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Dubil माइंस के आंदोलनरत ग्रामीणों से मिली सांसद जोबा माझी समाधान का दिया आश्वासन

On: July 5, 2026 8:41 PM
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मनोहरपुर: चिरिया क्षेत्र अंतर्गत Dubil माइंस के मुख्य गेट के समक्ष पिछले दस दिनों से अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलनरत ग्रामीणों से रविवार को सिंहभूम की सांसद जोबा माझी ने मुलाकात की। इस दौरान सांसद ने आंदोलन कर रहे ग्रामीणों की समस्याओं को गंभीरता से सुना, उनकी मांगों से संबंधित ज्ञापन प्राप्त किया और समाधान की दिशा में पहल का आश्वासन दिया। करीब एक घंटे तक चली वार्ता में सांसद ने ग्रामीणों की बातों को विस्तार से समझा और भरोसा दिलाया कि उनकी समस्याओं के समाधान के लिए जल्द ही त्रिपक्षीय वार्ता आयोजित की जाएगी। इस वार्ता में सांसद स्वयं, माइंस प्रबंधन के प्रतिनिधि और ग्रामीण शामिल होंगे, ताकि मांगों पर सकारात्मक और ठोस निर्णय लिया जा सके।

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ग्रामीणों ने सांसद के समक्ष अपनी प्रमुख मांगों को रखते हुए स्पष्ट कहा कि यदि उनकी समस्याओं पर सहानुभूतिपूर्वक और गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आंदोलन आगे भी जारी रहेगा। सांसद की मौजूदगी में हुई चर्चा के बाद इस बात पर सहमति बनी कि अब जल्द ही माइंस प्रबंधन, ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों के बीच त्रिपक्षीय बैठक कर समाधान का रास्ता निकाला जाएगा। सांसद जोबा माझी की यह पहल आंदोलनरत ग्रामीणों के लिए एक महत्वपूर्ण उम्मीद के रूप में देखी जा रही है।

दस दिनों से आंदोलन पर डटे हैं दुबिल गांव के ग्रामीण

दुबिल माइंस से जुड़े स्थानीय ग्रामीण पिछले करीब दस दिनों से आंदोलन कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि माइंस क्षेत्र से उनका गांव प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित है, लेकिन इसके बावजूद स्थानीय लोगों को रोजगार, बुनियादी सुविधाएं और मुआवजे जैसे मामलों में अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी जा रही है। इसी नाराजगी और लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर ग्रामीण माइंस के मुख्य गेट के सामने तंबू गाड़कर धरने पर बैठ गए हैं

ग्रामीणों का कहना है कि वे कई बार अपनी मांगों को संबंधित अधिकारियों और माइंस प्रबंधन के सामने रख चुके हैं, लेकिन अब तक उनकी समस्याओं के समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। यही कारण है कि उन्हें आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ा। आंदोलन के चलते माइंस परिसर के बाहर लगातार ग्रामीणों की मौजूदगी बनी हुई है और गांव के महिला-पुरुष, युवा और बुजुर्ग सभी इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हैं।

आंदोलनरत ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल रोजगार की लड़ाई नहीं है, बल्कि उनके हक, सम्मान और गांव के विकास से जुड़ा मुद्दा है। वे चाहते हैं कि जिस माइंस से क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधि और आर्थिक लाभ हो रहा है, उसका सीधा लाभ सबसे पहले प्रभावित गांव और स्थानीय लोगों को मिले।

सांसद जोबा माझी ने सुनी ग्रामीणों की समस्याएं, लिया ज्ञापन

रविवार को आंदोलन स्थल पर पहुंचीं सांसद जोबा माझी का ग्रामीणों ने स्वागत किया और अपनी समस्याओं से संबंधित ज्ञापन उन्हें सौंपा। सांसद ने ग्रामीणों के बीच बैठकर उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुना। ग्रामीणों ने एक-एक कर अपनी मांगों, माइंस से जुड़े प्रभावों और अब तक हुई अनदेखी की जानकारी सांसद को दी।

