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हूल दिवस : शौर्य, बलिदान और स्वाभिमान की काव्य अभिव्यक्ति

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On: July 2, 2026 11:27 AM
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पावन भूमि भोगनाडीह को
करता हूं मैं हजारों नमन।
आज की तिथि धदकी थी
जंहा से फिर हूल की आगन।।

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परातंत्रता की मकड़ जाल में
फंस रही थी देश की गर्दन।
कातर-करुण-कहरा रही थी
अस्त-व्यस्त थी जन जीवन।।

दिन था 1855 के 30 जून
देश में हुई नई उलगुलान।
सिदो कन्हू चांद और भैरव
फूलो झानो ने किया आह्वान।।

दिकुओं के खिलाफ शुरू हुई
सशस्त्र प्रखर आंदोलन।
हजारों हजार धरती पुत्र
उत्सर्ग किया अपना जीवन।।

पारंपरिक शस्त्र निकली
हर हाथों में तीर कमान।
जल-जंगल-जमीन और
सुरक्षा देने इज्जत सम्मान।।

निकले योद्धा सिदो-कान्हु
फूलो-झानो चांद-भैरव।
हजारों हजार देश प्रेमी
“हूल दिवस” जिनके गौरव।।

गौरव शाली ये मिट्टी है
स्वतंत्रता की प्रथम लड़ाई।
झारखंड की इस मिट्टी से
आज के दिन कि थी अगुवाई।।

यह कविता “हूल दिवस” के अवसर पर रची गई एक ओजपूर्ण एवं राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत रचना है। इसमें 30 जून 1855 को संताल परगना के भोगनाडीह से प्रारंभ हुए ऐतिहासिक संताल हूल आंदोलन का स्मरण किया गया है। कवि ने सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा वीरांगनाओं फूलो-झानो के अदम्य साहस, बलिदान और मातृभूमि के प्रति समर्पण को श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए झारखंड की गौरवशाली विरासत को जीवंत किया है। यह कविता केवल इतिहास का वर्णन नहीं करती, बल्कि स्वतंत्रता, स्वाभिमान, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा भी देती है।

कविता का भावार्थ

कवि ने कविता के माध्यम से झारखंड की पवित्र भूमि भोगनाडीह को नमन करते हुए उस ऐतिहासिक क्षण का स्मरण कराया है, जब 30 जून 1855 को अंग्रेजी शासन और शोषण के विरुद्ध हूल आंदोलन की शुरुआत हुई थी। उस समय देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और आम जनता अत्याचारों से पीड़ित थी। ऐसे कठिन समय में सिदो-कान्हू, चांद-भैरव तथा फूलो-झानो ने लोगों को संगठित कर अन्याय के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका।

कवि बताते हैं कि हजारों आदिवासी वीरों ने अपने पारंपरिक हथियार—तीर-धनुष और अन्य अस्त्रों के साथ जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। यह आंदोलन केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का भी प्रतीक था। अंत में कवि उन सभी अमर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहते हैं कि उनका बलिदान सदैव देशवासियों को प्रेरणा देता रहेगा और हूल दिवस की गौरवगाथा आने वाली पीढ़ियों तक गूंजती रहेगी।

कवि की कल्पना (कल्पना सौंदर्य)

कवि करुणामय मंडल ने अपनी कल्पना में भोगनाडीह की धरती को एक पवित्र तीर्थ के रूप में चित्रित किया है, जहां से स्वतंत्रता की पहली प्रखर ज्वाला प्रज्वलित हुई। उन्होंने ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया है मानो संताल वीरों के हाथों में तीर-धनुष केवल हथियार नहीं, बल्कि स्वाभिमान और स्वतंत्रता के प्रतीक हों। कवि की कल्पना में सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो आज भी झारखंड की मिट्टी में जीवंत हैं और उनका साहस प्रत्येक पीढ़ी को अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। पूरी कविता में राष्ट्रप्रेम, बलिदान, गौरव और स्वाभिमान का सशक्त चित्रण कवि की संवेदनशील एवं ओजस्वी कल्पनाशक्ति को अभिव्यक्त करता है।

– करुणामय मंडल
पूर्व जिला पार्षद, पोटका,
पूर्वी सिंहभूम, झारखंड.

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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