भारत की स्वतंत्रता का इतिहास असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों के त्याग, तपस्या, संघर्ष और Martyrdom से निर्मित हुआ है। आजादी की लड़ाई में देश के सैनिकों, किसानों, युवाओं, महिलाओं और समाज के हर वर्ग ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं महान स्वतंत्रता सेनानियों में एक नाम मेजर दुर्गामल्ल का है, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के सामने झुकने के बजाय मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
25 अगस्त 1944 को दिल्ली के केंद्रीय कारागार में दिया गया उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सैन्य इतिहास में साहस, राष्ट्रनिष्ठा, अनुशासन और त्याग का अनुपम उदाहरण है। आज उनके बलिदान-दिवस पर उन्हें याद करना केवल एक वीर सैनिक को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस स्वतंत्रता की कीमत को समझना भी है, जिसे पाने के लिए हजारों लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया।
देहरादून की धरती पर हुआ जन्म
मेजर दुर्गामल्ल का जन्म 1 जुलाई 1913 को देहरादून के डोइवाला में हुआ था। उनके पिता गंगाराम गोरखा राइफल्स में नायब सूबेदार थे और उनकी माता का नाम पार्वती देवी मल्ल था।

गोरखा समाज में देशसेवा, वीरता और सैन्य परंपरा की गहरी जड़ें रही हैं। बचपन से ही दुर्गामल्ल के व्यक्तित्व में साहस, अनुशासन और मातृभूमि के प्रति समर्पण के संस्कार विकसित हुए। यही संस्कार आगे चलकर उनके जीवन की सबसे बड़ी शक्ति बने।
पढ़ाई के साथ देशभक्ति की भावना
दुर्गामल्ल की शिक्षा गोरखा मिडिल स्कूल में हुई। वे पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी रुचि रखते थे। कविता और नाटक में उनकी विशेष दिलचस्पी थी तथा वे स्वयं भी कविताएं लिखते थे।
किशोरावस्था में ही उनके मन में देश की गुलामी को लेकर बेचैनी पैदा होने लगी थी। कक्षा दस में पढ़ाई के दौरान वे स्वतंत्रता सेनानी खड़क बहादुर सिंह बिष्ट और रामसिंह ठाकुर के संपर्क में आए। उनके विचारों से प्रभावित होकर दुर्गामल्ल अपने साथियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने लगे।
वे जुलूसों में भाग लेते और गोरखा पलटन की दीवारों पर छिपकर देशभक्ति से जुड़े पोस्टर लगाया करते थे। ब्रिटिश पुलिस की नजर जब उनकी गतिविधियों पर पड़ी तो उन्हें पकड़ने की कोशिश शुरू हुई।
सेना में भर्ती होकर देशसेवा का संकल्प
बेटे की सुरक्षा को देखते हुए उनके पिता उन्हें अपने भाई केदार मल्ल के पास ग्राम माग्सू, जिला कांगड़ा भेज आए। लेकिन दुर्गामल्ल के मन में सेना में जाकर देशसेवा करने की इच्छा और भी मजबूत होती गई।
वर्ष 1931 में वे धर्मशाला छावनी पहुंचे और गोरखा राइफल्स में भर्ती हो गए। सेना में उनका जीवन अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और साहस से भरा रहा। सैन्य प्रशिक्षण ने उनके व्यक्तित्व को और मजबूत बनाया तथा देश के प्रति उनकी जिम्मेदारी की भावना को गहरा किया।
विवाह के नौ दिन बाद लौटे ड्यूटी पर
वर्ष 1941 में दुर्गामल्ल का विवाह शारदा देवी से हुआ। विवाह के बाद वे डोइवाला स्थित अपने घर आए ही थे कि सैन्य मुख्यालय से तत्काल ड्यूटी पर लौटने का आदेश आ गया।
विवाह को केवल नौ दिन हुए थे। नवविवाहिता पत्नी और परिवार को पीछे छोड़कर दुर्गामल्ल ने तत्काल सैन्य ड्यूटी पर लौटने का निर्णय लिया। उनके लिए व्यक्तिगत सुख और पारिवारिक भावनाओं से ऊपर राष्ट्र और सैन्य कर्तव्य था।
यह प्रसंग उनके जीवन में कर्तव्यनिष्ठा और त्याग की भावना को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
द्वितीय विश्व युद्ध और युद्धबंदी बने दुर्गामल्ल
इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध अपने निर्णायक दौर में पहुंच रहा था। दुर्गामल्ल को सिंगापुर और फिर मलाया भेजा गया। जापानी सेना के साथ संघर्ष के दौरान वे ब्रिटिश भारतीय सेना के कई अन्य सैनिकों के साथ युद्धबंदी बना लिए गए।
