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सिदो-कानू के वंशजों पर लाठीचार्ज: भोगनाडीह शहीद स्थल

On: July 1, 2025 10:37 PM
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संविधान, ग्रामसभा अधिकारों और शहीद सम्मान की खुली अवहेलना पर आदिवासी संगठनों में आक्रोश

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📍 साहिबगंज, झारखंड | 1 जुलाई 2025

झारखंड के साहिबगंज ज़िले के भोगनाडीह शहीद स्थल पर सिदो-कानू के वंशजों को श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित करने से रोके जाने और उनके ऊपर लाठीचार्ज किए जाने की घटना ने आदिवासी समाज और मानवाधिकार संगठनों के बीच गहरा रोष उत्पन्न कर दिया है। इस घटना को संवैधानिक अधिकारों, पेसा कानून और आदिवासी अस्मिता का सीधा उल्लंघन बताया जा रहा है।

🔴 घटना का विवरण:

दिनांक 29 जून 2025 को सिदो-कानू के वंशजों द्वारा पूर्व नियोजित श्रद्धांजलि एवं विचार गोष्ठी का आयोजन किया जाना था। इस आयोजन के लिए ग्रामसभा की विधिवत अनुमति भी प्राप्त की गई थी, क्योंकि साहिबगंज जिला पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहाँ ग्रामसभा को सर्वोच्च अधिकार प्राप्त होते हैं।

परंतु जब सिदो-कानू के वंशज श्रद्धांजलि अर्पित करने भोगनाडीह पहुंचे, तो प्रशासनिक हस्तक्षेप के चलते उन्हें स्थल पर प्रवेश करने से रोका गया और उन पर लाठीचार्ज किया गया। यह स्थिति न केवल शहीदों की स्मृति और सम्मान का अपमान है, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना का भी गंभीर उल्लंघन है।

📍 प्रशासन की भूमिका पर सवाल:

  • यह घटना तब घटी जब 29 जून को कोई सरकारी कार्यक्रम निर्धारित नहीं था।
  • अन्य जिलों जैसे सरायकेला-खरसावां और चाईबासा में राजनीतिक दलों और संगठनों को शहीद दिवस पर सरकारी समन्वय से कार्यक्रम करने की अनुमति दी जाती है।
  • परंतु भोगनाडीह में वंशजों को ही रोका गया, जिससे प्रशासन की भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली और राजनीतिक दबाव में लिया गया निर्णय उजागर होता है।

⚖️ संवैधानिक एवं कानूनी पक्ष:

  • यह क्षेत्र पेसा अधिनियम के अधीन आता है, जहां ग्रामसभा की सहमति सर्वोपरि मानी जाती है।
  • इसके बावजूद, ग्रामसभा की अनुमति होने के बावजूद कार्यक्रम रोका जाना और बल प्रयोग किया जाना संविधान की पांचवीं अनुसूची एवं मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है।

प्रमुख मांगें:

पीड़ितों और सामाजिक संगठनों द्वारा राज्य सरकार से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:

  1. घटना की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
  2. दोषी प्रशासनिक अधिकारियों पर तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
  3. शहीद वंशजों को मानवाधिकार संरक्षण और न्याय प्रदान किया जाए।
  4. भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएं।

📢 समाज में उबाल, आदिवासी अस्मिता पर चोट

सामाजिक कार्यकर्ताओं और आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह घटना केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, गौरव और संवैधानिक अधिकारों पर सीधी चोट है। सिदो-कानू जैसे देश के स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के साथ ऐसा व्यवहार शर्मनाक है।

📝 निष्कर्ष:

भोगनाडीह की यह घटना न केवल प्रशासन की संवेदनहीनता दर्शाती है, बल्कि झारखंड की आदिवासी अस्मिता, संविधानिक संरचना और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। अब राज्य सरकार की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह शहीदों के वंशजों के सम्मान की रक्षा करे और दोषियों पर त्वरित एवं सख्त कार्रवाई कर जनविश्वास बहाल करे।

“शहीदों का सम्मान केवल माल्यार्पण से नहीं, बल्कि उनके वंशजों के अधिकारों की रक्षा से होता है।”

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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