करीब एक घंटे तक चली बातचीत के दौरान सांसद ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से लिया जाएगा और संबंधित पक्षों से बात कर समाधान की दिशा में पहल की जाएगी। सांसद ने यह भी समझने की कोशिश की कि किन मांगों पर तत्काल निर्णय संभव है और किन मुद्दों पर प्रबंधन के साथ विस्तृत चर्चा की आवश्यकता होगी।

ग्रामीणों की ओर से सांसद को दिए गए ज्ञापन में रोजगार, मुआवजा और पेयजल जैसी प्रमुख मांगों को प्रमुखता से रखा गया। सांसद ने कहा कि प्रभावित ग्रामीणों की समस्याएं जायज हैं और इन्हें अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने आश्वस्त किया कि बातचीत के जरिए समाधान का रास्ता निकालने का हर संभव प्रयास किया जाएगा।

त्रिपक्षीय वार्ता से निकलेगा समाधान का रास्ता

सांसद जोबा माझी और ग्रामीणों के बीच हुई बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि अब जल्द ही त्रिपक्षीय वार्ता आयोजित की जाएगी। इस वार्ता में सांसद जोबा माझी, दुबिल माइंस प्रबंधन के प्रतिनिधि और आंदोलनरत ग्रामीण एक साथ बैठेंगे। उद्देश्य यह होगा कि ग्रामीणों की मांगों को सामने रखकर उन पर व्यावहारिक और समयबद्ध समाधान निकाला जाए।

ग्रामीणों का मानना है कि अब तक उनकी बात प्रबंधन तक सही तरीके से नहीं पहुंच पाई थी या उसे गंभीरता से नहीं लिया गया। ऐसे में सांसद की मौजूदगी में होने वाली त्रिपक्षीय वार्ता से उन्हें उम्मीद है कि उनकी आवाज को उचित महत्व मिलेगा और समाधान की दिशा में ठोस पहल होगी।

यह भी सहमति बनी कि त्रिपक्षीय वार्ता के बाद ही आंदोलन की आगे की रणनीति तय की जाएगी। यदि बैठक में मांगों पर सकारात्मक निर्णय लिया जाता है, तो आंदोलन समाप्त करने पर विचार किया जा सकता है। वहीं यदि मांगों को फिर टालने की कोशिश की गई, तो ग्रामीण आंदोलन को और तेज करने का निर्णय ले सकते हैं। इस तरह अब पूरे मामले में अगला महत्वपूर्ण पड़ाव प्रस्तावित त्रिपक्षीय बैठक होगी।

स्थानीय बेरोजगारों को माइंस में प्राथमिकता देने की प्रमुख मांग

ग्रामीणों की सबसे प्रमुख मांगों में से एक है कि दुबिल गांव के स्थानीय बेरोजगार युवाओं को दुबिल माइंस में रोजगार में प्राथमिकता दी जाए। ग्रामीणों का कहना है कि माइंस उनके गांव के आसपास संचालित हो रही है, गांव के लोग इसके प्रत्यक्ष प्रभाव को झेल रहे हैं, लेकिन रोजगार के अवसरों में स्थानीय लोगों की उपेक्षा की जा रही है।

ग्रामीणों ने मांग रखी है कि गांव के करीब 200 युवक-युवतियों को माइंस में रोजगार दिया जाए। उनका कहना है कि यदि उद्योग और खनन परियोजनाएं स्थानीय संसाधनों और भूमि का उपयोग कर रही हैं, तो सबसे पहले वहां के युवाओं को रोजगार मिलना चाहिए। इससे न केवल बेरोजगारी कम होगी, बल्कि स्थानीय परिवारों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी।

