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अगर देश में सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो…! – निशिकांत ठाकुर

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On: May 31, 2025 9:15 PM
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Article Law and Order : भारत का संविधान एक अनुपम ग्रंथ है, जिसे देश के महान कानूनविदों ने आज़ादी के बाद बेहद कठिन परिस्थितियों में तैयार किया था। उन्होंने न सिर्फ देश के कोने-कोने का निरीक्षण किया, बल्कि वैश्विक विधानों का भी गहराई से अध्ययन कर एक ऐसे संविधान की रचना की, जिस पर आज भी हर भारतीय को गर्व है। इस संविधान की रक्षा और न्याय की अंतिम गारंटी सुप्रीम कोर्ट है, जो जनहित और देशहित में अहम फैसले देकर लोकतंत्र की नींव को मज़बूत करता है।

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🧑‍⚖️ न्यायपालिका: समाज का अंतिम विश्वास

देश में चाहे कोई कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, संविधान के दायरे में सुप्रीम कोर्ट उसे न्याय के कटघरे में खड़ा कर सकता है। यह संस्था न सिर्फ पीड़ित को न्याय दिलाती है बल्कि अत्याचारियों को सबूतों के आधार पर दंड भी देती है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले देश की दिशा तय करते हैं और यह विश्वास बरकरार रखते हैं कि “न्याय ही सर्वोच्च है”।

🛑 शरणार्थियों पर ऐतिहासिक टिप्पणी

हाल में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आगाह करते हुए कहा कि “भारत दुनियाभर के शरणार्थियों का धर्मशाला नहीं है”। कोर्ट का यह कहना इसलिए भी अहम है क्योंकि भारत में अभी भी करोड़ों लोग मुफ्त राशन और रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहीं लाखों घुसपैठिए देश में रहकर संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख देश के सामाजिक और आर्थिक संतुलन के लिए निर्णायक माना जा रहा है।

🕌 वक्फ बोर्ड कानून पर बहस

सुप्रीम कोर्ट में इस्लामी वक्फ बोर्ड से जुड़ा मामला भी चर्चा का विषय बना हुआ है। याचिकाकर्ताओं ने वक्फ कानून पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है, जिसे संविधान के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है। अभी इस मामले पर बहस जारी है और इसका निर्णय धार्मिक संपत्ति के प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्था पर असर डाल सकता है।

🧠 कोटा में छात्र आत्महत्याओं पर कोर्ट की सख्ती

देश के प्रमुख कोचिंग हब कोटा में छात्रों की रहस्यमय आत्महत्याओं पर भी सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। अदालत ने राजस्थान सरकार से जवाब मांगा है कि छात्रों के इस मानसिक दबाव और आत्मघाती प्रवृत्ति को रोकने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए हैं।

🚨 ईडी की कार्यशैली पर भी उठे सवाल

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाइयों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की। हाल में तमिलनाडु में शराब दुकान लाइसेंस से जुड़े एक मामले में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। इस दौरान कोर्ट ने संकेत दिया कि दंड का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। दंड का उद्देश्य अनुशासन और मर्यादा बनाए रखना है, भय का वातावरण नहीं बनाना।

⚖️ न्याय ही सर्वोच्च है

महाभारत के युधिष्ठिर ने भी कहा था कि यदि लोक में दंड न हो, तो बलवान दुर्बलों को निगल जाएंगे। लेकिन जब यही दंड गलत हाथों में चला जाए, तो व्यवस्था टूट सकती है। सुप्रीम कोर्ट का हर फैसला इस संतुलन को बनाए रखने की दिशा में होता है।

भारत में यदि सुप्रीम कोर्ट न होता, तो संविधान की आत्मा खो जाती। यह संस्था आज भी उस लौ की तरह जल रही है, जो न्याय, अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करती है। सरकारें बदलती हैं, नीतियां बनती हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ही वह स्तंभ है, जिस पर देश का लोकतांत्रिक ढांचा टिका हुआ है। इसीलिए, उसका अस्तित्व और निष्पक्षता दोनों ही अनमोल हैं।

