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हाईकोर्ट की दखल पर 2 एएसआई समेत 6 पुलिसकर्मी गिरफ्तार Ara में भरत तिवारी जैसा दूसरा कांड?

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On: July 3, 2026 5:57 PM
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भोजपुर: बिहार के भोजपुर जिले के Ara से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस हिरासत, दलित उत्पीड़न और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बिहिया थाना क्षेत्र के गंज गांव निवासी दलित युवक सनोज कुमार के रहस्यमय ढंग से लापता होने के मामले में अब बड़ी कार्रवाई हुई है। पटना हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भोजपुर पुलिस ने उत्पाद थाने के दो एएसआई, तीन होमगार्ड जवान और एक निजी चालक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। अदालत ने न सिर्फ इस मामले को गंभीरता से लिया है, बल्कि इसकी मॉनिटरिंग खुद करने का फैसला भी किया है। कोर्ट के आदेश पर पीड़ित परिवार को सुरक्षा भी उपलब्ध कराई जा रही है।

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मामला इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि सनोज कुमार को 13 अगस्त 2025 को कथित तौर पर उत्पाद विभाग की टीम ने पकड़ा था, लेकिन उसके बाद से वह घर नहीं लौटा। पुलिस का दावा है कि वह हिरासत से भाग गया था, लेकिन दूसरी ओर सनोज का मोबाइल पुलिस के पास से बरामद होना, उसकी बाइक का मिलना, और परिवार का आरोप कि उसे पुलिस ने पकड़कर पीटा था—इन सबने पुलिस की कहानी को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। यही वजह है कि अब भोजपुर में लोग पूछ रहे हैं—क्या आरा में भरत तिवारी एनकाउंटर जैसी एक और भयावह कहानी लिखी जा रही थी?

हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद बड़ी कार्रवाई

सनोज कुमार की गुमशुदगी का मामला पहले स्थानीय स्तर पर दबा हुआ-सा दिख रहा था, लेकिन जब परिवार को कोई राहत नहीं मिली तो उन्होंने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद पूरे मामले ने अचानक गंभीर मोड़ ले लिया। हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए न केवल भोजपुर पुलिस से जवाब-तलब किया, बल्कि संबंधित पुलिसकर्मियों की भूमिका पर भी सख्त सवाल उठाए। कोर्ट की सख्ती के बाद भोजपुर पुलिस हरकत में आई और संदिग्ध पुलिसकर्मियों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की गई।

बुधवार को उत्पाद थाने के एएसआई धीरज कुमार सिंह और राज कुमार, होमगार्ड जवान राजू सिंह, उमेश यादव और धर्मेंद्र पासवान, तथा थाने के निजी चालक विकास सिंह को विधिवत गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। भोजपुर पुलिस अधीक्षक राज ने भी इसकी पुष्टि की। बताया गया कि एक अन्य संदिग्ध पुलिसकर्मी से भी पूछताछ की जा रही है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक सनोज कुमार को पकड़ने और उसके बाद की घटनाओं में इन सभी की संलिप्तता सामने आई है।

कौन हैं गिरफ्तार पुलिसकर्मी और क्या है उनकी भूमिका?

गिरफ्तार किए गए पुलिसकर्मियों में एएसआई धीरज कुमार सिंह और एएसआई राज कुमार प्रमुख हैं। दोनों जगदीशपुर उत्पाद थाने में तैनात थे। इनके अलावा होमगार्ड जवान राजू सिंह, धर्मेंद्र पासवान और उमेश यादव भी उसी थाने में पदस्थापित थे। थाने के निजी चालक विकास सिंह को भी गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है। सूत्रों के मुताबिक यह वही टीम थी, जिसने कथित तौर पर सनोज कुमार को पकड़ा था।

जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि 13 अगस्त 2025 को सनोज को पकड़ने के बाद उसके साथ क्या हुआ। क्या उसे आधिकारिक रूप से हिरासत में लिया गया था? अगर लिया गया था, तो उसकी गिरफ्तारी का रिकॉर्ड क्यों स्पष्ट नहीं है? अगर वह भाग गया, तो उस समय मौजूद पुलिसकर्मियों ने तत्काल रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं कराई? और अगर पुलिस की कहानी में सचाई है, तो उसका मोबाइल, उसकी बाइक और परिवार के आरोपों का क्या मतलब है? यही वे सवाल हैं, जिनका जवाब अब अदालत और जांच एजेंसियां तलाश रही हैं।

13 अगस्त 2025 से लापता है सनोज कुमार

मामले की जड़ में 13 अगस्त 2025 की वह शाम है, जब बिहिया थाना क्षेत्र के गंज गांव निवासी गौरी शंकर राम के पुत्र सनोज कुमार को कथित तौर पर उत्पाद विभाग की टीम ने पकड़ लिया था। परिवार का कहना है कि उसी शाम करीब 6:35 बजे सनोज ने फोन कर बताया था कि उसे धरहरा मुसहर टोली के पास आबकारी पुलिस ने पकड़ लिया है। इसके बाद परिजन तुरंत मौके की ओर भागे, लेकिन वहां पहुंचने तक उसका फोन बंद हो चुका था।

परिवार ने सनोज की तलाश शुरू की। खोजबीन के दौरान उसकी बाइक लावारिस हालत में खड़ी मिली, लेकिन सनोज का कोई सुराग नहीं मिला। इसके बाद मामला और संदिग्ध हो गया। परिवार का आरोप है कि पुलिस को बार-बार बताने और प्राथमिकी दर्ज कराने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जब स्थानीय स्तर पर सुनवाई नहीं हुई, तब मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा।

पुलिस की थ्योरी पर उठ रहे हैं गंभीर सवाल

उत्पाद पुलिस की ओर से जो कहानी सामने आई, उसने मामले को और उलझा दिया। पुलिस का दावा है कि 13 अगस्त 2025 को कुछ युवकों को पकड़ा गया था। उसी दौरान बिहिया चौरास्ता पर जाम लग गया और बंद बोलेरो वाहन के पीछे बैठा एक युवक अंधेरे का फायदा उठाकर दरवाजा खोलकर भाग निकला। पुलिस का कहना है कि वही युवक सनोज कुमार था।

लेकिन यह दलील अब खुद पुलिस के लिए गले की फांस बन गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कोई युवक पुलिस हिरासत से भाग गया था, तो तत्काल स्थानीय थाने में सनहा या एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई? किसी भी हिरासत से फरारी की घटना प्रशासनिक और कानूनी रूप से गंभीर मानी जाती है। ऐसे में तत्काल रिपोर्ट दर्ज होना सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन यहां ऐसा नहीं हुआ। यही नहीं, यदि युवक भाग निकला, तो उसका मोबाइल पुलिस के पास कैसे मिला? यह सवाल पूरे मामले की दिशा बदल देता है।

मोबाइल पुलिस के पास, बाइक बाहर कहानी में कई छेद

सनोज कुमार के मामले में सबसे चौंकाने वाली बात उसका मोबाइल फोन है। परिवार और जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, बाद में सीडीआर और स्थानीय दबाव के बाद सनोज का मोबाइल उत्पाद पुलिस के पास से बरामद हुआ। अब सवाल यह है कि अगर सनोज पुलिस की हिरासत से भाग गया था, तो उसका मोबाइल उसके पास क्यों नहीं था? क्या वह बिना मोबाइल लिए भाग गया? अगर ऐसा हुआ, तो पुलिस ने उसी समय परिवार या स्थानीय थाने को इसकी जानकारी क्यों नहीं दी?

