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तेहरान से मशहद तक 6 दिनों तक चलेगा Ayatollah खामेनेई के अंतिम संस्कार का कार्यक्रम

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On: July 3, 2026 5:35 PM
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तेहरान: ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता Ayatollah अली खामेनेई के अंतिम संस्कार को लेकर अब पूरा कार्यक्रम सामने आ गया है। अमेरिका के साथ हुए युद्ध में खामेनेई की मौत के बाद ईरान अब उनके राजकीय अंतिम संस्कार की तैयारियों में जुट गया है। ईरानी अधिकारियों की ओर से जारी कार्यक्रम के मुताबिक यह पूरा अंतिम संस्कार समारोह 4 जुलाई से 9 जुलाई तक चलेगा और इसमें तेहरान, क़ुम, नजफ, कर्बला और मशहद जैसे अहम धार्मिक शहर शामिल होंगे। इस दौरान अंतिम दर्शन, श्रद्धांजलि सभाएं, जनाजे की रस्म, जुलूस और दफन की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से आयोजित की जाएगी।

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खामेनेई का अंतिम संस्कार केवल एक राजकीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि ईरान के राजनीतिक, धार्मिक और कूटनीतिक परिदृश्य का बड़ा आयोजन माना जा रहा है। ईरान ने इस बहु-दिवसीय कार्यक्रम में शामिल होने के लिए दुनिया के कई देशों के नेताओं, धार्मिक प्रतिनिधियों और राजनीतिक हस्तियों को आमंत्रित किया है। भारत से भी कुछ नेताओं को औपचारिक निमंत्रण भेजे जाने की खबर है। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने कथित तौर पर इस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है और उनके ईरान जाने की चर्चा है। ऐसे में यह अंतिम संस्कार केवल ईरान के भीतर शोक का कार्यक्रम नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण बन गया है।

4 और 5 जुलाई तेहरान में दो दिवसीय अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि समारोह

अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की शुरुआत 4 और 5 जुलाई को तेहरान स्थित ग्रैंड इमाम खुमैनी मुसल्ला से होगी। यही वह स्थान होगा जहां उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। दो दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम में ईरान के शीर्ष राजनीतिक नेता, धार्मिक विद्वान, सैन्य अधिकारी, विदेशी प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में आम नागरिक शामिल हो सकते हैं। ईरान के लिए यह आयोजन बेहद भावनात्मक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि खामेनेई कई दशकों तक देश के सर्वोच्च नेता रहे और उन्होंने ईरान की धार्मिक-राजनीतिक व्यवस्था को लंबे समय तक दिशा दी।

अंतिम दर्शन के इन दो दिनों को ईरान सरकार व्यापक जनभागीदारी और राजकीय सम्मान के साथ आयोजित करना चाहती है। माना जा रहा है कि तेहरान में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जाएंगे और शहर के प्रमुख मार्गों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी। खामेनेई के समर्थकों के लिए यह कार्यक्रम श्रद्धांजलि का अवसर होगा, जबकि ईरान की सत्ता-व्यवस्था के लिए यह शक्ति, निरंतरता और वैचारिक एकजुटता का प्रदर्शन भी माना जा रहा है।

6 जुलाई तेहरान में निकलेगी मुख्य अंतिम यात्रा

कार्यक्रम के अनुसार 6 जुलाई को तेहरान में अयातुल्लाह अली खामेनेई की मुख्य अंतिम यात्रा निकाली जाएगी। यह कार्यक्रम पूरे अंतिम संस्कार का सबसे बड़ा सार्वजनिक चरण माना जा रहा है। इसी दिन खामेनेई के पार्थिव शरीर के साथ अन्य परिजनों और सहयोगियों के पार्थिव शरीर भी अंतिम यात्रा में शामिल रहेंगे। जिन नामों का उल्लेख किया गया है, उनमें डॉ. मिस्बाह-उल-हुडा बाघेरी, सैय्यदा बुशरा हुसैनी खामेनेई, ज़हरा हद्दाद आदिल और ज़हरा मोहम्मदी गोलपायगानी शामिल हैं।