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📌 भारतीय संविधान और भारतीय कानून व्यवस्था पर विचार रखने वाले लेखक निशिकांत ठाकुर एक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं, आइये उनके जादुई कलम से उनके विचारों को समझने का प्रयास करते है –

लेखक की कलम से,

भारतीय संविधान के लिए गठित सभा में कानून के लगभग सभी उद्भट विद्वान शामिल थे, जिन्हें डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व द्वारा देखा जा रहा था। कोई कल्पना कर सकता है कि आजादी के बाद देश में न तो सड़कों का विस्तार हुआ, न ही रेलवे का जाल बिछा था, लेकिन उन महान कानूनविदों ने देश के कोने-कोने का निरीक्षण कर उन्हें एक सूत्र में गूंथकर एक माला की शक्ल में संविधान का रूप दिया। चाहे कोई कुछ भी कहे, चाहे वेदों से, उपनिषदों से, चाहे ब्रिटिश नियम और संविधान को या विश्व के किसी नियम-कानून को पढ़कर बनाया गया हो, वह एक नजीर है और उस ग्रन्थ को सोचकर आज भी अपना मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है। यह भी ठीक है कि जिन्होंने समय, काल तथा परिस्थितियों के अनुसार उस ग्रन्थ को नहीं पढ़ा और न ही सोचा, उन्हें तो यह अधिकार है कि वे उनमें कमियां गिनाए, लेकिन उनके निर्माताओं के लिए कल्पना करके उन्हें नमन करने के लिए सिर स्वत: झुक जाता है।

अब थोड़ा भारतीय न्यायपालिका को समझने का प्रयास करते हैं। देश में कोई कितना ही बलशाली, बाहुबली हो, कितना भी बड़ा अत्याचारी हो, संविधान प्रदत्त अधिकारों द्वारा न्यायालय सच या झूठ का सबूतों के आधार पर निर्णय देकर उसे सही रास्ते पर चलने का अवसर देता है और पीड़ित को न्याय दिलाता है। यही अब तक समाज का विश्वास है और आगे भी ऐसा ही रहेगा। कुछ खामियां यदाकदा रह जाती हैं, लेकिन वह मानवीय भूल है, जिसे ऊपरी अदालत पहुंचने पर ठीक कर लिया जाता है। अब यदि बात करें सुप्रीम कोर्ट के जनहित, देशहित के लिए उसके अहम फैसले को जिसे देश सिर माथे पर लेता है। ऐसा इसलिए भी, क्योंकि संविधान की रक्षा का दायित्व तो उसी पर डाला गया है। राजनीति के लिए तो हर चीज में राजनीतिज्ञ अपना हित साधना चाहते हैं, लेकिन देश की न्यायिक व्यवस्था और संविधान का रक्षक सर्वोच्च न्यायालय को ही माना जाता है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि देश का विश्वास है कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला जनहित और देशहित में ही लिया गया है।

इस बीच सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जो कुछ ताबड़तोड़ फैसले लिए गए, उनके अहम फैसले में एक यह भी है कि उसने सरकार को चेताया है कि ‘भारत दुनियाभर के शरणार्थियों के लिए धर्मशाला नहीं है।’ जहां हमारे देश में आज भी अस्सी करोड़ लोग मुफ्त के सरकारी राशन पाने के लिए लाइन में लगते हैं, जहां बेरोजगारों की कतारें नजर आती हैं, वहां लाखों घुसपैठिये आज भी भारत में शरणार्थी बनकर देश के युवाओं से उनका रोजगार छीनकर, जहां के किसान अपना ऋण चुकाने के लिए आत्महत्या करते रहते हैं, उन्हें हम अपने भारत में किस तरह पनाह दे रहे हैं? सोचिए, अभी हाल-फिलहाल में अमेरिका जैसा सम्पन्न राष्ट्र अपने देश में गैर कानूनी रूप में घुसे अप्रवासी भारतीयों के हाथ-पैर में बेड़ियां डालकर वापस विभिन्न देशों सहित भारत को वापस लौटा रहा है। ऐसे अवैध रूप से भारत में रह रहे शरणार्थियों को क्यों नहीं वापस भेजा जा सकता है? यह बड़ी गंभीर समस्या है, जिस पर सरकार को विचार करना ही पड़ेगा, अन्यथा एक दिन देश विदेशी शरणार्थियों से भरा पड़ा होगा और भारतीय सड़क पर होंगे। यह सत्य है कि भारत कोई भी अमानवीय कार्य नहीं करता; क्योंकि मानवीयता के आगे वह झुक जाता है। अतः कोई न कोई रास्ता तो शीर्ष पर बैठे संचालकों को निकालना ही पड़ेगा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सर्वमान्य होना चाहिए और सरकार को इसके लिए कदम उठाने चाहिए।

