
जमशेदपुर: ख्यातिलब्ध पंडवानी गायिका, पद्म विभूषण सम्मान से अलंकृत लोककला की महान साधिका Teejan Bai के निधन पर जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने अपने शोक संदेश में कहा कि तीजनबाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोकगायन परंपरा, विशेषकर पंडवानी गायिकी के लिए एक ऐसी अपूरणीय क्षति है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती। सरयू राय ने कहा कि तीजनबाई ने अपनी असाधारण प्रतिभा, कठिन साधना और वर्षों की अथक मेहनत से पंडवानी जैसी लोकगायन विधा को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाई और उसे जन-जन तक पहुंचाया।

उन्होंने कहा कि तीजनबाई ने केवल स्वयं एक ऊंचा मुकाम हासिल नहीं किया, बल्कि उन्होंने पंडवानी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए अनेक गायक-गायिकाओं को तैयार भी किया। यही वजह है कि आज भी पंडवानी की यह विधा जीवित है और नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। सरयू राय ने अपने संदेश में तीजनबाई के सांस्कृतिक योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके जाने से लोककला की दुनिया में एक ऐसा शून्य पैदा हो गया है, जिसे भर पाना बेहद कठिन होगा।
पंडवानी गायिकी को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाली असाधारण कलाकार थीं तीजनबाई
विधायक सरयू राय ने अपने शोक संदेश में कहा कि तीजनबाई ने पंडवानी गायिकी को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया, वह अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। पंडवानी केवल एक लोकगायन शैली नहीं, बल्कि महाभारत की कथाओं, लोकभाषा, अभिनय, संगीत और भावाभिव्यक्ति का अद्भुत संगम है। इस विधा को जनप्रिय बनाने और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में तीजनबाई की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।
उन्होंने ऐसे समय में पंडवानी को नई पहचान दी, जब लोककलाओं को अक्सर सीमित दायरे में देखा जाता था। तीजनबाई ने अपनी सशक्त आवाज, प्रभावशाली प्रस्तुति, गहरी संवेदना और मंचीय ऊर्जा के बल पर इस लोकगायन शैली को न केवल गांव-देहात से बाहर निकाला, बल्कि बड़े सांस्कृतिक मंचों तक स्थापित किया। सरयू राय ने कहा कि यह तीजनबाई की साधना और समर्पण का ही परिणाम है कि पंडवानी आज भारतीय लोककला की एक विशिष्ट पहचान बन चुकी है।
वर्षों की मेहनत से तैयार की नई पीढ़ी, कला को जीवित रखने में निभाई बड़ी भूमिका
सरयू राय ने अपने संदेश में यह भी रेखांकित किया कि तीजनबाई की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह रही कि उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक पंडवानी गायक-गायिकाओं को तैयार किया। उन्होंने केवल एकल कलाकार के रूप में नाम नहीं कमाया, बल्कि अपनी कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया। आज देश के विभिन्न हिस्सों में जो कलाकार पंडवानी गायन कर रहे हैं, उनमें से अनेक किसी न किसी रूप में तीजनबाई की प्रेरणा, परंपरा और प्रशिक्षण से जुड़े रहे हैं।
यह किसी भी बड़े कलाकार की पहचान होती है कि वह अपनी कला को केवल अपने तक सीमित न रखे, बल्कि उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाए। तीजनबाई ने यही काम किया। उन्होंने पंडवानी को मंच पर लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ उसके कलाकारों की नई पौध भी तैयार की। यही कारण है कि उनके निधन के बाद शोक के साथ-साथ उनके योगदान के प्रति सम्मान का भाव भी और अधिक गहरा हो गया है। सरयू राय ने कहा कि तीजनबाई की मेहनत और प्रशिक्षण की बदौलत ही आज भी पंडवानी की परंपरा जीवित है और अनेक कलाकार इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
2022 के रांची पर्यावरण मेले में छोड़ी थी गहरी छाप
