
हर वर्ष 4 जून को पिंगलवाड़ा धमार्थ संस्थान के संस्थापक, महान समाजसेवी और मानवता के सच्चे उपासक Bhagat पूर्णसिंह की जयंती मनाई जाती है। उनका जीवन केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि सेवा, त्याग, करुणा और समर्पण की ऐसी प्रेरक गाथा है जिसने लाखों लोगों के जीवन को नई दिशा दी। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन उन लोगों के लिए समर्पित कर दिया जिन्हें समाज अक्सर उपेक्षित कर देता हैअनाथ, अपंग, मानसिक रूप से अस्वस्थ, लावारिस, रोगग्रस्त और बेसहारा लोग।

आज भी जब मानव सेवा की बात होती है, तो सबसे पहले जिन महान व्यक्तित्वों का स्मरण किया जाता है, उनमें भगत पूर्णसिंह का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनके द्वारा स्थापित पिंगलवाड़ा केवल एक संस्था नहीं, बल्कि मानवता की जीवंत पाठशाला है।
Bhagat पूर्णसिंह का प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
Bhagat पूर्णसिंह का जन्म 4 जून 1904 को पंजाब के लुधियाना जिले के राजेवाल गांव में हुआ था। उनका बचपन अत्यंत संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में बीता। कम उम्र में ही पिता का साया सिर से उठ गया, जिससे परिवार आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों में घिर गया।
उनकी माता ने कठिन परिस्थितियों में उनका पालन-पोषण किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने पुत्र को दया, करुणा, सहानुभूति और सेवा जैसे मानवीय मूल्यों की शिक्षा दी। यही संस्कार आगे चलकर भगत पूर्णसिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान बने।
सेवा की भावना से शुरू हुआ जीवन का नया अध्याय
गरीबी और अभावों ने उन्हें जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराया। उन्होंने बहुत कम उम्र में समझ लिया था कि समाज में ऐसे लाखों लोग हैं जिन्हें केवल भोजन या आश्रय ही नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और सहारे की आवश्यकता है।
युवावस्था में भगत पूर्णसिंह ने समाज सेवा को ही अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। उन्होंने लाहौर स्थित गुरुद्वारा डेहरा साहिब में सेवा कार्य प्रारंभ किया। यहां वे बिना किसी वेतन या स्वार्थ के लोगों की सहायता करते थे।
गुरुद्वारे में आने वाले यात्रियों, जरूरतमंदों और रोगियों की सेवा करते हुए उन्होंने यह अनुभव किया कि सच्चा धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि मानवता की सेवा है। उनकी निस्वार्थ सेवा और समर्पण को देखकर लोग उन्हें सम्मानपूर्वक “भगत जी” कहकर पुकारने लगे।
उनकी पहचान धीरे-धीरे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बनने लगी जो किसी भी जरूरतमंद की सहायता के लिए हर समय तैयार रहता था।
प्यारासिंह की कहानी जिसने बदल दी पूरी जिंदगी
Bhagat पूर्णसिंह के जीवन में वर्ष 1924 एक निर्णायक मोड़ लेकर आया। इसी वर्ष एक चार वर्षीय गूंगे, बहरे और शारीरिक रूप से विकलांग बालक को उसके अभिभावक गुरुद्वारे में छोड़ गए।
उस समय कोई संस्था या व्यक्ति उस बच्चे की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं था। लेकिन भगत जी ने उस मासूम को अपने संरक्षण में लेने का निर्णय किया। उन्होंने उसका नाम प्यारासिंह रखा और उसकी सेवा को अपना दायित्व बना लिया।
यह घटना केवल एक बच्चे की सहायता तक सीमित नहीं रही। यही वह क्षण था जिसने भगत पूर्णसिंह को आजीवन मानव सेवा के मार्ग पर अग्रसर कर दिया। उन्होंने समझ लिया कि समाज में ऐसे असंख्य लोग हैं जिन्हें सहारे की आवश्यकता है।
सिख धर्म अपनाकर सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य
वर्ष 1932 में उन्होंने सिख धर्म को अपनाया और उनका नाम पूर्णसिंह रखा गया। उन्होंने जीवनभर अविवाहित रहने का निर्णय लिया ताकि उनका पूरा समय और ऊर्जा समाज सेवा को समर्पित रह सके।
उनका मानना था कि संपूर्ण मानवता ही उनका परिवार है। किसी भी धर्म, जाति, वर्ग या समुदाय से जुड़े व्यक्ति की सहायता करना उनका कर्तव्य था।
वे न केवल बीमारों और अपंगों की सेवा करते थे, बल्कि मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों को भी सम्मानजनक जीवन दिलाने के लिए निरंतर प्रयास करते थे।
भारत विभाजन और पिंगलवाड़ा की स्थापना
वर्ष 1947 में भारत विभाजन के दौरान लाखों लोग विस्थापित होकर पंजाब पहुंचे। शरणार्थी शिविरों में हजारों लोग भूख, बीमारी और असुरक्षा से जूझ रहे थे।
इन शिविरों में अनेक ऐसे लोग भी थे जो अनाथ, अपंग, मानसिक रूप से अस्वस्थ या लावारिस थे। जब शरणार्थी शिविर धीरे-धीरे बंद होने लगे तो इन लोगों के सामने जीवन का बड़ा संकट खड़ा हो गया।
ऐसे कठिन समय में भगत पूर्णसिंह ने एक खाली भवन में इन जरूरतमंद लोगों को आश्रय देना शुरू किया। यही छोटा प्रयास आगे चलकर “पिंगलवाड़ा” के रूप में विकसित हुआ।
