
चंडीगढ़: Punjab एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने न्यायिक व्यवस्था में अनुशासन और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए कैथल में तैनात अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) राजीव गोयल को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। हाईकोर्ट की फुल कोर्ट बैठक में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया, जिसके बाद न्यायिक और कानूनी हलकों में इस कार्रवाई को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

हाईकोर्ट द्वारा जारी आदेश के अनुसार, राजीव गोयल के खिलाफ संभावित विभागीय एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई को ध्यान में रखते हुए उन्हें निलंबित किया गया है। हालांकि आदेश में विस्तृत कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन इस कदम को न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सीबीआई कोर्ट में विशेष न्यायाधीश रह चुके हैं राजीव गोयल
जानकारी के अनुसार, राजीव गोयल इससे पहले पंचकूला स्थित सीबीआई कोर्ट में विशेष न्यायाधीश के पद पर कार्यरत थे। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई चर्चित और संवेदनशील मामलों की सुनवाई की थी।
हाल के दिनों में उनका नाम उस समय चर्चा में आया था जब उन्होंने भ्रष्टाचार से जुड़े एक चर्चित मामले में पूर्व न्यायिक अधिकारी सुधीर परमार को राहत प्रदान की थी। इस फैसले के बाद मामला सुर्खियों में आ गया और न्यायिक गलियारों में इसकी व्यापक चर्चा हुई।
निलंबन अवधि में कैथल रहेगा मुख्यालय
हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक निलंबन अवधि के दौरान राजीव गोयल का मुख्यालय कैथल निर्धारित किया गया है। उन्हें बिना पूर्व अनुमति मुख्यालय छोड़ने की अनुमति नहीं होगी।
इसके अलावा सेवा नियमों के तहत उन्हें निलंबन अवधि में जीवन-निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) भी प्रदान किया जाएगा। यह प्रावधान सरकारी सेवा नियमों के अनुरूप लागू किया गया है।
सुधीर परमार मामला फिर चर्चा में
गौरतलब है कि जिन पूर्व न्यायिक अधिकारी सुधीर परमार का मामला हाल के दिनों में चर्चा का केंद्र रहा, उन्हें वर्ष 2023 में भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों और कथित ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने आने के बाद निलंबित कर दिया गया था।
उनके निलंबन के बाद ही पंचकूला स्थित सीबीआई कोर्ट का कार्यभार राजीव गोयल को सौंपा गया था। बाद में इसी मामले से जुड़े घटनाक्रमों ने न्यायिक और प्रशासनिक हलकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
न्यायपालिका में जवाबदेही का संदेश
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट की यह कार्रवाई न्यायपालिका में अनुशासन, पारदर्शिता और संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखने के प्रयासों का हिस्सा है। न्यायिक पदों पर कार्यरत अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों या संभावित अनियमितताओं की स्थिति में उच्च न्यायालय द्वारा की जाने वाली ऐसी कार्रवाई व्यवस्था में जनता के विश्वास को मजबूत करने का संदेश देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, निलंबन का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं होता, बल्कि यह विभागीय जांच या अनुशासनात्मक प्रक्रिया को निष्पक्ष ढंग से संचालित करने की प्रशासनिक कार्रवाई होती है।
आगे की जांच पर टिकी निगाहें
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब सभी की नजरें संभावित विभागीय जांच और आगामी कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो आगे और कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
फिलहाल Punjab एवं हरियाणा हाईकोर्ट की इस कार्रवाई को न्यायिक प्रणाली में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आने वाले दिनों में जांच से जुड़े तथ्यों और आधिकारिक निष्कर्षों का इंतजार रहेगा।









