
चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम जिले में अब से निजी, सहायता‑प्राप्त और संबद्ध Schoolकी फीस मनमाने ढंग से तय नहीं हो सकेगी। जिला उपायुक्त श्री चंदन कुमार की अध्यक्षता में हाल ही में आयोजित बैठक में झारखण्ड शिक्षा न्यायाधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2017 के प्रावधानों के आधार पर निजी स्कूलों की फीस पर सख्त नियंत्रण और पारदर्शिता की व्यवस्था लागू की गई है।

इस बैठक में जिले के कुल 140 School के प्रधानाध्यापक शामिल हुए, जिससे यह साफ हो गया कि अब निजी स्कूलों की फीस मनमाने जुर्माने की तरह नहीं, बल्कि “नियम के खांचे में” रहेगी। इस लेख में हम आपको वही बताएंगे जो इस फैसले से अभिभावक, छात्र और स्कूल प्रबंधन के लिए मायने रखता है।
दो स्तर पर कैसे बनेगी फीस समिति?
उपायुक्त ने स्पष्ट किया कि फीस निर्धारण प्रक्रिया को दो स्तर – School और जिला – पर जवाबदेह बनाया जाएगा।
1. School स्तरीय फीस समिति
- प्रबंधन प्रतिनिधि
- प्राचार्य
- शिक्षक
- अभिभावकों का एक चुना हुआ प्रतिनिधि
इन सभी को शामिल करके School स्तरीय फीस समिति बनाई जाएगी, जो फीस तैयार करने से पहले खर्चों, सुविधाओं और इनकी जरूरतों पर चर्चा करेगी।
2. जिला स्तरीय समिति
जिला स्तर पर उपायुक्त की अध्यक्षता में एक विशेष समिति गठित होगी, जिसमें शामिल रहेंगे:
- शिक्षा विभाग
- परिवहन विभाग
- चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA)
- निजी विद्यालयों के प्राचार्य
- अभिभावकों के प्रतिनिधि
- सांसद और विधायक (क्षेत्र‑आधारित)
यह समिति बड़ी फीस‑वृद्धि, शिकायतों और गड़बड़ी की स्थिति में अंतिम फैसला लेगी।
School फीस निर्धारण के नियम अभिभावकों की चिंता घटेगी
उपायुक्त ने कई पारदर्शी और बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं, जिनका अर्थ सीधा‑सीधा है: फीस‑वृद्धि अब भागे‑भागे नहीं होगी।
- पिछले तीन वर्षों की फीस का ब्योरा – हर School को अपने पिछले तीन वर्षों की फीस संरचना, राजस्व और खर्चों का विवरण जिला समिति को जमा करना होगा। इससे पहले किसी भी नए फीस‑फॉर्मूले को मंजूरी नहीं मिलेगी।
- 10% से ज्यादा बढ़ोतरी पर जिला मंजूरी – अगर किसी School ने फीस में 10% से अधिक वृद्धि की सोची है, तो उसे जिला समिति की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। बिना मंजूरी ऐसी बढ़ोतरी “अवैध” मानी जाएगी।
- दो साल तक स्थिर फीस – एक बार निर्धारित फीस को दो वर्षों तक बदला नहीं जा सकता। इससे एक ही सेशन में कई बार फीस बढ़ाने की आदत टूटेगी।
- सूचना‑पट और वेबसाइट पर जानकारी – सभी स्कूलों को अपनी फीस‑संरचना, योगदान और जमा‑जमानत की जानकारी सूचना‑पट और विद्यालय/जिला वेबसाइट पर सार्वजनिक करनी होगी।
अभिभावकों पर ज़बरदस्ती रोक
अक्सर माता‑पिता को किसी खास दुकान, बुक‑स्टोर या यूनिफॉर्म‑शॉप से सामान खरीदने के लिए दबाव डाला जाता है। इसे अब दंडनीय कृत्य बना दिया गया है:
- किसी भी School परिसर या प्रशासनिक दबाव से पुस्तकें, यूनिफॉर्म या जूते किसी निश्चित दुकान से खरीदने के लिए बाध्य करना दंडनीय होगा।
- यूनिफॉर्म बदलाव – यूनिफॉर्म का डिज़ाइन या रंग हर साल बदलने का ज़ोर अब रुकेगा। यह परिवर्तन केवल 5 साल में एक बार और इसके लिए फीस‑समिति की सहमति जरूरी होगी।
- प्रतिवर्ष री‑एडमिशन फीस नहीं – हर साल छात्र को नई एडमिशन या री‑एडमिशन फीस देने की ज़रूरत नहीं रहेगी, जो अभिभावकों के लिए सीधी आर्थिक राहत है।
School नियम तोड़ने पर क्या होगा? – जुर्माना, जेब काटना और मान्यता रद्द
“सख्ती” का असली मतलब आपको अगले बिंदुओं से पता चल जाएगा।
- पहली गलती – 50 हजार से 2.5 लाख रुपए तक जुर्माना या अवैध तरीके से वसूले गए अतिरिक्त राशि का दोगुना दंड।
- दोबारा गलती – 1 लाख रुपए से अधिक का जुर्माना, जिसके दंड‑खजाने में “सीधी लगाम” लगेगी।
- गंभीर या दोहराया जाने वाला उल्लंघन – ऐसे Schoolके खिलाफ मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई की जा सकती है, जिससे पूरी संस्था के लिए भविष्य खतरे में पड़ जाएगा।

छात्रों के हक में बड़ा फैसला
फीस की बात आते ही अक्सर यह ज़रूरत भुला दी जाती है कि असली पीड़ित तो छात्र और उनका भविष्य होते हैं। इसलिए उपायुक्त ने खास बिंदु रखे:
- बकाया फीस वाले छात्रों को परीक्षा से वंचित नहीं किया जाएगा – यह आदेश सीधे‑सीधे छात्रों के अधिकार को बचाने के लिए है। बकाया रहने पर फीस वसूलने की योजना बन सकती है, लेकिन परीक्षा देने का उनका अधिकार छीना नहीं जा सकेगा।
- अभिभावक शिकायत सेल – जिला स्तर पर एक अलग शिकायत‑सेल (कोषांग) गठित होगा, जहां अभिभावक बिना डर के फीस, जुर्माना या शोषण से जुड़ी शिकायत दर्ज करा सकेंगे। यह सेल त्वरित निस्तारण के लिए जिम्मेदार होगा।








