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Allahabad हाईकोर्ट का बड़ा फैसला स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की मांग खारिज

On: August 25, 2026 7:32 PM
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प्रयागराज: Allahabad हाईकोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब या सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगने वाली एक नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने के लिए पर्याप्त धार्मिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकी कि स्कूल में सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है।

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अदालत ने अपने फैसले में स्कूलों में लागू समान ड्रेस कोड, अनुशासन और संस्थान की पहचान बनाए रखने के महत्व पर भी जोर दिया। कोर्ट के अनुसार, यदि किसी शिक्षण संस्थान में सभी विद्यार्थियों के लिए समान और गैर-भेदभावपूर्ण ड्रेस कोड लागू है, तो किसी एक छात्र या छात्रा के लिए व्यक्तिगत आधार पर उसमें बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

क्या है पूरा मामला

यह मामला Allahabad के अत्तारसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की एक छात्रा से जुड़ा है। छात्रा ने अपनी मां के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

याचिका में छात्रा ने 11वीं कक्षा में प्रवेश देने तथा निर्धारित स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति देने की मांग की थी।

छात्रा की ओर से अदालत में कहा गया कि वह कक्षा छह से 10वीं तक इसी स्कूल में पढ़ी है। इस दौरान वह सिर पर स्कार्फ पहनकर स्कूल जाती रही और स्कूल प्रबंधन की ओर से उस समय कोई आपत्ति नहीं जताई गई।

इसी आधार पर छात्रा की ओर से यह मांग की गई कि उसे आगे की पढ़ाई के दौरान भी स्कूल यूनिफॉर्म के साथ स्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए।

स्कूल ने क्या कहा

स्कूल प्रबंधन की ओर से अदालत के सामने कहा गया कि संस्थान में सभी विद्यार्थियों के लिए एक समान यूनिफॉर्म निर्धारित है और इस ड्रेस कोड का पालन सभी छात्रों के लिए आवश्यक है।

स्कूल का तर्क था कि यदि किसी एक छात्रा को निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग पहनावे की अनुमति दी जाती है, तो इससे स्कूल में लागू समान ड्रेस कोड और अनुशासन की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

स्कूल ने यह भी स्पष्ट किया कि यूनिफॉर्म का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच समानता बनाए रखना और शिक्षण संस्थान में अनुशासन तथा एकरूपता सुनिश्चित करना है।

हाईकोर्ट ने धार्मिक प्रमाणों पर क्या कहा

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई की।

अदालत ने कहा कि छात्रा की ओर से पर्याप्त धार्मिक सामग्री या प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए, जिनसे यह स्थापित हो सके कि स्कूल में सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसका पालन हर परिस्थिति में आवश्यक है।

कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्नों में से एक यह था कि क्या स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की मांग को अनिवार्य धार्मिक प्रथा के आधार पर कानूनी संरक्षण दिया जा सकता है।

अदालत ने उपलब्ध सामग्री और संबंधित न्यायिक फैसलों पर विचार करने के बाद इस दावे को स्वीकार नहीं किया।

पहले स्कार्फ पहनने की अनुमति से स्थायी अधिकार नहीं

अदालत ने छात्रा की इस दलील पर भी विचार किया कि उसने कक्षा छह से 10वीं तक स्कूल में स्कार्फ पहना था और उस दौरान स्कूल की ओर से कोई आपत्ति नहीं की गई थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिछली कक्षाओं में स्कूल द्वारा स्कार्फ पहनने पर आपत्ति नहीं किए जाने मात्र से छात्रा को भविष्य में भी उसी तरह स्कार्फ पहनने का कोई स्थायी कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।

अदालत के अनुसार, किसी समय किसी व्यवहार पर आपत्ति नहीं की गई हो, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह व्यवहार भविष्य में भी ड्रेस कोड से छूट का कानूनी अधिकार बन जाता है।

समान ड्रेस कोड पर कोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने शिक्षण संस्थानों में समान ड्रेस कोड की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने माना कि स्कूल यूनिफॉर्म का उद्देश्य केवल कपड़ों का निर्धारण करना नहीं है, बल्कि इसके पीछे विद्यार्थियों के बीच समानता, अनुशासन और संस्थान की पहचान बनाए रखने जैसे उद्देश्य भी जुड़े हो सकते हैं।

समान यूनिफॉर्म से विद्यार्थियों के बीच आर्थिक या सामाजिक अंतर को कम करने तथा सभी को एक समान शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराने में भी मदद मिल सकती है।

अदालत ने कहा कि यदि ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होता है और उसमें किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ भेदभाव नहीं किया जाता, तो व्यक्तिगत आधार पर उसमें अलग छूट की मांग करना उचित नहीं माना जा सकता।

कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले का भी उल्लेख

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में देश के अन्य हाईकोर्ट के निर्णयों का भी उल्लेख किया। इनमें विशेष रूप से कर्नाटक हाईकोर्ट के वर्ष 2022 के फुल बेंच फैसले का जिक्र किया गया।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा के रूप में स्वीकार नहीं किया था।

