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महाराष्ट्र का वो चाणक्य जिसने अंग्रेजों को धूल चटाई, निजाम को दी मात, मराठों को बुलंदी तक पहुंचाया

On: February 12, 2026 3:33 PM
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इतिहास के झरोखे से : मराठा साम्राज्य में एक चाणक्य हुए, जिन्होंने पेशवा गढ़े. जिन्होंने अंग्रेजों का सामना किया, टीपू सुल्तान से लोहा लिया और हैदराबाद के निजाम से भी. जरूरत पड़ने पर उनसे समझौते भी किए. उन चाणक्य का नाम है नाना फडणवीस.

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इतिहास इस बात का गवाह है कि चंद्रगुप्त को गढ़ने के लिए चाणक्य की जरूरत होती है. चंद्रगुप्त मौर्य को गढ़ने वाले चाणक्य को तो सब जानते हैं, पर मराठा साम्राज्य में भी एक चाणक्य हुए, जिन्होंने पेशवा गढ़े. जिन्होंने अंग्रेजों का सामना किया, टीपू सुल्तान से लोहा लिया और हैदराबाद के निजाम से भी. जरूरत पड़ने पर उनसे समझौते भी किए. उन चाणक्य का नाम है नाना फडणवीस.

नाना फडणवीस का जन्म 12 फरवरी 1742 को मराठा साम्राज्य के सतारा में हुआ था. उनके बचपन का नाम बालाजी जनार्दन भानु था. उनके परिवार का मराठा पेशवा बालाजी विश्वनाथ भट्ट से अच्छा संबंध था. नाना फडणवीस के दादा ने मुगलों द्वारा पेशवा की हत्या की कोशिश को नाकाम किया था. इसके कारण पेशवा ने मराठा सम्राट छत्रपति शाहूजी से उनको फडणवीस की उपाधि देने की सिफारिश की थी. आगे चलकर यह पेशवा के कार्यकाल में वित्त और प्रशासन का काम देखने वाले मंत्री के लिए एक उपाधि बन गई.

यह 1761 में हुई पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद की बात है. नाना मराठा साम्राज्य में ऊंचाई पर चढ़ने लगे थे. दरअसल, पानीपत के युद्ध में मराठा साम्राज्य बुरी तरह से चरमरा गया था. आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी थी. माहौल भी अच्छा नहीं था. तब पेशवा माधवराव का शासन था, जिन्हें नाना फडणवीस ने अपना सहारा दिया और शासन व्यवस्था को दुरुस्त करने में अहम भूमिका निभाई. उनकी देखरेख और सुझाव के चलते पेशवा ने धीरे-धीरे राजकोष को फिर से बहाल कर लिया. उसी समय मराठों की सेना ने हैदराबाद के निजाम पर विजय प्राप्त कर मराठा साम्राज्य के सम्मान और प्रतिष्ठा को फिर से कायम कर लिया, जिससे पानीपत के युद्ध में नुकसान पहुंचा था.

नवजात पेशवा की ओर से चलाते थे साम्राज्य

चौथे पेशवा माधवराव की मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई नारायण राव पेशवा बने. हालांकि, नारायण राव के चाचा रघुनाथ राव खुद पेशवा बनना चाहते थे, इसलिए साजिश के तहत नारायण राव की हत्या करवा दी. इसके बाद बहुत कम समय के लिए रघुनाथ राव पेशवा बने पर नाना फडणवीस को यह स्वीकार नहीं था.नारायण राव की हत्या के समय उनकी पत्नी गर्भवती थीं. उन्होंने जब बच्चे को जन्म दिया तो उसका नाम सवाई माधव राव रखा गया. इसके बाद नाना फडणवीस ने 12 सदस्यों वाली एक परिषद का गठन किया और नवजात सवाई माधव राव को पेशवा घोषित कर उनकी ओर से राज्य की कमान संभाल ली.

