नई दिल्ली: Ethanol भारत में चीनी की कीमतों में पिछले कुछ समय से लगातार तेजी देखने को मिल रही है। खुदरा बाजार में चीनी के दाम बढ़कर ऐसे स्तर पर पहुंच गए हैं, जिसने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। त्योहारों का मौसम नजदीक होने के कारण आने वाले दिनों में चीनी की मांग और बढ़ने की संभावना है।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अगस्त 2026 में भारत में चीनी की कीमतों में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अगस्त 2026 को खुदरा बाजार में चीनी की औसत कीमत 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम रही। एक महीने पहले यही कीमत करीब 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी। वहीं 20 अगस्त 2025 को चीनी की कीमत करीब 46.30 रुपये प्रति किलोग्राम थी।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर चीनी के दाम इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? क्या इसके पीछे इथेनॉल उत्पादन भी एक कारण है या फिर चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे कई अन्य वजहें जिम्मेदार हैं?
चीनी की कीमत में इतनी तेजी क्यों आई?
भारत दुनिया में चीनी उत्पादन के मामले में ब्राजील के बाद दूसरे स्थान पर है। देश में बड़ी संख्या में चीनी मिलें गन्ने से चीनी का उत्पादन करती हैं। हालांकि, मौजूदा समय में चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे केवल एक कारण नहीं है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले चीनी वर्ष में उत्पादन अनुमान से कम रहा। इसके अलावा शुरुआती स्टॉक भी अपेक्षाकृत कम था। मौसम की स्थिति, गन्ने की उत्पादकता, चीनी की रिकवरी और बढ़ती मांग ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया है।
त्योहारों का मौसम नजदीक आने के कारण मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ने की संभावना है। ऐसे में मांग बढ़ने के साथ कीमतों पर भी दबाव देखने को मिल रहा है।
क्या Ethanol उत्पादन भी एक वजह है?
भारत में गन्ने से केवल चीनी ही नहीं बनाई जाती, बल्कि गन्ने के रस और उससे जुड़े उत्पादों का इस्तेमाल इथेनॉल उत्पादन में भी किया जाता है। सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने को बढ़ावा दिया है, जिससे गन्ना आधारित इथेनॉल उत्पादन को भी महत्व मिला है।
जब गन्ने के रस या उससे जुड़े कच्चे माल का एक हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होता है, तो सैद्धांतिक रूप से उतनी मात्रा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध नहीं रहती। इसलिए इथेनॉल और चीनी के बीच एक संतुलन महत्वपूर्ण हो जाता है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर मौजूदा कीमत वृद्धि को सिर्फ इथेनॉल उत्पादन की वजह से जोड़ना सही नहीं होगा। चीनी की कीमत बढ़ने में कम उत्पादन, कम शुरुआती स्टॉक, मौसम, बीमारी और बढ़ती मांग जैसे कई कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
चीनी उत्पादन अनुमान से रहा कम
नेशनल फेडरेशन ऑफ को-ऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड के उपाध्यक्ष केतन पटेल के अनुसार, 2025-26 चीनी वर्ष में भारत में चीनी उत्पादन करीब 3.2 करोड़ टन रहने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन वास्तविक उत्पादन करीब 3 करोड़ टन ही रहने का अनुमान है।
करीब 20 लाख टन का यह अंतर बाजार के लिए महत्वपूर्ण है। जब उत्पादन अनुमान से कम होता है और दूसरी तरफ घरेलू मांग बनी रहती है, तो बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर दबाव बढ़ सकता है।
यही स्थिति मौजूदा समय में चीनी की कीमतों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल मानी जा रही है।
ज्यादा बारिश और गन्ने की फसल पर असर
केतन पटेल के अनुसार, पिछले वर्ष कुछ क्षेत्रों में ज्यादा बारिश ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में गन्ने की एक प्रमुख अधिक उत्पादन देने वाली किस्म CO-0238 में गेरुआ रोग फैलने की बात भी सामने आई।
इन परिस्थितियों का असर गन्ने के उत्पादन और चीनी की रिकवरी पर पड़ा। चीनी रिकवरी रेट का मतलब है कि एक निश्चित मात्रा में गन्ने से कितनी चीनी प्राप्त होती है।
बताया गया कि रिकवरी रेट 12 किलोग्राम से नीचे आ गया। इसका सीधा असर चीनी के कुल उत्पादन पर पड़ा।
शुरुआती स्टॉक कम होने से बढ़ा दबाव
भारत में चीनी की घरेलू खपत आमतौर पर करीब 2.6 करोड़ से 2.8 करोड़ टन के बीच रहती है। सामान्य परिस्थितियों में चीनी वर्ष के अंत में करीब 60 से 70 लाख टन का एंडिंग स्टॉक यानी बचा हुआ भंडार मौजूद रहता है।
लेकिन 2024-25 के अंत में एंडिंग स्टॉक करीब 50 से 50.5 लाख टन बताया गया। इसका मतलब है कि 2025-26 चीनी वर्ष की शुरुआत अपेक्षाकृत कम शुरुआती स्टॉक के साथ हुई।
इसके बाद जब उत्पादन भी अनुमान से कम रहा, तो बाजार में उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी। यही कारण है कि कीमतों पर दबाव बढ़ता गया।
क्या देश में चीनी की कमी है?