तेहरान की इस अंतिम यात्रा को लेकर प्रशासन ने बड़े पैमाने पर तैयारियां शुरू कर दी हैं। शहर के मुख्य मार्गों, धार्मिक स्थलों और सरकारी परिसरों के आसपास सुरक्षा बढ़ाई जा सकती है। अंतिम यात्रा में लाखों लोगों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। ईरान के लिए यह जुलूस केवल शोक-यात्रा नहीं होगा, बल्कि एक ऐसे नेता को अंतिम विदाई होगी, जिसने 1989 से लेकर अपनी मृत्यु तक देश की सर्वोच्च सत्ता संभाली। यही वजह है कि इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय शोक और राजनीतिक संदेश— दोनों रूपों में देखा जा रहा है।

7 जुलाई क़ुम में होगी अंतिम नमाज-ए-जनाजा

ईरान के धार्मिक और वैचारिक केंद्रों में से एक क़ुम शहर में 7 जुलाई को खामेनेई की अंतिम नमाज-ए-जनाजा अदा की जाएगी। क़ुम शिया इस्लामी शिक्षा और धार्मिक प्रतिष्ठानों का प्रमुख केंद्र है, इसलिए वहां होने वाला यह कार्यक्रम विशेष महत्व रखता है। माना जा रहा है कि क़ुम में ईरान के शीर्ष धर्मगुरु, इस्लामी विद्वान, मदरसा नेटवर्क से जुड़े लोग और बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होंगे।

क़ुम में होने वाली नमाज-ए-जनाजा को ईरानी धार्मिक प्रतिष्ठान के लिए प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खामेनेई केवल राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि ईरान की इस्लामी क्रांति की निरंतरता के प्रतीक के रूप में भी देखे जाते थे। ऐसे में क़ुम का कार्यक्रम उनके धार्मिक और वैचारिक प्रभाव को रेखांकित करने वाला चरण माना जा रहा है।

8 जुलाई इराक पहुंचेगी अंतिम यात्रा, नजफ और कर्बला में श्रद्धांजलि

अंतिम संस्कार कार्यक्रम का सबसे अहम और अंतरराष्ट्रीय आयाम 8 जुलाई को सामने आएगा, जब धार्मिक और राजनीतिक नेताओं के अनुरोध पर अंतिम यात्रा इराक पहुंचेगी। इस दिन नजफ और कर्बला में श्रद्धांजलि और धार्मिक समारोह आयोजित किए जाने की बात कही गई है। यह चरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान और इराक के शिया धार्मिक केंद्रों के बीच ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक संबंध रहे हैं।

नजफ और कर्बला शिया मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र स्थल हैं। कर्बला में इमाम हुसैन का मज़ार और नजफ में इमाम अली का पवित्र स्थल स्थित है। ऐसे में खामेनेई की अंतिम यात्रा का वहां पहुंचना एक गहरे धार्मिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि ईरान खामेनेई की अंतिम विदाई को केवल राष्ट्रीय आयोजन नहीं, बल्कि व्यापक शिया जगत की साझा स्मृति और सम्मान के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। हालांकि इराक में होने वाले कार्यक्रम का विस्तृत शेड्यूल वहां के प्रशासन द्वारा जारी किया जाना बाकी बताया गया है।

9 जुलाई मशहद में होगा दफन, इमाम रज़ा दरगाह में सुपुर्द-ए-खाक

अंतिम संस्कार कार्यक्रम का अंतिम चरण 9 जुलाई को ईरान के मशहद शहर में पूरा होगा, जहां अयातुल्लाह अली खामेनेई को इमाम रज़ा दरगाह में दफन किया जाएगा। मशहद खामेनेई का जन्मस्थान भी माना जाता है और शिया इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों में से एक इमाम रज़ा का मज़ार भी यहीं स्थित है। ऐसे में दफन के लिए मशहद का चयन धार्मिक, भावनात्मक और राजनीतिक— तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार यह दफन कार्यक्रम इमाम सज्जाद की शहादत की रात के अवसर पर आयोजित किया जाएगा, जिससे इसे और अधिक धार्मिक महत्व मिल जाएगा। मशहद में अंतिम चरण के दौरान देश-विदेश से आए प्रतिनिधियों, ईरानी नेताओं, धार्मिक विद्वानों और आम श्रद्धालुओं की बड़ी मौजूदगी रहने की संभावना है। इस तरह 4 जुलाई से शुरू हुआ यह शोक-कार्यक्रम 9 जुलाई को मशहद में जाकर संपन्न होगा।