अंग्रेजों को संधि के लिए मजबूर किया था

रघुनाथ राव ने अंग्रेजों के साथ एक संधि पर बॉम्बे में हस्ताक्षर किया था, जिसे सूरत की संधि के नाम से जाना जाता है. इसके तहत रघुनाथ राव को अंग्रेजों ने सुरक्षा का भरोसा दिलाया था. चाणक्य बुद्धि के नाना फडणवीस ने ईस्ट इंडिया कंपनी की कलकत्ता काउंसिल के साथ दूसरी संधि कर ली, जिसके कारण रघुनाथ राव के साथ की गई संधि बेकार हो गई. नाना फडणवीस की इस संधि को 1776 की पुरंधर संधि के नाम से जाना जाता है. बाद में अंग्रेजों ने नाना फडणवीस को उनके पद से हटाने की कोशिश की तो साल 1777 में उन्होंने फ्रांसीसियों को पश्चिमी तट पर एक पोर्ट बनाने की अनुमति दे दी. इसके कारण अंग्रेजों ने पुणे पर हमला कर दिया और वडगांव की लड़ाई में मराठा सेना ने अंग्रेजों को हराकर वडगांव की संधि के लिए मजबूर कर दिया. इसके तहत 1773 तक मराठा साम्राज्य के जिस भी हिस्से पर अंग्रेजों ने कब्जा किया था, उसे लौटाना पड़ा.

कूटनीति में माहिर थे नाना फडणवीस

इसके बाद साल 1782 ईस्वी तक नाना फडणवीस ने अंग्रेजों की खिलाफत जारी रखी. फिर सालबाई की सन्धि हुई, जिसके तहत रघुनाथ राव को पेंशन जारी की गई और मराठों का अपनी जमीन पर कब्जा बना रहा. इसके बाद 1784 ईस्वी में नाना फडणवीस की अगुवाई में मराठों ने मैसूर के टीपू सुल्तान का मुकाबला कर कई ऐसे इलाके फिर से हासिल कर लिए, जिन पर टीपू ने कब्जा कर लिया था.

1789 ईस्वी में टीपू के खिलाफ उन्होंने अंग्रेजों और हैदराबाद के निजाम का साथ दिया और तीसरे मैसूर युद्ध में भी हिस्सा लिया. इससे मराठों को टीपू सुल्तान के राज्य का एक हिस्सा भी मिल गया था. इस तरह से अपने विवेक के बल पर नाना फडणवीस हर पक्ष से लड़ रहे थे तो मौके पर एक-दूसरे के साथ समझौता कर अपने पेशवा के साम्राज्य को और मजबूत बना रहे थे. उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ हैदराबाद के निजाम से समझौता किया तो मुगल शासक शाह आलम का भी साथ दिया. अपनी रणनीति के तहत नाना फडणवीस की अगुवाई में मराठों ने मुगल शासक की रक्षा भी की थी.

खरदा में हैदराबाद के निजाम को दी थी मात

फिर 11 मार्च 1795 को हुई खरदा (अब महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित) की लड़ाई को भला कैसे भुलाया जा सकता है. हैदराबाद के निजाम के साथ सालों से चल रही बातचीत का कोई हल नहीं निकला तो तत्कालीन निजाम मीर निजाम अली खान और मराठों की सेना आमने-सामने आ गईं. निजाम की भारी भरकम सेना का मुकाबला करने के लिए पेशवा सवाई माथव राव की अगुवाई में नाना फडणवीस ने सभी मराठा राज्यों को एक कर लिया. यह युद्ध होलकर, शिंदे, गायकवाड़ और भोंसले जैसे सभी मराठों ने मिलकर लड़ा और निजाम की सेना को बुरी तरह से पराजित किया था. इससे मराठों को निजाम का कुछ भूभाग और बड़ी राशि भी मिली थी.

निकोलो मैकियावेली से की जाती थी तुलना

हालांकि, 13 मार्च 1800 को नाना फडणवीस की मृत्यु के बाद ही मराठा साम्राज्य का पतन शुरू हो गया था. तब गवर्नर जनरल मार्कस वेलेजली ने आखिरी पेशवा बाजी राव द्वितीय को लिखा था, वह आपके राज्य के योग्य मंत्री थे, जिनके सिद्धांत ईमानदार और विचार सम्मान करने लायक थे. वह अपने वरिष्ठों (पेशवा की ओर संकेत) के साथ ही दूसरे राज्यों के प्रभुत्व और समृद्धि के लिए उत्साहित रहते थे.

ऐसे ही नाना फडणवीस की तुलना तब इटली के निकोलो मैकियावेली से की जाती थी. मैकियावेली को आधुनिक राजनीतिक विज्ञान का पिता कहा जाता है. 15वीं-16वीं सदी में जब यूरोप मध्यकाल सेJ आधुनिक काल की ओर बढ़ रहा था, तब मैकियावेली को सबसे बड़ा कूटनीतिज्ञ माना जाता था.

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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