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परमवीर चक्र विजेता मेजर Dhan सिंह थापा अदम्य साहस कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा

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On: June 10, 2026 6:20 PM
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भारत: सैन्य परंपरा वीरता, त्याग, शौर्य और बलिदान की अनगिनत गाथाओं से समृद्ध रही है। मेजर Dhan सिंह भारतीय सेना के अनेक वीर सपूतों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया और देश का मस्तक गर्व से ऊँचा किया। ऐसे ही महान योद्धाओं में परमवीर चक्र विजेता मेजर धन सिंह थापा का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उनका जीवन अदम्य साहस, कर्तव्यनिष्ठा, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण है। 10 जून को उनकी जयंती पर पूरा देश इस महान वीर को श्रद्धापूर्वक नमन करता है।

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प्रारंभिक जीवन और सैन्य सेवा

मेजर Dhan सिंह थापा का जन्म 10 जून 1928 को हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में हुआ था। उनके पिता पी. एस. थापा गोरखा समुदाय से संबंध रखते थे। गोरखा सैनिक अपनी वीरता और युद्ध कौशल के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं। बचपन से ही धन सिंह थापा अनुशासनप्रिय, साहसी और देशसेवा के प्रति समर्पित थे।

देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय सेना में शामिल होने का निर्णय लिया। अगस्त 1949 में उन्हें भारतीय सेना की प्रथम बटालियन, 8 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त हुआ। अपने उत्कृष्ट नेतृत्व, समर्पण और सैन्य दक्षता के कारण उन्होंने शीघ्र ही अपने वरिष्ठ अधिकारियों और साथियों के बीच विशेष पहचान बना ली।

1962 का भारत-चीन युद्ध और सिरिजाप चौकी की जिम्मेदारी

सन् 1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे कठिन दौरों में से एक था। चीन ने अचानक भारतीय सीमाओं पर हमला कर दिया, जिससे लद्दाख और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। लद्दाख के चुशूल सेक्टर का सामरिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण था।

इसी क्षेत्र में पांगोंग झील के निकट स्थित सिरिजाप-1 चौकी की सुरक्षा की जिम्मेदारी मेजर धन सिंह थापा और उनकी टुकड़ी के पास थी। यह चौकी कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में स्थित थी, जहां मौसम भी सैनिकों की परीक्षा लेता था। इसके बावजूद भारतीय सैनिक पूरी निष्ठा के साथ सीमा की रक्षा में डटे हुए थे।

अद्भुत वीरता का प्रदर्शन

20 अक्टूबर 1962 की सुबह चीनी सेना ने भारी संख्या में सैनिकों, टैंकों, मोर्टारों और तोपों के साथ सिरिजाप चौकी पर भीषण हमला कर दिया। दुश्मन की संख्या भारतीय सैनिकों से कई गुना अधिक थी। लगातार हो रही गोलाबारी से चौकी का संपर्क बाहरी दुनिया से लगभग समाप्त हो गया।

ऐसी विकट परिस्थिति में भी मेजर धन सिंह थापा ने असाधारण साहस और नेतृत्व का परिचय दिया। उन्होंने अपने सैनिकों का मनोबल ऊँचा रखा और अंतिम सांस तक संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। गोरखा सैनिकों ने अपनी परंपरागत वीरता का परिचय देते हुए दुश्मन का डटकर मुकाबला किया।

संख्या और हथियारों की भारी कमी के बावजूद भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना को भारी नुकसान पहुंचाया। गोला-बारूद कम होने के बाद भी उन्होंने पीछे हटने के बजाय अंतिम क्षण तक लड़ाई जारी रखी। यह युद्ध भारतीय सैनिकों की अदम्य इच्छाशक्ति और साहस का अद्वितीय उदाहरण बन गया।

युद्धबंदी बनने के बाद भी अमर हुई वीरता

भीषण संघर्ष के दौरान मेजर Dhan सिंह थापा चीनी सेना के हाथों युद्धबंदी बना लिए गए। उस समय भारतीय सेना और सरकार को उनकी वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं थी, इसलिए उन्हें शहीद मान लिया गया।

उनकी अनुपम वीरता और नेतृत्व क्षमता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान “परमवीर चक्र” से सम्मानित करने की घोषणा की। बाद में युद्ध समाप्त होने पर जानकारी मिली कि वे जीवित हैं और चीन के युद्धबंदी शिविर में रखे गए हैं। युद्धबंदियों की अदला-बदली के बाद जब वे स्वदेश लौटे तो पूरे देश ने उनका भव्य स्वागत किया। उनका जीवित लौटना भारतीय सैनिकों की अदम्य जीवटता का प्रतीक बन गया।

परमवीर चक्र से सम्मानित

परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है, जो युद्धभूमि में असाधारण साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए प्रदान किया जाता है। मेजर धन सिंह थापा को यह सम्मान उनकी अतुलनीय वीरता, नेतृत्व क्षमता और मातृभूमि के प्रति अटूट समर्पण के लिए दिया गया।

उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि एक सच्चा सैनिक परिस्थितियों से नहीं डरता, बल्कि अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए अंतिम सांस तक राष्ट्र की रक्षा करता है।

सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन

युद्ध के बाद भी मेजर धन सिंह थापा ने भारतीय सेना में अपनी सेवाएं जारी रखीं। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया और अपने अनुभवों से युवा सैनिकों को प्रेरित किया। बाद में वे लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए।

सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी वे देशभक्ति, अनुशासन और सेवा भावना के प्रतीक बने रहे। उनका व्यक्तित्व नई पीढ़ी के सैनिकों के लिए प्रेरणास्रोत रहा।

अमर विरासत

6 सितंबर 2005 को यह महान योद्धा इस संसार से विदा हो गया, लेकिन उनका साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में जीवित है। भारतीय सेना के इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।

आज उनकी जयंती केवल एक वीर सैनिक को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उन मूल्यों को आत्मसात करने का भी समय है जिनके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र सर्वोपरि है, कर्तव्य से बढ़कर कुछ नहीं और साहस ही वह शक्ति है जो असंभव परिस्थितियों में भी विजय का मार्ग प्रशस्त करती है।

मेजर Dhan सिंह थापा भारतीय सेना के उन अमर नायकों में हैं जिनकी वीरता की गाथा सदैव आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उनका जीवन त्याग, शौर्य और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण है। देश उनके अमूल्य योगदान को कभी नहीं भूल सकता।

उनकी जयंती पर हम सभी इस महान परमवीर चक्र विजेता योद्धा को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके आदर्शों पर चलकर राष्ट्रसेवा का संकल्प लेते हैं।

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