आंदोलनकारियों का कहना है कि रोजगार केवल दया का विषय नहीं, बल्कि उनका अधिकार है। गांव के अनेक युवा पढ़े-लिखे हैं, कुछ तकनीकी रूप से प्रशिक्षित भी हैं, लेकिन उन्हें काम का अवसर नहीं मिल रहा। ग्रामीण चाहते हैं कि माइंस प्रबंधन रोजगार नीति में स्थानीयता को प्राथमिकता दे और प्रभावित परिवारों के युवाओं को नौकरी देकर सामाजिक दायित्व निभाए।

माइंस से प्रभावित बंजर जमीन का खतियान के आधार पर मुआवजा देने की मांग

ग्रामीणों की दूसरी महत्वपूर्ण मांग दुबिल गांव की माइंस से प्रभावित बंजर जमीन का मुआवजा है। ग्रामीणों का कहना है कि माइंस गतिविधियों से गांव की कई जमीनें प्रभावित हुई हैं और लोगों को नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में प्रभावित जमीन का खतियान के आधार पर उचित मुआवजा दिया जाना चाहिए।

ग्रामीणों का आरोप है कि लंबे समय से इस मुद्दे पर स्पष्ट पहल नहीं हुई है। कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी जमीनें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से माइंस गतिविधियों से प्रभावित हुई हैं, लेकिन उन्हें अब तक न्यायोचित मुआवजा नहीं मिल पाया। ग्रामीण चाहते हैं कि जमीन से जुड़े रिकॉर्ड और खतियान के आधार पर पारदर्शी तरीके से मुआवजे की प्रक्रिया पूरी की जाए, ताकि प्रभावित परिवारों को आर्थिक राहत मिल सके।

यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्रामीणों के लिए जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि आजीविका का आधार होती है। यदि जमीन खनन गतिविधियों से प्रभावित होती है, तो उसके बदले उचित मुआवजा और पुनर्वास जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हो जाती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक इस मुद्दे का समाधान नहीं होगा, तब तक आंदोलन की जरूरत बनी रहेगी।

Dubil गांव में 8 चापाकलों पर सौर ऊर्जा से जलमीनार स्थापित करने की मांग

आंदोलनरत ग्रामीणों की मांगों में पेयजल सुविधा भी प्रमुख रूप से शामिल है। ग्रामीणों ने मांग की है कि दुबिल गांव में कुल 8 चापाकलों पर सौर ऊर्जा आधारित जलमीनार स्थापित की जाए। उनका कहना है कि गांव में पेयजल की समस्या लंबे समय से बनी हुई है और गर्मी के दिनों में स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।

ग्रामीणों का मानना है कि माइंस क्षेत्र में उद्योग और संसाधनों का उपयोग हो रहा है, ऐसे में आसपास के प्रभावित गांवों को बुनियादी सुविधाएं मिलना उनका अधिकार है। यदि गांव में सौर ऊर्जा से संचालित जलमीनार लगाई जाती है, तो इससे लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होगा और महिलाओं, बच्चों तथा बुजुर्गों को पानी के लिए होने वाली परेशानियों से राहत मिलेगी।

ग्रामीणों का कहना है कि विकास केवल खनन या उत्पादन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रभावित गांवों के जीवनस्तर को बेहतर बनाने की दिशा में भी ठोस कार्य होने चाहिए। पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा पर जोर इसी सोच को दर्शाता है।

आंदोलन से माइंस में खनन और अन्य कार्य प्रभावित

ग्रामीणों का आंदोलन अब केवल प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका असर दुबिल माइंस के संचालन पर भी पड़ने लगा है। ग्रामीण माइंस के मुख्य गेट के सामने धरना देकर बैठे हैं, जिसके कारण माइंस में खनन समेत अन्य कार्य बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

