
झारखंड: Jharkhand के पूर्व मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन ने सोशल मीडिया पर एक सवाल उठाकर राज्य की राजनीति और सामाजिक विमर्श को फिर गर्म कर दिया है। उन्होंने पूछा कि जब आदिवासी समुदाय मूल रूप से प्रकृति पूजक है, मरांग बुरु, सिंगबोंगा, जाहेरथान और सरना स्थलों की पूजा करता है, तो फिर झारखंड में हजारों चर्च क्यों बनाए गए? क्या इन चर्चों में आदिवासी परंपराओं और देवी-देवताओं की पूजा होती है?

यह सवाल केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, इतिहास, राजनीति और धर्मांतरण की बहस से भी जुड़ा हुआ है। झारखंड में लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि आदिवासी समाज की मूल आस्था और संस्कृति पर बाहरी प्रभाव कितना पड़ा है।
आदिवासी समाज और प्रकृति पूजा की परंपरा
Jharkhand के अधिकांश आदिवासी समुदाय जैसे संथाल, मुंडा, उरांव, हो और खड़िया पारंपरिक रूप से प्रकृति पूजक रहे हैं। उनके धार्मिक जीवन का केंद्र जंगल, पहाड़, नदी, सूर्य और धरती से जुड़ा रहा है।
मरांग बुरु को महान पर्वत और सिंगबोंगा को सर्वोच्च शक्ति माना जाता है। सरहुल, करम और सोहराय जैसे पर्व प्रकृति और कृषि चक्र से जुड़े हैं। आदिवासी समाज की यह पहचान सदियों पुरानी मानी जाती है।
Jharkhand में चर्चों का विस्तार कैसे हुआ?
ब्रिटिश शासन के दौरान मिशनरी गतिविधियां छोटानागपुर क्षेत्र में तेजी से बढ़ीं। शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के माध्यम से चर्च संगठनों ने गांवों तक अपनी पहुंच बनाई। आजादी के बाद भी यह प्रक्रिया जारी रही।
झारखंड में चर्चों की सटीक सरकारी संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन विभिन्न चर्च संगठनों और स्थानीय आकलनों के अनुसार राज्य में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 5,000 से अधिक चर्च और प्रार्थना केंद्र मौजूद हैं। इनमें कैथोलिक, लूथरन, जीईएल चर्च, बैपटिस्ट और कई स्वतंत्र चर्च संगठन शामिल हैं।
रांची, गुमला, सिमडेगा, खूंटी और पश्चिम सिंहभूम जैसे जिलों में चर्चों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है।
धर्मांतरण के आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में ईसाई आबादी लगभग 14.18 लाख थी, जो राज्य की कुल आबादी का करीब 4.3 प्रतिशत है।
2001 में यह संख्या लगभग 10.93 लाख थी, यानी एक दशक में ईसाई आबादी में वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस वृद्धि के पीछे केवल धर्मांतरण ही नहीं, बल्कि जनसंख्या वृद्धि, बेहतर शिक्षा और सामाजिक पहचान जैसे कारण भी हो सकते हैं।
यह दावा अक्सर किया जाता है कि लाखों आदिवासियों का धर्मांतरण हुआ है, लेकिन आधिकारिक तौर पर यह बताना कठिन है कि कितने लोगों ने स्वेच्छा से धर्म बदला और कितने लोग जन्म से ईसाई समुदाय में शामिल थे। इस विषय पर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के अलग-अलग दावे हैं।
धर्मांतरण पर दो अलग-अलग विचार
धर्मांतरण को लेकर झारखंड में दो धाराएं स्पष्ट दिखाई देती हैं।
एक पक्ष का कहना है कि मिशनरियों ने शिक्षा, अस्पताल और सामाजिक सेवा के नाम पर आदिवासी समाज की मूल संस्कृति को कमजोर किया। उनका आरोप है कि आर्थिक सहायता और सामाजिक सुविधाओं के जरिए लोगों को धीरे-धीरे अपनी पारंपरिक आस्था से दूर किया गया।
दूसरी ओर चर्च और ईसाई संगठन इन आरोपों को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने पिछड़े इलाकों में स्कूल, अस्पताल और सामाजिक जागरूकता का काम किया, जिससे आदिवासी समाज को शिक्षा और सम्मान मिला। वे यह भी कहते हैं कि धर्म अपनाना व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता है।
सरना धर्म कोड की मांग भी बनी बड़ी बहस
Jharkhand में लंबे समय से अलग “सरना धर्म कोड” की मांग उठती रही है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि जनगणना में उन्हें हिंदू, ईसाई या अन्य श्रेणियों में बांट दिया जाता है, जबकि उनकी अलग धार्मिक पहचान है।
इसी कारण धर्मांतरण और पहचान का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील बन गया है।
सबसे बड़ा सवाल धर्म या इंसानियत?
इस पूरे विवाद के बीच एक बड़ा सवाल समाज के सामने खड़ा होता है जब सभी धर्म मानवता, प्रेम और एक ईश्वर या सर्वोच्च शक्ति की बात करते हैं, तो फिर धर्म के नाम पर विभाजन और प्रतिस्पर्धा क्यों?
यदि सभी मनुष्य एक ही सृष्टिकर्ता की संतान हैं, तो धर्म सेवा और आध्यात्मिकता का माध्यम होना चाहिए या प्रभाव और विस्तार का साधन? यही सवाल आज झारखंड से लेकर पूरे देश में चर्चा का विषय बनता जा रहा है
Jharkhand में चर्चों और धर्मांतरण को लेकर बहस नई नहीं है, लेकिन चम्पई सोरेन के सवाल ने इसे फिर केंद्र में ला दिया है। यह मुद्दा केवल धर्म का नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान, संस्कृति और राजनीतिक चेतना से भी जुड़ा हुआ है।
आने वाले समय में यह बहस और तेज हो सकती है। जरूरत इस बात की है कि चर्चा तथ्यों, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संतुलन के आधार पर हो, ताकि समाज में टकराव नहीं बल्कि संवाद का रास्ता मजबूत हो।