अपने शोक संदेश में विधायक सरयू राय ने वर्ष 2022 में रांची में आयोजित ‘पर्यावरण मेला’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस आयोजन में तीजनबाई का कार्यक्रम हुआ था, जिसने आम जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा था। उनकी प्रस्तुति केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि वह लोककला, लोकभाषा और भारतीय परंपरा की शक्ति का जीवंत अनुभव थी।
सरयू राय ने कहा कि तीजनबाई की प्रस्तुति में ऐसी आत्मीयता, ऊर्जा और प्रभाव था कि श्रोता लंबे समय तक उसे याद रखते थे। रांची के पर्यावरण मेले में भी उनकी कला ने यही प्रभाव छोड़ा था। उस कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने उनकी गायिकी, अभिनय और कथावाचन शैली को अत्यंत सराहा था। सरयू राय ने कहा कि तीजनबाई जैसी कलाकार मंच पर केवल प्रस्तुति नहीं देती थीं, बल्कि अपनी कला के माध्यम से श्रोताओं को भारतीय लोकपरंपरा की गहराई से जोड़ देती थीं।
पंडवानी विधा में पैदा हुआ बड़ा शून्य
सरयू राय ने तीजनबाई के निधन को पंडवानी गायिकी के लिए एक बड़े शून्य के रूप में बताया। उन्होंने कहा कि लोककला की कुछ हस्तियां ऐसी होती हैं, जो अपने समय से कहीं आगे जाकर पूरी विधा का चेहरा बन जाती हैं। तीजनबाई ऐसी ही कलाकार थीं। पंडवानी का नाम आते ही जिस व्यक्तित्व की छवि सबसे पहले उभरती है, उनमें तीजनबाई का नाम शीर्ष पर आता है।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उस जीवंत परंपरा का एक बड़ा स्तंभ खो जाना है, जिसने दशकों तक लोककला को संभाले रखा। सरयू राय ने कहा कि कला जगत में कई कलाकार आते हैं, अपनी पहचान बनाते हैं और चले जाते हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो परंपरा का पर्याय बन जाते हैं। तीजनबाई उन्हीं दुर्लभ नामों में शामिल थीं। उनके निधन से जो खालीपन पैदा हुआ है, वह लंबे समय तक महसूस किया जाएगा।
लोककला, संघर्ष और साधना की मिसाल थीं तीजनबाई
तीजनबाई का जीवन केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं था, बल्कि वह संघर्ष, साधना और समर्पण का प्रेरक उदाहरण भी था। लोककला के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाना, समाज की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ना, मंच पर अपनी विशिष्ट शैली स्थापित करना और वर्षों तक उसी ऊर्जा के साथ कला का प्रसार करते रहना—ये सब किसी साधारण उपलब्धि का हिस्सा नहीं हैं।
सरयू राय के शोक संदेश के भावों में यह स्पष्ट झलकता है कि तीजनबाई ने अपनी प्रतिभा से लोककला को सम्मान दिलाया और यह साबित किया कि लोक परंपराएं केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की सांस्कृतिक शक्ति भी हैं। उनकी गायिकी में लोकजीवन की मिट्टी, महाभारत की कथा, स्त्री शक्ति का आत्मविश्वास और मंचीय प्रस्तुति की अद्भुत क्षमता एक साथ दिखाई देती थी। यही वजह है कि वे केवल छत्तीसगढ़ या किसी एक क्षेत्र की कलाकार नहीं रहीं, बल्कि राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना की प्रतिनिधि बन गईं।
सम्मान और उपलब्धियों से भरा रहा तीजनबाई का सफर
तीजनबाई के कला-सफर को देश ने कई प्रतिष्ठित सम्मानों के माध्यम से सम्मानित किया। सरयू राय ने अपने संदेश में उल्लेख किया कि उन्हें वर्ष 1995 में प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका था। यह सम्मान भारतीय रंगकला, संगीत और लोक परंपरा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है, और तीजनबाई को यह सम्मान मिलना उनके असाधारण कला-कौशल की आधिकारिक मान्यता थी।
इसके अलावा तीजनबाई को देश के उच्च नागरिक सम्मानों से भी सम्मानित किया गया, जिनमें पद्म विभूषण जैसा प्रतिष्ठित सम्मान शामिल है। यह दर्शाता है कि उन्होंने केवल लोकगायन के मंचों पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सांस्कृतिक परिदृश्य पर भी गहरी छाप छोड़ी। उनके सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं थे, बल्कि पंडवानी जैसी लोकविधा के सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक भी थे।