शुरुआती दिनों में संसाधनों की भारी कमी थी। कई बार भगत जी स्वयं भीख मांगकर भोजन और दवाइयों की व्यवस्था करते थे। लेकिन उनकी निस्वार्थ सेवा से प्रभावित होकर समाज के लोग धीरे-धीरे सहयोग के लिए आगे आने लगे।
पिंगलवाड़ा मानवता का सबसे बड़ा आश्रय स्थल
आज पिंगलवाड़ा भारत की सबसे प्रतिष्ठित सेवा संस्थाओं में से एक माना जाता है। यहां हजारों अनाथ बच्चों, वृद्धों, दिव्यांगों, मानसिक रोगियों और बेसहारा लोगों को आश्रय, भोजन, चिकित्सा और सम्मानपूर्ण जीवन उपलब्ध कराया जाता है।
पिंगलवाड़ा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं किया जाता। हर व्यक्ति को परिवार के सदस्य की तरह अपनाया जाता है।
संस्था केवल आश्रय प्रदान नहीं करती, बल्कि लोगों को आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने की प्रेरणा भी देती है। यही कारण है कि पिंगलवाड़ा आज मानवता और सेवा का पर्याय बन चुका है।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति विशेष दृष्टिकोण
भगत पूर्णसिंह केवल समाजसेवी ही नहीं थे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के भी प्रबल समर्थक थे। उन्होंने बहुत पहले ही यह समझ लिया था कि प्रकृति और मानव जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
वे अनावश्यक वाहन उपयोग का विरोध करते थे और लोगों को पैदल चलने के लिए प्रेरित करते थे। स्वयं भी वे अक्सर रिक्शा चलाकर आवश्यक वस्तुएं लाते थे।
उनका मानना था कि स्वच्छ वातावरण, हरियाली और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी मानव सेवा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने वृक्षारोपण, स्वच्छता और पर्यावरण जागरूकता के लिए लगातार कार्य किया।
सादगीपूर्ण जीवन महानता की वास्तविक पहचान
भगत पूर्णसिंह का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था। उन्होंने कभी व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को महत्व नहीं दिया। साधारण वस्त्र, सरल भोजन और सेवा-केंद्रित जीवन उनकी पहचान थे।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि महानता धन, शक्ति या पद से नहीं आती, बल्कि दूसरों के दुख को कम करने के प्रयासों से प्राप्त होती है।
उनकी सादगी और विनम्रता ने उन्हें लोगों के बीच एक संत का दर्जा दिलाया। यही कारण है कि उन्हें प्रेमपूर्वक “पिंगलवाड़ा के संत” कहा जाता है।
पद्मश्री सम्मान और सेवा का आदर्श
भारत सरकार ने मानवता के प्रति उनके असाधारण योगदान को देखते हुए वर्ष 1981 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया।
हालांकि Bhagat पूर्णसिंह के लिए पुरस्कार और सम्मान कभी महत्वपूर्ण नहीं रहे। उनका विश्वास था कि सबसे बड़ा सम्मान जरूरतमंद व्यक्ति की मुस्कान और संतुष्टि है।
उन्होंने अपने पूरे जीवन में सेवा को ही सर्वोच्च धर्म माना और उसी मार्ग पर चलते रहे।
भगत पूर्णसिंह की विरासत और प्रेरणा
5 अगस्त 1992 को Bhagat पूर्णसिंह इस संसार से विदा हो गए, लेकिन उनके विचार, आदर्श और सेवा की परंपरा आज भी जीवित है।
पिंगलवाड़ा आज भी हजारों लोगों के जीवन में आशा का दीपक जलाए हुए है। उनकी प्रेरणा से अनेक सामाजिक संस्थाएं और स्वयंसेवक मानव सेवा के कार्यों में जुटे हुए हैं।
उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि किसी समाज की वास्तविक प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद लोगों के प्रति कितना संवेदनशील है।
Bhagat पूर्णसिंह जयंती का महत्व
Bhagat पूर्णसिंह जयंती केवल एक स्मृति दिवस नहीं है, बल्कि मानवता, करुणा और सेवा के मूल्यों को पुनर्जीवित करने का अवसर है।
इस दिन हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने आसपास मौजूद जरूरतमंद लोगों की सहायता करेंगे, समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करेंगे और मानवता के मार्ग पर आगे बढ़ेंगे।
यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सेवा और करुणा का थोड़ा-सा भी स्थान बना ले, तो समाज में अनेक समस्याओं का समाधान स्वत संभव हो सकता है।
पिंगलवाड़ा के संत Bhagat पूर्णसिंह भारतीय समाज के उन महान व्यक्तित्वों में से एक हैं जिन्होंने यह साबित किया कि निस्वार्थ सेवा ही सच्ची पूजा है। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानवता के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया और लाखों लोगों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर प्रदान किया।
आज उनकी जयंती पर हम सभी के लिए यह आवश्यक है कि उनके आदर्शों को केवल याद न करें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में भी उतारें। सेवा, करुणा, सहानुभूति और मानवता के मूल्य ही उनके जीवन का सार थे और यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।