कौन-कौन होंगे अंतिम संस्कार में शामिल? भारत से भी नेताओं को न्योता

ईरान ने खामेनेई के अंतिम संस्कार को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की भी कोशिश की है। रिपोर्ट्स के अनुसार दुनिया के कई देशों के नेताओं, धार्मिक प्रतिनिधियों और राजनीतिक हस्तियों को इस कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया है। भारत से भी कुछ नेताओं को औपचारिक आमंत्रण दिए जाने की चर्चा है। खबर है कि जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने तेहरान जाकर अंतिम संस्कार में शामिल होने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। उनके साथ भारत के अन्य नेताओं के भी शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक, सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में भारतीय नेताओं की मौजूदगी को केवल शोक-प्रकट करने की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक कूटनीतिक संकेत के रूप में भी देखा जाएगा। हालांकि भारत सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिनिधित्व का अंतिम स्वरूप क्या होगा, इस पर स्पष्टता आना अभी बाकी है।

खामेनेई की मौत के बाद ईरान के लिए यह सिर्फ शोक नहीं, शक्ति-प्रदर्शन भी

अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद ईरान एक कठिन राजनीतिक और रणनीतिक दौर से गुजर रहा है। अमेरिका के साथ हुए संघर्ष में ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में खामेनेई का अंतिम संस्कार देश के लिए केवल शोक का अवसर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। ईरान यह दिखाना चाहेगा कि उसके सर्वोच्च नेता की मौत के बावजूद उसकी व्यवस्था, धार्मिक प्रतिष्ठान और राज्य-संरचना एकजुट हैं।

तेहरान से मशहद तक फैला यह छह दिवसीय कार्यक्रम ईरानी सत्ता-तंत्र के लिए जनता को संगठित करने, वैश्विक समुदाय को संदेश देने और अपने समर्थक आधार को भावनात्मक रूप से जोड़ने का अवसर भी होगा। अंतिम संस्कार की व्यापकता से यह भी स्पष्ट है कि खामेनेई को ईरान केवल एक पूर्व सर्वोच्च नेता के रूप में विदाई नहीं दे रहा, बल्कि उन्हें इस्लामी गणराज्य की वैचारिक निरंतरता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

धार्मिक राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से अहम होगा यह सप्ताह

4 से 9 जुलाई तक चलने वाला यह पूरा कार्यक्रम ईरान के लिए धार्मिक, राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत अहम माना जा रहा है। एक ओर यह लाखों ईरानियों के लिए अपने लंबे समय तक सर्वोच्च नेता रहे व्यक्ति को अंतिम श्रद्धांजलि देने का अवसर होगा, तो दूसरी ओर यह सत्ता-परिवर्तन, राष्ट्रीय मनोबल और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण रहेगा। तेहरान, क़ुम, नजफ, कर्बला और मशहद में होने वाले कार्यक्रमों के जरिए ईरान यह संदेश देने की कोशिश करेगा कि संकट और युद्ध के बावजूद उसकी धार्मिक-राजनीतिक संरचना कायम है।

कुल मिलाकर, अयातुल्लाह अली खामेनेई का अंतिम संस्कार एक साधारण राजकीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व की राजनीति, शिया धार्मिक परंपरा और ईरान की आंतरिक सत्ता-व्यवस्था से जुड़ा एक ऐतिहासिक आयोजन बन गया है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि इस छह दिवसीय कार्यक्रम में कौन-कौन शामिल होता है, ईरान इसे किस तरह अंजाम देता है और इसके राजनीतिक संकेत क्या निकलते हैं।

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