इसी तरह इस्लामी वक्फ बोर्ड का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जो प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई और अगस्तिन जॉर्ज मसीह के पास है तथा उस पर देश के प्रसिद्ध सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सरकार की ओर से अपना पक्ष रख रहे हैं । पिछले सप्ताह याचिकाकर्ताओं ने कानून पर अंतरिम रोक लगाने की मांग करते हुए कहा था कि यह कानून वक्फ संपत्तियों पर कब्जा करने वाला है। इस कानून में मुसलमानों की अपनी धार्मिक संपत्ति का प्रबंधन करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है। अभी इस पर बहस होती रहेगी। देशभर में छात्रों द्वारा किए जा रहे रहस्यमय आत्महत्या के लिए विशेषकर राजस्थान सरकार से कोर्ट ने पूछा। और इसी वर्ष कोटा शहर में, जहां छात्र अपने उज्वल भविष्य की आशा से जाते हैं, वहां 14 छात्रों द्वारा की गई आत्महत्या के लिए भी राजस्थान सरकार को कटघरे में खड़ा किया कि इस पर सरकार ने क्या चिंतन किया?

लेकिन, एक अहम मुद्दा जिस पर सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस बीआर गवई और एजी मसीह की अदालत ने अपना फैसला दिया। आज देश के हर हिस्से में ईडी (प्रवर्तन निदेशक/निर्देशालय) के नाम से हर कोई परिचित हो गया है, क्योंकि उसका आतंक इतना हो गया है कि कोई भी उसके नाम से ही डरकर अपनी इज्जत बचाने में लग जाता है। उसका कानून इतना सख्त बना दिया गया है कि उसके चंगुल में यदि कोई फंस गया, तो उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है। वैसे अपराधियों को दंड देना अपने वैदिक काल से ही होता रहा है, लेकिन देश में आज जिस प्रकार का खौफ ईडी ने बना दिया है, वह चिंतित करने वाला है। युधिष्ठिर ने अर्जुन को बहुत कुछ दंड के विधान के लिए कहा है। उन्होंने दंड को व्याख्यायित करते हुए कहा है कि लोगों को अपने-अपने नियम पर चलने, धन की रक्षा के निमित्त संसार में मनीषियों ने जो मर्यादा स्थापित की है, उसी का नाम दंड है। यदि लोक में दंड की सत्ता न हो, तो सारी प्रजा नष्ट हो जाएगी।

बलवान दुर्बलों को इस प्रकार खा जाएंगे, जैसे जल में बड़ी मछली छोटी मछली को। लेकिन, जब उस दंड का गलत उपयोग किया जाने लगे, तो उस सत्ता को नष्ट होने से कोई रोक नहीं सकता। ईडी का इस बीच इसी प्रकार के छापे से आजिज आकर संभवतः उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया हो। वैसे, कोर्ट ने शराब की दुकानों के लाइसेंस देने में कथित भ्रष्टाचार को लेकर तमिलनाडु सरकार और राज्य विपणन निगम की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान यह फैसला दिया। राज्य सरकार और निगम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। जो भी हो, न्याय ही सर्वोच्च है, जिसे दंड का अर्थ गलत रास्ते पर चलने से रोकने के लिए ही निर्धारित किया गया है। हर युग में दंड का प्रावधान रहा है। आज भी है और भविष्य में भी रहेगा। अतः न्याय का उल्लंघन करने वाले सावधान रहें।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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