इसी समय विदेश की धरती पर भारत की स्वतंत्रता के लिए आजाद हिन्द फौज का संगठन मजबूत हो रहा था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजी शासन को भारत से बाहर करने के लिए सशस्त्र संघर्ष का रास्ता अपनाया।
आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए
दुर्गामल्ल आजाद हिन्द फौज के उद्देश्य और राष्ट्र की स्वतंत्रता के संकल्प से प्रभावित हुए। उन्होंने आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर भारत की आजादी के लिए संघर्ष करने का निर्णय लिया।
उनकी सैन्य क्षमता, अनुभव और साहस को देखते हुए उन्हें मेजर का पद दिया गया तथा गुप्तचर विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। वे ब्रिटिश सेना की गतिविधियों से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएं आजाद हिन्द फौज के रंगून मुख्यालय तक पहुंचाते थे।
यह कार्य बेहद जोखिमपूर्ण था। यदि वे ब्रिटिश सेना के हाथों पकड़े जाते, तो उन्हें कठोरतम दंड का सामना करना पड़ सकता था। इसके बावजूद उन्होंने अपने कर्तव्य से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
ब्रिटिश सेना ने किया गिरफ्तार
आजाद हिन्द फौज के अभियान के दौरान परिस्थितियां तेजी से बदलने लगीं। 27 मार्च 1944 को कोहिमा क्षेत्र के माशीपुर अखरूल में ब्रिटिश सेना ने दुर्गामल्ल को गिरफ्तार कर लिया।
इसके बाद उन्हें युद्धबंदी बनाकर दिल्ली लाया गया। यहां उनके खिलाफ सैन्य न्यायालय में कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू हुई। ब्रिटिश शासन की नजर में उनका अपराध गंभीर था, क्योंकि वे ब्रिटिश भारतीय सेना के सैनिक रहते हुए आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए थे और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे।
उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 121 के तहत मुकदमा चलाया गया।
माफी मांगने से किया इनकार
अंग्रेजों ने दुर्गामल्ल को अपना निर्णय बदलने और क्षमा मांगने का अवसर देने की कोशिश की। उन्हें अपने विचारों से पीछे हटने के लिए दबाव भी दिया गया, लेकिन वे अपने निर्णय पर अडिग रहे।
उन्होंने राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा और अपने सिद्धांतों से समझौता करने से इनकार कर दिया। अंततः सैन्य न्यायालय ने उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई।
उनके लिए जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मातृभूमि की स्वतंत्रता थी। उन्होंने अपने अंतिम समय तक अपने निर्णय और राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा को बनाए रखा।
अंतिम मुलाकात में पत्नी को दिया साहस
जब दुर्गामल्ल को मृत्युदंड दिए जाने की खबर परिवार तक पहुंची तो स्वाभाविक रूप से शोक की लहर दौड़ गई। उनकी पत्नी शारदा देवी और परिजनों को अंतिम मुलाकात के लिए दिल्ली लाया गया।

पति को फांसी की सजा मिलने की पीड़ा से शारदा देवी भावुक हो उठीं। ऐसे कठिन समय में भी दुर्गामल्ल ने स्वयं टूटने के बजाय अपनी पत्नी को सांत्वना दी और साहस बनाए रखने के लिए कहा।
अंग्रेजों को उम्मीद थी कि पत्नी के भावनात्मक आग्रह से दुर्गामल्ल क्षमा मांगने के लिए तैयार हो जाएंगे, लेकिन उन्होंने अपना निर्णय नहीं बदला।
गीता के साथ अंतिम समय
मेजर दुर्गामल्ल मृत्यु से भयभीत नहीं थे। उनके पास श्रीमद्भगवद्गीता थी और वे अपने अंतिम समय के लिए मानसिक रूप से तैयार थे।
उनके लिए मृत्यु अंत नहीं थी, बल्कि राष्ट्र के प्रति किए गए संकल्प की अंतिम परिणति थी। उन्होंने अपने जीवन और बलिदान से यह संदेश दिया कि सच्ची राष्ट्रभक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने का नाम है।
25 अगस्त 1944 को दिया सर्वोच्च बलिदान