चीनी की कीमत बढ़ने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में वास्तव में चीनी की कमी हो गई है?
केंद्र सरकार का कहना है कि देश में घरेलू खपत के लिए चीनी का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। सरकार ने जुलाई में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा था कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है।
सरकार के अनुसार, बाजार में कीमतों में हुई तेजी मौजूदा मांग और आपूर्ति की वास्तविक स्थिति के अनुरूप नहीं है।

जमाखोरी और सट्टेबाजी को लेकर सरकार की चिंता
सरकार ने चीनी की कीमतों में तेजी के लिए कुछ व्यापारियों, डीलरों और बिचौलियों की जमाखोरी और सट्टेबाजी को भी एक संभावित कारण बताया है।
सरकार का कहना है कि कुछ मामलों में चीनी की वास्तविक आवाजाही किए बिना कागजों पर लेनदेन किए जाने से बाजार में कृत्रिम कमी की तस्वीर बन सकती है। इससे कीमतों में अनावश्यक अस्थिरता पैदा होती है।
सरकार ने कहा है कि वह घरेलू उपभोक्ताओं की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बाजार की स्थिति पर नजर रख रही है।
त्योहारों के मौसम ने बढ़ाई चिंता
भारत में जन्माष्टमी के साथ त्योहारों का मौसम शुरू होने वाला है। इसके बाद कई प्रमुख त्योहार आते हैं, जिनमें मिठाइयों और खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ जाती है।
त्योहारों के दौरान चीनी की खपत भी बढ़ती है। मिठाई की दुकानों, रेस्टोरेंट, बेकरी और घरेलू उपयोग में चीनी की मांग बढ़ने के कारण बाजार में अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
इसी वजह से सरकार चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए कदम उठा रही है।
सरकार ने चीनी निर्यात पर लगाई रोक
घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने चीनी के निर्यात पर रोक लगाने का फैसला किया है।
इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाजार में पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध रखना है, ताकि त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने पर बाजार में अचानक कमी न हो।
इसके साथ ही सरकार ने थोक व्यापारियों के पास रखे जा सकने वाले चीनी के स्टॉक पर भी स्टॉक लिमिट लागू की है।
भारत में कितनी चीनी मिलें हैं?
भारत में गन्ना आधारित चीनी उद्योग काफी बड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में गन्ने के रस से चीनी बनाने वाली कुल 703 चीनी मिलें हैं।
इनमें करीब—
- 335 निजी चीनी मिलें
- 325 सहकारी चीनी मिलें
- 43 सरकारी चीनी मिलें
शामिल हैं।
चीनी उद्योग लाखों किसानों और बड़ी संख्या में श्रमिकों की आजीविका से जुड़ा हुआ है।
गन्ने की खेती का कितना बड़ा क्षेत्र है?
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अनुसार, भारत में हर साल औसतन 55 से 60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है।
देश में औसतन करीब 45 करोड़ टन गन्ने का उत्पादन होता है। गन्ना आधारित उद्योग से लगभग पांच करोड़ लोगों को रोजगार मिलने की बात भी सामने आई है।
इसलिए चीनी की कीमतों में बदलाव का असर केवल उपभोक्ताओं पर ही नहीं, बल्कि किसानों, चीनी मिलों और इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ता है।
सरकार का दावा—देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू खपत के लिए देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध है। सरकार ने यह भी कहा कि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशों पर नजर रखी जा रही है।
सरकार के अनुसार, कीमतों में अनावश्यक बढ़ोतरी को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
आने वाले दिनों में क्या हो सकता है?
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आने वाले दिनों में चीनी की कीमतों का रुख कैसा रहेगा। त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने की संभावना है, जबकि बाजार में स्टॉक, उत्पादन और मौसम की स्थिति पर भी नजर बनी रहेगी।
अगर घरेलू बाजार में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहता है और सरकार की ओर से उठाए गए कदम प्रभावी साबित होते हैं, तो कीमतों में स्थिरता आने की उम्मीद की जा सकती है। वहीं मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ने पर कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
भारत में चीनी की कीमतों में हालिया तेजी के पीछे सिर्फ Ethanol उत्पादन को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। चीनी उत्पादन का अनुमान से कम रहना, पिछले साल का कम शुरुआती स्टॉक, गन्ने की फसल पर मौसम का असर, कुछ क्षेत्रों में फसल रोग, चीनी रिकवरी रेट में गिरावट और त्योहारों से पहले बढ़ती मांग जैसे कई कारण कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।
इथेनॉल उत्पादन और चीनी उत्पादन के बीच संतुलन जरूर महत्वपूर्ण है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को समझने के लिए पूरे गन्ना-चीनी-इथेनॉल बाजार को एक साथ देखना होगा।




