Allahabad हाईकोर्ट ने इस फैसले को महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना। अदालत ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में कर्नाटक हाईकोर्ट के निष्कर्ष से अलग राय रखने के लिए उसके सामने पर्याप्त आधार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के आयशा शिफा मामले का भी जिक्र

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के आयशा शिफा मामले का भी उल्लेख किया।

अदालत ने ध्यान दिलाया कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बंटा हुआ था। यानी इस मुद्दे पर न्यायाधीशों की राय एक जैसी नहीं थी।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस विषय पर अभी तक ऐसा अंतिम और निर्णायक फैसला नहीं आया है, जो देशभर में इस विवाद को पूरी तरह से समाप्त कर दे।

इसके बावजूद अदालत ने उपलब्ध न्यायिक स्थिति और विशेष रूप से कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को ध्यान में रखते हुए छात्रा की याचिका को स्वीकार नहीं किया।

यूनिफॉर्म और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन

मामले में एक महत्वपूर्ण सवाल धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षण संस्थान के ड्रेस कोड के बीच संतुलन का भी था।

अदालत ने माना कि धार्मिक आस्था का सम्मान महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी शिक्षण संस्थान के समान ड्रेस कोड और अनुशासन की व्यवस्था को भी ध्यान में रखना होगा।

यदि संस्थान की यूनिफॉर्म नीति सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से लागू होती है और उसका उद्देश्य अनुशासन तथा समानता बनाए रखना है, तो व्यक्तिगत पसंद के आधार पर उसमें बदलाव की मांग को स्वीकार करना जरूरी नहीं है।

स्कूल की पहचान और अनुशासन का महत्व

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि स्कूल यूनिफॉर्म किसी शिक्षण संस्थान की पहचान का हिस्सा हो सकती है। एक निर्धारित पोशाक विद्यार्थियों में अनुशासन और संस्थान से जुड़ाव की भावना पैदा करने का माध्यम बन सकती है।

अदालत के अनुसार, शैक्षणिक संस्थानों को अपने ड्रेस कोड और अनुशासन से संबंधित नियम निर्धारित करने का अधिकार है, बशर्ते वे नियम कानून के अनुरूप हों और समान रूप से लागू किए जाएं।

छात्रा की रिट याचिका हुई खारिज

मामले की सुनवाई और विभिन्न कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छात्रा की रिट याचिका खारिज कर दी।

अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि छात्रा यह स्थापित करने में सफल नहीं रही कि स्कूल में सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसे स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ भी अनिवार्य रूप से अनुमति दी जानी चाहिए।

इस आधार पर अदालत ने स्कूल के ड्रेस कोड में व्यक्तिगत छूट की मांग को स्वीकार नहीं किया।

फैसले का व्यापक महत्व

Allahabad हाईकोर्ट का यह फैसला शिक्षण संस्थानों में ड्रेस कोड और धार्मिक पहनावे से जुड़े विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

इस फैसले में अदालत ने समानता, अनुशासन, संस्थान की पहचान और धार्मिक प्रथा के अनिवार्य होने के दावे जैसे विभिन्न पहलुओं पर विचार किया है।

हालांकि, इस तरह के मामलों में प्रत्येक मामले के तथ्य और संबंधित कानूनी परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी एक फैसले को सभी स्कूलों और सभी परिस्थितियों पर स्वतः लागू मानना उचित नहीं होगा।

आगे की कानूनी स्थिति पर नजर

हिजाब और शिक्षण संस्थानों के ड्रेस कोड से जुड़े मामलों में देश के अलग-अलग न्यायालयों में समय-समय पर महत्वपूर्ण फैसले सामने आए हैं। ऐसे मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता, संस्थागत अनुशासन, समानता और शिक्षा के अधिकार जैसे विभिन्न कानूनी पहलू सामने आते हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस मामले में भी अदालत ने उपलब्ध न्यायिक फैसलों और प्रस्तुत सामग्री के आधार पर अपना निर्णय दिया है।

Allahabad हाईकोर्ट ने प्रयागराज के टैगोर पब्लिक स्कूल की एक नाबालिग छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 11वीं कक्षा में प्रवेश के साथ निर्धारित स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी गई थी।

अदालत ने कहा कि छात्रा पर्याप्त धार्मिक प्रमाणों के माध्यम से यह स्थापित नहीं कर सकी कि स्कूल में सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। कोर्ट ने यह भी माना कि समान, गैर-भेदभावपूर्ण ड्रेस कोड का उद्देश्य विद्यार्थियों में समानता, अनुशासन और संस्थान की पहचान बनाए रखना हो सकता है।

अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 2022 के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें हिजाब को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट के आयशा शिफा मामले में बंटी हुई राय का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर अभी तक ऐसा अंतिम फैसला नहीं आया है, जो पूरे विवाद को निर्णायक रूप से सुलझाता हो।

फिलहाल Allahabad हाईकोर्ट ने उपलब्ध कानूनी स्थिति और मामले के तथ्यों के आधार पर छात्रा की याचिका खारिज कर दी है। यह फैसला स्कूलों में ड्रेस कोड और धार्मिक पहनावे से जुड़े भविष्य के विवादों में भी चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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