सूत्रों के अनुसार, माइंस के नियमित संचालन, सामग्री की आवाजाही और श्रमिकों के प्रवेश-निकास पर आंदोलन का असर देखा जा रहा है। हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि उनका उद्देश्य अनावश्यक बाधा उत्पन्न करना नहीं, बल्कि अपनी बात को मजबूती से रखना है, क्योंकि बार-बार निवेदन के बावजूद जब सुनवाई नहीं हुई, तो उन्हें आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ा।

माइंस जैसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान के लिए संचालन में बाधा आर्थिक और प्रशासनिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि यदि जल्द समाधान नहीं निकला, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। यही वजह है कि सांसद की पहल पर होने वाली त्रिपक्षीय वार्ता को काफी अहम माना जा रहा है।

ग्रामीणों ने साफ कहा मांगों पर गंभीर विचार नहीं हुआ तो आंदोलन जारी रहेगा

सांसद जोबा माझी के साथ हुई बातचीत के दौरान ग्रामीणों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक और गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आंदोलन जारी रहेगा। ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं और अब बिना ठोस आश्वासन या निर्णय के पीछे हटना उनके लिए संभव नहीं है।

ग्रामीणों ने यह भी कहा कि वे किसी टकराव की स्थिति नहीं चाहते, लेकिन यदि स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार, प्रभावित जमीन का मुआवजा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे पर प्रबंधन गंभीर नहीं हुआ, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जा सकता है।

आंदोलन में शामिल लोगों का कहना है कि यह संघर्ष किसी एक व्यक्ति या परिवार का नहीं, बल्कि पूरे गांव के भविष्य का सवाल है। इसलिए वे एकजुट होकर अपनी मांगों को पूरा कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

ग्राम प्रतिनिधियों और ग्रामीणों की रही सक्रिय मौजूदगी

आंदोलन स्थल पर सांसद के आगमन के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। इस दौरान ग्राम मुंडा रामलाल चांपिया, दुलाल आइन्द, गुरा मुर्मू, निशा आईंद, सुनील हांसदा समेत कई आंदोलनरत ग्रामीण उपस्थित थे। इन लोगों ने सांसद के समक्ष गांव की स्थिति, आंदोलन की पृष्ठभूमि और मांगों के महत्व को विस्तार से रखा।

ग्रामीण प्रतिनिधियों ने कहा कि गांव के लोग एकजुट होकर अपनी जायज मांगों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें उम्मीद है कि जनप्रतिनिधियों की पहल से अब इस मामले का सकारात्मक समाधान निकलेगा। आंदोलन में महिलाओं और युवाओं की भागीदारी भी इस बात का संकेत है कि यह मुद्दा गांव के व्यापक हितों से जुड़ा हुआ है।

जनप्रतिनिधि की पहल से जगी उम्मीद, अब त्रिपक्षीय बैठक पर टिकी नजरें

Dubil माइंस विवाद और ग्रामीणों के आंदोलन के बीच सांसद जोबा माझी की पहल ने एक नई उम्मीद जगाई है। आंदोलनरत ग्रामीण अब इस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं कि प्रस्तावित त्रिपक्षीय बैठक कब होती है और उसमें उनकी मांगों पर क्या निर्णय निकलता है।

यदि बैठक में स्थानीय युवाओं को रोजगार, प्रभावित जमीन का मुआवजा और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं पर सकारात्मक सहमति बनती है, तो यह न केवल दुबिल गांव के लिए राहत की बात होगी, बल्कि माइंस प्रभावित क्षेत्रों में जनसुनवाई और सामाजिक जिम्मेदारी के बेहतर मॉडल के रूप में भी देखा जाएगा।

फिलहाल दुबिल माइंस के सामने आंदोलन जारी है, लेकिन सांसद की पहल के बाद समाधान की उम्मीद पहले से अधिक मजबूत हुई है। अब सबकी नजरें उस त्रिपक्षीय वार्ता पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि दुबिल गांव के ग्रामीणों की लड़ाई को कितना न्याय मिलता है और माइंस प्रबंधन उनकी मांगों पर कितना संवेदनशील रुख अपनाता है।

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