जमशेदपुर: झारखंड सरकार द्वारा Cluster सिस्टम के तहत राज्य के कई महाविद्यालयों में संस्कृत विभाग बंद किए जाने के निर्णय का विरोध तेज होता जा रहा है। हिन्दू नववर्ष यात्रा के संस्थापक मृत्युंजय कुमार ने इस फैसले पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि यह केवल एक शैक्षणिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और सांस्कृतिक विरासत पर सीधा हमला है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारत की पहचान है और इसे कमजोर करने का कोई भी प्रयास समाज स्वीकार नहीं करेगा।
मृत्युंजय कुमार ने सरकार से बंद किए गए संस्कृत विभागों को तत्काल बहाल करने की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द निर्णय वापस नहीं लिया तो व्यापक जनआंदोलन शुरू किया जाएगा।
संस्कृत केवल भाषा नहीं हमारी संस्कृति की आत्मा है
मृत्युंजय कुमार ने कहा कि संस्कृत केवल एक विषय या भाषा नहीं है, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की आत्मा है। उन्होंने कहा कि देश की अधिकांश भाषाओं की जड़ें संस्कृत में हैं और भारतीय ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, वेद, उपनिषद, पुराण और धार्मिक ग्रंथों का मूल आधार भी संस्कृत ही है।

उन्होंने कहा कि यदि संस्कृत को शिक्षा व्यवस्था से धीरे-धीरे समाप्त किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर होती चली जाएंगी।
Cluster सिस्टम की आड़ में संस्कृत विभाग बंद करने का आरोप
मृत्युंजय कुमार ने आरोप लगाया कि क्लस्टर सिस्टम लागू करने के नाम पर राज्य के कई महाविद्यालयों में संस्कृत विभागों को अचानक बंद कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि यह निर्णय छात्रों, शिक्षकों और समाज से बिना व्यापक संवाद किए लिया गया, जिससे संस्कृत शिक्षा को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
उनका कहना था कि यदि शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना ही उद्देश्य है तो विभागों को मजबूत किया जाना चाहिए, न कि उन्हें समाप्त किया जाए।
भाषा खत्म होगी तो पहचान भी खत्म होगी
उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से होती है।
यदि किसी भाषा को धीरे-धीरे शिक्षा व्यवस्था से बाहर कर दिया जाए तो उसके साथ उस समाज की सांस्कृतिक पहचान भी कमजोर होने लगती है।
मृत्युंजय कुमार ने कहा कि संस्कृत हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता की आधारशिला रही है। इसे कमजोर करने का अर्थ भारत की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करना है।
भारतीय ज्ञान परंपरा का आधार है संस्कृत
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, योग, दर्शन, ज्योतिष, गणित और भारतीय साहित्य का विशाल भंडार संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।
यदि संस्कृत के अध्ययन को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा तो नई पीढ़ी इस अमूल्य ज्ञान परंपरा से वंचित हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं और पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने की बात कही गई है। ऐसे में संस्कृत विभागों को बंद करना इस सोच के विपरीत कदम माना जाएगा।
समाज से एकजुट होने की अपील
मृत्युंजय कुमार ने समाज के सभी वर्गों से इस मुद्दे पर आगे आने की अपील की।
उन्होंने कहा कि—
- प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए आवाज उठानी चाहिए।
- अभिभावकों को अपने बच्चों को भारतीय भाषाओं के महत्व के बारे में जागरूक करना चाहिए।
- विद्यार्थियों को भी संस्कृत शिक्षा के संरक्षण के लिए आगे आना चाहिए।
- सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों को इस विषय पर जनजागरण अभियान चलाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह केवल शिक्षकों या विद्यार्थियों का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
यह केवल कॉलेजों का नहीं, झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न
मृत्युंजय कुमार ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक कॉलेज या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है।
उनके अनुसार यह पूरे झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता और भारतीय परंपरा को सुरक्षित रखने का विषय है।
उन्होंने कहा कि यदि आज संस्कृत विभाग बंद किए जाते हैं तो भविष्य में अन्य भारतीय भाषाओं और पारंपरिक विषयों पर भी संकट उत्पन्न हो सकता है।
सरकार से निर्णय वापस लेने की मांग
उन्होंने झारखंड सरकार से आग्रह किया कि क्लस्टर सिस्टम के तहत बंद किए गए सभी संस्कृत विभागों की समीक्षा कर उन्हें पुनः शुरू किया जाए।
उन्होंने कहा कि सरकार को शिक्षा और संस्कृति से जुड़े मामलों में सभी पक्षों से चर्चा कर संतुलित निर्णय लेना चाहिए ताकि छात्रों और शिक्षकों के हित प्रभावित न हों।
आंदोलन की चेतावनी
अपने बयान के अंत में मृत्युंजय कुमार ने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि बंद किए गए संस्कृत विभागों को जल्द बहाल नहीं किया गया तो राज्यभर में उग्र आंदोलन किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि संस्कृत और भारतीय संस्कृति पर किसी भी प्रकार का प्रहार स्वीकार नहीं किया जाएगा। यदि सरकार समय रहते सकारात्मक निर्णय नहीं लेती है तो आंदोलन की पूरी जिम्मेदारी सरकार की होगी।
झारखंड में Cluster सिस्टम के तहत संस्कृत विभागों को बंद किए जाने के मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं तेज होती जा रही हैं। हिन्दू नववर्ष यात्रा के संस्थापक मृत्युंजय कुमार ने इसे भारतीय संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत पर हमला बताते हुए सरकार से तत्काल निर्णय वापस लेने की मांग की है। साथ ही उन्होंने समाज से एकजुट होकर संस्कृत भाषा और भारतीय परंपराओं के संरक्षण के लिए आगे आने का आह्वान किया है। आने वाले दिनों में सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
