जमशेदपुर से लेकर पूरे सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर
तीजनबाई के निधन की खबर से सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। लोकगायन, लोकनाट्य, रंगमंच और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े लोगों ने इसे एक बड़ी क्षति बताया है। जमशेदपुर में भी कला और संस्कृति से जुड़े लोगों के बीच उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया जा रहा है। विधायक सरयू राय का शोक संदेश इस व्यापक भावनात्मक प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें एक महान लोक कलाकार के प्रति सम्मान, स्मरण और संवेदना तीनों मौजूद हैं।
सरयू राय ने कहा कि तीजनबाई जैसी कलाकार पीढ़ियों में एक बार जन्म लेती हैं। वे अपनी कला से समाज को जोड़ती हैं, सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखती हैं और नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से परिचित कराती हैं। ऐसे व्यक्तित्व का जाना केवल सांस्कृतिक क्षेत्र का नुकसान नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति का भी एक दुखद क्षण होता है।
कला के प्रति समर्पण से बनी अमर पहचान
तीजनबाई की सबसे बड़ी पहचान उनका कला के प्रति अटूट समर्पण था। उन्होंने जिस निष्ठा से पंडवानी को जिया, वह उन्हें साधारण कलाकारों से अलग बनाता है। उनकी गायिकी में केवल स्वर नहीं, बल्कि कथा, अभिनय, भाव, लय और लोकजीवन का पूरा संसार समाहित रहता था। वे मंच पर आते ही वातावरण को अपने पक्ष में कर लेने वाली कलाकार थीं। उनकी प्रस्तुति में एक साथ संवेदना, शक्ति, करुणा, नाटकीयता और लोकभाषा की मिठास दिखाई देती थी।
सरयू राय ने अपने शोक संदेश के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से यही रेखांकित किया कि तीजनबाई की विरासत केवल पुरस्कारों या मंचीय सफलताओं तक सीमित नहीं है। उनकी असली विरासत वह सांस्कृतिक चेतना है, जो उन्होंने अपने गायन के माध्यम से समाज में जगाई। आने वाले वर्षों में भी जब पंडवानी का नाम लिया जाएगा, तो तीजनबाई की छवि उसके साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ी रहेगी।

स्मृतियों में जीवित रहेंगी तीजनबाई
तीजनबाई भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कला, उनकी आवाज, उनकी शैली और उनकी सांस्कृतिक विरासत हमेशा जीवित रहेगी। विधायक सरयू राय का शोक संदेश इस बात का प्रमाण है कि तीजनबाई केवल मंच की कलाकार नहीं थीं, बल्कि वे लोगों की स्मृतियों और भावनाओं का हिस्सा बन चुकी थीं। उन्होंने लोककला को जिस ऊंचाई तक पहुंचाया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।
उनके निधन पर व्यक्त शोक के साथ-साथ यह जिम्मेदारी भी सामने आती है कि पंडवानी जैसी लोकविधाओं को और अधिक संरक्षण, मंच और नई पीढ़ी तक पहुंच मिले। तीजनबाई ने जो बीज बोए, जो कलाकार तैयार किए और जो सांस्कृतिक चेतना जगाई, वही उनकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी। सरयू राय ने अपने संदेश में यही भाव व्यक्त किया कि तीजनबाई के निधन से जो शून्य उत्पन्न हुआ है, वह भले ही भरा न जा सके, लेकिन उनकी कला की विरासत समाज और संस्कृति के बीच लंबे समय तक जीवित रहेगी।
एक युग का अवसान, लेकिन विरासत अमर
Teejan Bai का निधन निस्संदेह भारतीय लोकगायन जगत के लिए एक युगांतकारी क्षण है। उनके जाने से पंडवानी गायिकी की दुनिया ने अपनी सबसे सशक्त आवाजों में से एक को खो दिया है। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने जिस संवेदनशीलता के साथ उन्हें याद किया है, उससे यह स्पष्ट है कि तीजनबाई का प्रभाव केवल कला जगत तक सीमित नहीं था, बल्कि समाज और जनमानस में भी उनकी गहरी पहचान थी।
लोककला की यह महान साधिका अब भले ही इस दुनिया में न हो, लेकिन उनका नाम भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में हमेशा सम्मान और गौरव के साथ लिया जाएगा। उनकी गायिकी, उनकी साधना और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

















