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Hool Diwas पर दुमका में गरजे पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन बोले- जल जंगल जमीन और आदिवासी अस्तित्व की रक्षा के लिए एक और हूल की जरूरत

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On: July 1, 2026 5:03 PM
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दुमका: Hool Diwas के अवसर पर दुमका पहुंचे झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने राज्य की महागठबंधन सरकार पर तीखा राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार आदिवासी समाज, उसकी संस्कृति, इतिहास और महापुरुषों की विरासत को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि जल, जंगल, जमीन और आदिवासी समाज के अस्तित्व की रक्षा के लिए आज फिर से एक बड़े जनआंदोलन की आवश्यकता है।

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पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज ने हमेशा अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष किया है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज के अस्तित्व पर संकट आया, तब-तब आदिवासी वीरों ने बलिदान देकर नई चेतना का संचार किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियां भी समाज को एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा करने का संदेश दे रही हैं।

भोगनाडीह प्रकरण को लेकर सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

अपने संबोधन के दौरान चम्पाई सोरेन ने भोगनाडीह में हूल दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाले सामाजिक कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि वीर सिदो-कान्हू के वंशज मंडल मुर्मू को कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन द्वारा ग्रामीणों को नोटिस जारी किए गए, जिससे आदिवासी समाज में असंतोष का माहौल बना।

उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि जिस भूमि से अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐतिहासिक हूल क्रांति की शुरुआत हुई थी, उसी स्थान पर आज आदिवासी समाज को अपने महापुरुषों को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रशासनिक अनुमति लेने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

वीर सिदो-कान्हू की विरासत को मिटाने वालों को जनता जवाब देगी”

चम्पाई सोरेन ने कहा कि देश की स्वतंत्रता और आदिवासी स्वाभिमान के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर सिदो-कान्हू ने कभी यह कल्पना भी नहीं की होगी कि आने वाली पीढ़ियों को उन्हें श्रद्धांजलि देने से पहले किसी सरकार की अनुमति लेनी पड़ेगी।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में लोगों को अपने महापुरुषों का सम्मान करने का अधिकार है और इस अधिकार पर किसी प्रकार की बंदिश उचित नहीं है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि वीर सिदो-कान्हू की विरासत को समाप्त करने या उसे कमजोर करने का प्रयास करने वालों को जनता लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देगी।

पिछले वर्ष की घटना का भी किया उल्लेख

पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में पिछले वर्ष हूल दिवस के दौरान हुई घटनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय शहीद परिवार के वंशजों और भोगनाडीह के ग्रामीणों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया था।

उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं आदिवासी समाज की भावनाओं को आहत करती हैं और सरकार को इस प्रकार के मामलों में संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपने इतिहास और शहीदों के सम्मान से कभी समझौता नहीं करेगा।

ग्रामीणों के फैसले की सराहना

चम्पाई सोरेन ने कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि भोगनाडीह के ग्रामीणों ने अपने अधिकारों को लेकर दृढ़ता दिखाई। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों ने कथित रूप से न्यायालय जाने और बॉन्ड भरने से इनकार कर अपनी एकजुटता का परिचय दिया।

उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। यदि समाज संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए खड़ा होता है तो किसी भी प्रकार की अन्यायपूर्ण व्यवस्था अधिक समय तक टिक नहीं सकती।

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संथाल परगना की बदलती जनसंख्या संरचना पर भी जताई चिंता

अपने संबोधन में चम्पाई सोरेन ने संथाल परगना क्षेत्र की बदलती जनसंख्या संरचना का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने दावा किया कि पाकुड़ जिले में आदिवासी और मूलवासी समुदाय की बड़ी मात्रा में भूमि पर बांग्लादेशी घुसपैठियों ने कब्जा कर लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि दुमका, साहिबगंज और गिरिडीह सहित कई क्षेत्रों में ऐसी स्थिति देखने को मिल रही है।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस कारण सामाजिक संतुलन प्रभावित हो रहा है और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर खतरा बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर सरकार को प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए तथा स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

जनआंदोलन की आवश्यकता पर दिया जोर

पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि जल, जंगल, जमीन और आदिवासी समाज के अधिकारों की रक्षा करनी है तो समाज को संगठित होकर आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक बयानबाजी से समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बल्कि समाज की व्यापक भागीदारी और जनजागरण आवश्यक है।

उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करें। उनके अनुसार, एक संगठित समाज ही अपनी संस्कृति, पहचान और अधिकारों की प्रभावी ढंग से रक्षा कर सकता है।

हूल दिवस पर सामाजिक कार्यक्रम में हुए शामिल

चम्पाई सोरेन हूल दिवस के अवसर पर आदिवासी सांवता सुसार अखाड़ा द्वारा दुमका के स्थानीय कन्वेंशन हॉल में आयोजित सामाजिक कार्यक्रम में मुख्य रूप से शामिल हुए। कार्यक्रम में आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाले विद्यार्थियों, खिलाड़ियों, कलाकारों, समाजसेवियों और मार्गदर्शकों को सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के दौरान समाज में शिक्षा, खेल, संस्कृति और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने पर भी विशेष चर्चा हुई। वक्ताओं ने नई पीढ़ी को अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने पर बल दिया।

पारंपरिक पूजा-अर्चना और पौधारोपण कार्यक्रम में भी लिया भाग

सामाजिक कार्यक्रम से पूर्व चम्पाई सोरेन दिशोम मांझी थान पहुंचे, जहां उन्होंने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना की। इसके बाद उन्होंने पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए पौधारोपण भी किया।

बाद में वे पोखरा चौक पहुंचे, जहां उन्होंने वीर सिदो-कान्हू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करने का संकल्प दोहराया।

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कई जनप्रतिनिधि और समाज के बुद्धिजीवी रहे उपस्थित

कार्यक्रम में कटोरिया (बिहार) विधानसभा क्षेत्र के विधायक पूरन लाल टुडू, पूर्व मंत्री रणधीर सिंह, चंद्रमोहन हांसदा सहित आदिवासी समाज के अनेक बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद, जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने हूल क्रांति के नायकों के योगदान को याद करते हुए कहा कि उनके बलिदान से प्रेरणा लेकर समाज को शिक्षा, एकता और अधिकारों की रक्षा की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

Hool दिवस पर इतिहास और वर्तमान को जोड़ने का प्रयास

Hool दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में जहां एक ओर वीर सिदो-कान्हू सहित हूल आंदोलन के महानायकों को श्रद्धांजलि दी गई, वहीं दूसरी ओर वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा हुई। पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने अपने संबोधन में आदिवासी समाज की पहचान, अधिकारों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए समाज से संगठित रहने का आह्वान किया।

कार्यक्रम के दौरान दिए गए उनके वक्तव्य ने हूल दिवस को केवल ऐतिहासिक स्मरण तक सीमित न रखते हुए वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक विमर्श से भी जोड़ने का प्रयास किया। अब इन मुद्दों पर सरकार और अन्य पक्षों की प्रतिक्रिया पर भी लोगों की नजर रहेगी।

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