता के विश्वास से सुनिश्चित होती है। उनका यह आह्वान लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने और जनप्रतिनिधियों को अधिक उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।