25 अगस्त 1944 को दिल्ली के केंद्रीय कारागार में मेजर दुर्गामल्ल को फांसी दे दी गई। इस तरह आजाद हिन्द फौज के एक वीर गोरखा सेनानी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस महान गाथा का हिस्सा बन गया, जिसमें देश के अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों के वीरों ने अपना योगदान दिया।
शारदा देवी का जीवन भी त्याग की मिसाल
मेजर दुर्गामल्ल की पत्नी शारदा देवी का जीवन भी त्याग, धैर्य और संकल्प की प्रेरक कहानी है। विवाह के केवल नौ दिन बाद पति से बिछड़ने के बाद उन्होंने पुनर्विवाह नहीं किया।
उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी, स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और आगे चलकर जीवनभर बच्चों को शिक्षित करने का कार्य किया। उनका जीवन भी इस बात का उदाहरण है कि किसी वीर के बलिदान के पीछे उसके परिवार का त्याग और संघर्ष भी जुड़ा होता है।
उनकी स्मृति को जीवित रखने के प्रयास
मेजर दुर्गामल्ल की स्मृति को जीवित रखने के लिए डोइवाला में उनके नाम पर डिग्री कॉलेज स्थापित किया गया। भारत सरकार ने उनके सम्मान में पांच रुपये का डाक टिकट भी जारी किया।
हालांकि किसी वीर का सबसे बड़ा स्मारक केवल कोई इमारत या डाक टिकट नहीं होता। उसका वास्तविक स्मारक वह राष्ट्रीय चेतना होती है, जो आने वाली पीढ़ियों को उसके जीवन और बलिदान से प्रेरणा देती है।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
मेजर दुर्गामल्ल का जीवन आज की पीढ़ी के लिए साहस, अनुशासन, राष्ट्रनिष्ठा और त्याग का संदेश देता है। उन्होंने यह साबित किया कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, अपने सिद्धांतों और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य से समझौता नहीं करना चाहिए।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तब हमें यह याद रखना चाहिए कि यह स्वतंत्रता असंख्य लोगों के त्याग का परिणाम है। स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उन अनगिनत बलिदानों की परिणति है जिनमें लोगों ने अपना परिवार, सुख, भविष्य और जीवन तक राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया।
राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का संदेश
मेजर दुर्गामल्ल का जीवन एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने रखता है—एक सैनिक किसके लिए लड़ता है? केवल किसी विदेशी सत्ता के आदेश के लिए या अपनी मातृभूमि और अपने लोगों की स्वतंत्रता के लिए?
दुर्गामल्ल ने अपने जीवन से इसका उत्तर दिया। उन्होंने अपने विवेक और राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि रखा और उसके लिए मृत्यु को भी स्वीकार कर लिया।
बलिदान-दिवस पर शत-शत नमन
25 अगस्त को मेजर दुर्गामल्ल के बलिदान-दिवस पर उन्हें याद करना प्रत्येक भारतीय के लिए गौरव और प्रेरणा का अवसर है। उनका जीवन हमें बताता है कि राष्ट्र की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।
आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी ऐसे अमर सेनानियों के जीवन से परिचित हो और उनके आदर्शों को केवल इतिहास की किताबों तक सीमित न रखे। साहस, अनुशासन, ईमानदारी, राष्ट्रनिष्ठा और त्याग जैसे मूल्यों को अपने जीवन में उतारना ही ऐसे वीरों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अमर है मेजर दुर्गामल्ल की गाथा
मेजर दुर्गामल्ल का शरीर भले ही 25 अगस्त 1944 को फांसी के फंदे पर शांत हो गया, लेकिन उनका संकल्प और उनकी राष्ट्रभक्ति आज भी जीवित है। उनकी अमर गाथा उस मशाल की तरह है, जो आने वाली पीढ़ियों को देशसेवा और मातृभूमि के प्रति समर्पण का मार्ग दिखाती रहेगी।
उनका बलिदान हमें हमेशा याद दिलाता रहेगा कि स्वतंत्रता की रक्षा केवल सीमाओं पर खड़े सैनिकों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

आज उनके Martyrdom -दिवस पर हम इस महान गोरखा सेनानी को नमन करते हुए उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लें।


