दूसरी ओर उसकी बाइक लावारिस हालत में मिली। इसका मतलब यह हुआ कि घटना स्थल, बाइक की बरामदगी और मोबाइल की मौजूदगी—तीनों चीजें पुलिस की थ्योरी से मेल नहीं खातीं। यही वजह है कि अब यह मामला साधारण गुमशुदगी या हिरासत से फरारी का नहीं, बल्कि संभावित कस्टोडियल गायबगी और उससे जुड़े गंभीर अपराध की आशंका तक पहुंच गया है।

भाई का बयान फोन पर रो रहा था, कह रहा था पुलिस मार रही है’

मामले में सबसे झकझोर देने वाला पक्ष सनोज के भाई निरंजन कुमार का बयान है। निरंजन के अनुसार, सनोज ने फोन पर रोते हुए बताया था कि उसे आबकारी पुलिस ने पकड़ लिया है। जब कुछ देर बाद दोबारा फोन किया गया, तो वह फूट-फूटकर रोने लगा और कहा—“बार-बार फोन मत करो, पुलिस बहुत मार रही है।” इसके बाद फोन बंद हो गया।

यह बयान पूरे मामले को बेहद संवेदनशील और गंभीर बना देता है। अगर यह दावा सही है, तो यह सिर्फ गुमशुदगी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि हिरासत में प्रताड़ना और संभावित गैरकानूनी कार्रवाई की आशंका को भी मजबूत करता है। परिवार का कहना है कि उसी समय से उन्हें आशंका थी कि सनोज के साथ कुछ बहुत गलत हुआ है, लेकिन उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया गया।

हाईकोर्ट ने क्यों अपनाया सख्त रुख?

पटना हाईकोर्ट ने इस मामले को महज एक पुलिस जांच का विषय मानकर नहीं छोड़ा। न्यायाधीश राजीव रंजन प्रसाद और न्यायाधीश कुमार मनीष की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ संकेत दिया कि मामला बेहद गंभीर है और इसमें सतही जांच से काम नहीं चलेगा। कोर्ट ने पीड़ित परिवार को तत्काल सुरक्षा देने का आदेश दिया और यह भी स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता लापता युवक की बरामदगी और सच को सामने लाना है।

सुनवाई के दौरान भोजपुर एसपी ने कोर्ट को बताया कि संदेह के घेरे में आए सात लोगों में से छह को गिरफ्तार कर लिया गया है। लेकिन कोर्ट ने पुलिस की “भागने” वाली थ्योरी पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज देखकर ऐसा नहीं लगता कि बंद बोलेरो के पीछे का दरवाजा आसानी से खुला होगा और कोई व्यक्ति यूं ही भाग निकला होगा। अदालत की यह टिप्पणी इस बात का संकेत है कि पुलिस की कहानी न्यायालय को भी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगी।

परिवार को सुरक्षा कोर्ट खुद करेगा मॉनिटरिंग

हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ित परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। बताया जा रहा है कि सनोज कुमार के परिजनों ने अदालत से न केवल बेटे की बरामदगी की मांग की, बल्कि अपनी सुरक्षा को लेकर भी गुहार लगाई थी। अदालत के निर्देश के बाद अब परिवार को सुरक्षा देने की कवायद तेज कर दी गई है। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जब मामला पुलिसकर्मियों पर ही सवाल खड़ा करता हो, तब पीड़ित परिवार खुद को असुरक्षित महसूस कर सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मामले की मॉनिटरिंग खुद हाईकोर्ट करेगा, जबकि जांच का सुपरविजन भोजपुर एसपी को सौंपा गया है। इसका सीधा अर्थ है कि अब इस केस में हर अगला कदम न्यायिक निगरानी के दायरे में होगा। पुलिस की जांच, बरामदगी की कोशिश, तकनीकी साक्ष्यों का विश्लेषण और गिरफ्तार पुलिसकर्मियों से पूछताछ—सब पर अदालत की नजर रहेगी।

भरत तिवारी कांड’ जैसी आशंका क्यों उठ रही है?

भोजपुर और आसपास के इलाके में इस मामले को लेकर जिस तरह की चर्चा हो रही है, उसमें भरत तिवारी एनकाउंटर का संदर्भ बार-बार सामने आ रहा है। वजह साफ है—यह मामला भी पुलिस कार्रवाई, हिरासत, संदिग्ध कहानी और एक व्यक्ति के गायब हो जाने से जुड़ा है। जब किसी युवक को पुलिस पकड़ने की बात सामने आए, फिर वह रहस्यमय तरीके से लापता हो जाए, और बाद में पुलिस की कहानी में विरोधाभास दिखने लगे, तो लोगों के मन में पुराने विवादित मामलों की याद ताजा होना स्वाभाविक है।

हालांकि अभी इस मामले में अंतिम सच सामने आना बाकी है, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि इस प्रकरण ने बिहार में पुलिस जवाबदेही, दलित सुरक्षा और हिरासत में होने वाली कथित ज्यादतियों पर बहस को तेज कर दिया है। यदि जांच में यह साबित होता है कि सनोज कुमार के साथ पुलिस हिरासत में कोई अनहोनी हुई, तो यह मामला राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा।

तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों के सहारे सनोज की तलाश

भोजपुर पुलिस का कहना है कि अब वह तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर सनोज कुमार की बरामदगी में जुटी है। सीडीआर, मोबाइल लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज, वाहन की मूवमेंट, पुलिसकर्मियों के बयान और घटनास्थल से जुड़े सभी तथ्यों को खंगाला जा रहा है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि सनोज को आखिरी बार किसने देखा, किन परिस्थितियों में उसे पकड़ा गया और उसके बाद उसकी गतिविधियों का आखिरी संकेत कहां तक मिला।

लेकिन इस जांच की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मामला जितना पुराना होता जाएगा, साक्ष्यों की विश्वसनीयता और बरामदगी की संभावना उतनी जटिल होती जाएगी। यही कारण है कि अदालत ने पुलिस को जल्द और प्रभावी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अब पूरा ध्यान इस बात पर है कि क्या सनोज जीवित बरामद होगा, या फिर यह मामला किसी और भयावह सच्चाई की ओर बढ़ रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल सनोज कहां है?

इस पूरे प्रकरण के बीच सबसे बड़ा, सबसे बुनियादी और सबसे दर्दनाक सवाल अब भी वही है—सनोज कुमार कहां है? क्या वह वाकई पुलिस हिरासत से भागा था? अगर हां, तो इतने महीनों बाद भी उसका कोई पता क्यों नहीं चला? अगर नहीं, तो फिर उसके साथ क्या हुआ? उसका मोबाइल पुलिस के पास कैसे पहुंचा? बाइक कहां और कैसे मिली? और पुलिस ने इतने समय तक स्पष्ट जवाब क्यों नहीं दिया?

ये सवाल सिर्फ एक परिवार के नहीं, बल्कि पूरे समाज के हैं। क्योंकि जब किसी दलित युवक के गायब होने के मामले में पुलिस ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो मामला केवल कानून का नहीं, न्याय और लोकतांत्रिक भरोसे का भी हो जाता है। पटना हाईकोर्ट की सख्ती ने इस मामले को नया मोड़ दिया है, लेकिन अंतिम जवाब अभी बाकी है। अब नजर इस बात पर है कि जांच किस दिशा में जाती है, सनोज कुमार का सुराग मिलता है या नहीं, और गिरफ्तार पुलिसकर्मियों से पूछताछ में क्या नई परतें सामने आती हैं।

फिलहाल इतना तय है कि भोजपुर का यह मामला अब एक सामान्य गुमशुदगी या स्थानीय विवाद का विषय नहीं रहा। यह पुलिस जवाबदेही, न्यायिक निगरानी, दलित अधिकार और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है। आने वाले दिनों में इस केस की हर सुनवाई, हर बरामदगी और हर खुलासा बिहार की राजनीति और पुलिस व्यवस्था—दोनों पर असर डाल सकता है।

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